रंग बदलती राजनीति

रंग बदलती राजनीतिझारखंड की राजनीतिक हवा इन दिनों बदली हुई है. मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को शपथ लिए तीन माह हो गए. शपथ ग्रहण के छह महीने के भीतर उन्हें चुनाव जीतकर विधानसभा आना है. इसलिए राज्य में विधानसभा एवं लोकसभा के एक-एक उपचुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है. फलत: सूबे में सियासी सरगर्मी बढ़ रही है. बीते 11 सितंबर को अर्जुन मुंडा ने झारखंड के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. बतौर मुख्यमंत्री मुंडा की यह तीसरी पारी है. जमशेदपुर लोकसभा सीट से सांसद अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए राज्य की किसी भी विधानसभा सीट से जीत हासिल करना आवश्यक है. राज्य के मुखिया पद पर आसीन हुए मुंडा को ढाई महीने बीत जाने तक चुनाव की कोई चर्चा ही नहीं थी, परंतु गत 30 नवंबर को जमशेदपुर की खरसावां विधानसभा सीट से भाजपा विधायक मंगल सिंह सोय ने इस्ती़फा दे दिया. उन्होंने अर्जुन मुंडा के चुनाव लड़ने के लिए सीट छोड़ी है. उनका इस्ती़फा स्वीकार भी कर लिया गया है. इसी के साथ मुंडा के चुनाव लड़ने, न लड़ने या सीट की उपलब्धता न होने जैसी अटकलों पर विराम लग गया. कुछ लोगों को यह भी लग रहा था कि मुंडा का हाल भी शिबू सोरेन जैसा न हो जाए.

उल्लेखनीय है कि पिछली सरकार में सोरेन मुख्यमंत्री पद पर काबिज़ थे. उन्हें मुख्यमंत्री बने रहने के लिए विधानसभा चुनाव जीतना अनिवार्य था, मगर झामुमो प्रमुख होने के बावजूद पार्टी के किसी विधायक ने उनके लिए सीट नहीं छोड़ी. यहां तक कि उनके विधायक पुत्र एवं पुत्रवधू ने भी उनके लिए सीट की क़ुर्बानी नहीं दी.

ठीक इसके विपरीत अर्जुन मुंडा के साथ ऐसी स्थिति नहीं थी. मुख्यमंत्री मुंडा अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही खरसावां सीट से जीतते आ रहे हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में वह जमशेदपुर सीट से सांसद चुने गए. झारखंड में नवंबर 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में मुंडा की सरपरस्ती में खरसावां सीट से मंगल सिंह सोय ने जीत हासिल की थी. जीतने के पश्चात विधायक मंगल सिंह सोय का पहला बयान यही था कि जब भी अर्जुन मुंडा कहेंगे, तब वह सीट उनके लिए छोड़ देंगे.

अब जब सोय ने मुंडा के लिए सीट छोड़ दी है तो राज्य में दो उपचुनावों की संभावना बन गई है. विधानसभा में आने के लिए मुंडा खरसावां विधानसभा सीट से लड़ेंगे और साथ ही जमशेदपुर संसदीय सीट से इस्ती़फा देंगे. इस वजह से सूबे में कानाफूसी और लॉबिंग तेज हो गई है. लड़ने के इच्छुक विभिन्न उम्मीदवार जहां टिकट पाने के लिए ताल ठोंक रहे हैं, वहीं राज्य की विभिन्न पार्टियां जोड़तोड़ में जुट गई हैं. सूबे में जलवायु का तापमान गिर रहा है, वहीं इसके उलट भावी चुनाव के कारण राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है.

सुविधानुसार अपनी नीति और विचार में निरंतर परिवर्तनशील पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा की आंखें जमशेदपुर लोकसभा सीट पर गड़ी हुई हैं. मंगल सिंह सोय द्वारा अपना इस्ती़फा विधानसभा अध्यक्ष सी पी सिंह को सौंपने के बाद से ही झामुमो जमशेदपुर संसदीय सीट पर अपना दावा करने लगा है. उसका कहना है कि वहां से पिछले दो दशकों में उसी उम्मीदवार ने ही विजयश्री पाई है, जिसका जुड़ाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से झामुमो से रहा है. झारखंड मुक्ति मोर्चा के एक बड़े नेता के अनुसार, जमशेदपुर के निवासियों ने अर्जुन मुंडा को संसद इसलिए भेजा, क्योंकि वे आज भी मुंडा को झामुमो के नेता के तौर पर समझते हैं. अर्जुन मुंडा ने अपने सियासी करियर की शुरुआत इसी पार्टी से की थी और इसी के टिकट पर वह पहली बार विधायक बन सके थे. चूंकि अर्जुन मुंडा झामुमो प्रमुख गुरु जी के नज़दीकी रहे हैं, इसलिए जमशेदपुर की जनता आज भी पुराने नज़रिए से देखकर ही मुंडा को अपना प्यार देती है. 90 के दशक में जमशेदपुर सीट से भाजपा के टिकट पर आभा महतो जीती थीं. उनकी जीत के पीछे कारण यह था कि उनके पति शैलेंद्र महतो झामुमो के नेता थे. आभा महतो से पहले उस सीट पर शैलेंद्र महतो का क़ब्ज़ा था. बतौर झामुमो प्रत्याशी उन्होंने यह सीट हासिल की थी, लेकिन नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्व काल के कुख्यात घूसकांड में शिबू सोरेन के साथ नाम आने के बाद शैलेंद्र ने पार्टी का दामन छोड़ने का फैसला किया था.

झारखंड मुक्ति मोर्चा की केंद्रीय कार्यसमिति के एक सदस्य का कहना है कि राज्य में झामुमो और भाजपा के गठबंधन वाली सरकार है. हम लोग खरसावां सीट पर अर्जुन मुंडा का समर्थन कर रहे हैं. इसलिए भाजपा को चाहिए कि वह जमशेदपुर सीट से अपना दावा छोड़ दे. खरसावां सीट पर हम अर्जुन मुंडा को पूरा सहयोग देंगे, बदले में जमशेदपुर सीट हमें दी जाए. यदि भाजपा राज्य में स्थिर सरकार चाहती है तो उसे हमारी भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए. दूसरी तऱफ राज्य भाजपा के अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी एवं मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का कहना है कि कोई भी फैसला सही समय पर ही लिया जाएगा. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, भाजपा झामुमो को जमशेदपुर सीट नहीं देना चाहती, क्योंकि उसे खरसावां सीट पर झामुमो के समर्थन की कोई ज़रूरत महसूस नहीं हो रही है. पार्टी का विश्वास है कि खरसावां से अर्जुन मुंडा की जीत पक्की है. चुनाव तो महज़ औपचारिकता है. वर्ष 1995 में पहली बार मुंडा ने झामुमो के टिकट पर खरसावां से उस समय के दबंग प्रत्याशी विजय सिंह सोय के विरुद्ध चुनाव लड़ा था. विजय सिंह को टक्कर देने के लिए नामांकन कर सबको भौंचक करने वाले अर्जुन ने पहली बार में ही सोय को 5000 से अधिक वोटों से शिकस्त देकर अपना लोहा मनवाया था. बिहार विधानसभा में एक ओजस्वी वक्ता की छवि बनाने वाले मुंडा 1999 में झामुमो छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे. 2000 के विधानसभा चुनाव में अर्जुन मुंडा खरसावां सीट से भाजपा के टिकट पर जीतकर विधायक बने. इस चुनाव में जीत का अंतर 13 हज़ार मतों से ज़्यादा था. मुंडा के 44521 वोटों के मुक़ाबले विजय सिंह सोय को 30847 वोट मिले थे. वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में अर्जुन मुंडा के सामने थीं दिवंगत विजय सिंह सोय की पत्नी कुंती सोय, मगर मुंडा ने बड़े अंतर से चुनाव जीता. अर्जुन को 74797 वोट मिले, वहीं कुंती को केवल 19453 वोट मिले थे. 2009 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के मंगल सिंह सोय ने खरसावां सीट जीती. ऐसे में खरसावां सीट पर झामुमो के समर्थन के बदले जमशेदपुर सीट उसे दे देने में भाजपा को बुद्धिमानी नज़र नहीं आ रही है.

उधर विपक्षी दलों में बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा एवं कांगे्रेस के बीच खरसावां उपचुनाव को लेकर तक़रार तय है. सियासी गठजोड़ होने के बाद भी दोनों अलग-अलग राग अलाप रहे हैं. दोनों पार्टियों के बीच फाड़ स्पष्ट दिख रहा है. झाविमो एवं कांगे्रस के बीच 2009 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन हुआ था, परंतु अब दोनों के संबंधों में गर्मजोशी नहीं रही. झाविमो विधायक दल के नेता एवं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रदीप यादव कहते हैं कि झाविमो खरसावां सीट पर अर्जुन मुंडा के ख़िला़फ अपना उम्मीदवार खड़ा करेगी. पार्टी ने तय कर लिया है कि वह आने वाले चुनावों में अकेले लड़ेगी. यादव ने साफ कहा कि झाविमो ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया है. कांग्रेस पार्टी खरसावां उपचुनाव के लिए क्या कर रही है, उससे झाविमो को कुछ लेना-देना नहीं है. दूसरी ओर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं कि खरसावां सीट पर प्रत्याशी उतारने का फैसला उपयुक्त समय पर केंद्रीय नेतृत्व करेगा. झाविमो-कांग्रेस के संबंधों पर सिंह ने अभी कुछ खुलासा नहीं किया है. जबकि कांग्रेस के झारखंड में एकलौते सांसद एवं केंद्रीय खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्री सुबोधकांत सहाय कहते हैं कि झाविमो का अस्तित्व कांग्रेस की बदौलत है. बकौल सहाय, जमशेदपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस का ही दावा बनता है. झाविमो तो उस क्षेत्र में आधारहीन है.