मानसिक चिकित्सा है श्रद्धा और सबूरी

साई के दिव्य संदेशों में श्रद्धा और सबूरी अपना विशेष स्थान रखते हैं. आज तक बहुत से ज्ञानी जनों ने श्रद्धा-सबूरी को कई विभिन्न दृष्टियों से प्रस्तुत किया. अपनी-अपनी मन:स्थिति के अनुसार सभी का कहना सही भी है, लेकिन मन में एक विचार और उठता है और समझ आता है कि वास्तव में बाबा का श्रद्धा-सबूरी का दिव्य संदेश एक मानसिक चिकित्सा या कहें कि मनोचिकित्सा का एक स्वरूप है. बाबा के पास पहुंचने वालों में ज़्यादातर अपनी ज़िंदगी में आ रही मुश्किलों से परेशान लोग होते हैं. हर कोई यह आशा लेकर पहुंचता है कि बाबा उसकी ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा कर देंगे. जिस प्रकार कोई परेशान व्यक्ति ज्योतिषी के पास पहुंचता है और ज्योतिषी उसे कोई नग पहनने की सलाह देता है. यही नग उस व्यक्ति के जीवन में आशा और विश्वास का संचार कर देता है. प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य प्रोफेसर दयानंद के अनुसार, अधिकतर रोग चिकित्सा से नहीं, बल्कि उस चिकित्सा में विश्वास से अच्छे होते हैं और यही ज्योतिष के साथ होता है. हर किसी की ज़िंदगी में परेशानी और दुःख का एक नियत समय होता है. एक समय के बाद रोग, परेशानियां और दुःख स्वयं दूर हो जाते हैं, लेकिन इस सफ़र को तय करने में ज्योतिषीय उपाय और नग बहुत सहारा देते हैं. नग पहन कर व्यक्ति सदा स्मरण रखता है कि यह उसे उजाले की ओर ले जा रहा है. ठीक इसी प्रकार श्री साई का श्रद्धा-सबूरी का मंत्र भी निराशा से आशा और अंधेरे से उजाले की तऱफ एक यात्रा है.

बाबा ने कहा, श्रद्धा रख, सब्र से काम ले, अल्लाह भला करेगा. यह विश्वास और आश्वासन हमेशा भक्तों के लिए उजाले की किरण बनता रहा है. धूपखेड़ा गांव के चांद पाटिल से लेकर आज तक जिसने भी अपने मन में श्री साई के इन दो शब्दों को बसा लिया, उसका पूरी दुनिया तो क्या, स्वयं प्रारब्ध या कहें कि होनी भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती. स़िर्फ एक अटल विश्वास और अडिग यक़ीन आपको सारी मुसीबतों और तकलीफों के पार ले जा सकता है. बहुत से भक्तों को श्रद्धा-सबूरी का मतलब आज भी स्पष्ट नहीं है. वास्तव में बाबा ने कहा था कि अपने इष्ट, अपने गुरु, अपने मालिक पर श्रद्धा रखो. यह विश्वास रखो कि भवसागर को पार अगर कोई करा सकता है तो वह आपका इष्ट, गुरु और मालिक है. अपने मालिक की बातों को ध्यान से सुनो और उनका अक्षरश: पालन करो. बाबा को पता था कि केवल किसी पर विश्वास रखना ही काफी नहीं है. विश्वास की डूबती-उतराती नाव का कोई भरोसा नहीं है, इसीलिए बाबा ने इस पर सबूरी का लंगर डाल दिया था. किसी पर विश्वास करना है और इस हद तक करना है कि कोई उस विश्वास को डिगा न सके, चाहे कितने ही साल और जन्म लगें. जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि दुःख दूर होता है और होगा, लेकिन उस समय तक पहुंचने के लिए एक सहारा चाहिए और वह सहारा है श्रद्धा और सबूरी का.

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