बात 2006 की है. सूचना क़ानून को लागू हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे. बिहार के झंझारपुर का एक रिक्शाचालक मजलूम इंदिरा आवास योजना के तहत आवेदन देता है. अब खंड विकास अधिकारी उसके आवेदन को पास करने के लिए 5 हज़ार रुपये की रिश्वत मांगता है. अनपढ़ और ग़रीब मजलूम तीन साल से बीडीओ कार्यालय में धक्के खा रहा था, क्योंकि 5 हज़ार रुपये घूस देना उसके लिए संभव नहीं था. इसी बीच वह एक सामाजिक कार्यकर्ता अशोक सिंह से मिला, जिन्होंने उसे सूचना के अधिकार के तहत सूचना मांगने का आवेदन बनाकर दिया. आवेदन डालने के एक सप्ताह के भीतर मजलूम को 15 हज़ार रुपये का चेक मिल गया. एक महीने बाद जब मजलूम बाक़ी राशि लेने बीडीओ दफ्तर पहुंचा तो एक बार फिर उससे रिश्वत की मांग की गई. इस बार अनपढ़ मजलूम ने बीडीओ से कहा कि अगर मेरा पैसा नहीं दोगे तो फिर से सोचना (सूचना) की अर्जी लगा दूंगा. नतीजतन, बिना एक पैसे घूस दिए मजलूम को पूरी राशि मिल गई. अनपढ़ मजलूम की अर्जी ने साबित कर दिया कि एक मौन क्रांति का आगाज़ हो चुका है. आज देश भर में मजलूम जैसे हज़ारों लोग, जो अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं, सूचना का अधिकार क़ानून के सहारे इस मौन क्रांति को आकार देने में जुटे हुए हैं. लेकिन, व्यवस्था में बैठे नेताओं और नौकरशाहों को यह बात हज़म नहीं हो रही है कि कल तक जिन लोगों के लिए वे माई-बाप हुआ करते थे, वही आज उनसे आंख मिलाकर सवाल पूछ रहे हैं. इस देश में आज भी अंग्रेजों के बनाए हुए कई क़ानून गुलामी की याद दिलाते हैं. आज़ादी के 64 साल बाद भी ऐसे क़ानूनों को हटाने, बदलने या उनमें संशोधन की ज़रूरत देश के कर्णधारों को महसूस नहीं होती, लेकिन 5 साल पुराने आरटीआई क़ानून उनकी आंखों में ऐसा चुभ रहा है कि जिसे देखो, वही इसमें संशोधन की बात कर रहा है. नेता, नौकरशाह और जज भी.
आरटीआई क़ानून में कुछ खामियां हैं, जिनका बड़े स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है. यह आरटीआई क़ानून के अनेक प्रावधानों में अंतरावलोकन का समय है. (अक्टूबर 2010 में दिया गया बयान) (सितंबर 2009 में मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजे अपने पत्र में न्यायपालिका को आरटीआई क़ानून के दायरे से बाहर रखने का आग्रह किया था. तर्क यह कि इस क़ानून की वजह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है.)
के जी बालाकृष्णन
चेयरमैन, एनएचआरसी
अभी केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग में आरटीआई नियमों में संशोधन की तैयारी चल रही है. संशोधन भी ऐसे, ताकि देश के ग़रीब, अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए यह क़ानून बेमानी हो जाए. प्रस्तावित संशोधन के मुताबिक़, एक आरटीआई आवेदन को 250 शब्दों में ही सीमित करना होगा. एक आवेदन में एक ही विषय शामिल करना होगा. इसके अलावा सूचना उपलब्ध कराने के लिए जो डाक ख़र्च होगा, वह भी आवेदक को ही देना होगा. साथ ही किसी ऐसी सूचना, जिसके लिए किसी विभाग को बाहर से कोई मशीन या उपकरण किराए पर लेना पड़ता है तो उसका ख़र्च भी आवेदक को ही उठाना पड़ेगा. मसलन, किसी सड़क की गुणवत्ता जांच के संबंध में कोई आवेदक सूचना चाहता है तो इसमें जो मशीनी ख़र्च आएगा, उसे आवेदक को ही अदा करना पड़ेगा. यही नहीं, कोई आवेदक अपील करना चाहता है तो उसे इसके लिए एक खास प्रारूप का इस्तेमाल करना होगा और कई सारे दस्तावेज लगाने होंगे. ज़ाहिर है, अगर ये संशोधन स्वीकार कर लिए जाते हैं तो एक ऐसा आवेदक, जो ग़रीब या कम पढ़ा-लिखा या अशिक्षित है, उसके लिए यह क़ानून किसी काम का नहीं रह जाएगा. चाहे वह सोनीपत ज़िले के सिलारपुर मेहता गांव की साठ वर्षीय सुमित्रा देवी हों, जिन्होंने आरटीआई की मदद से गरीब स्कूली लड़कियों के लिए साइकिल वितरण की सरकारी योजना का लाभ छात्र -छात्राओं तक पहुंचाया था या फिर इलाहाबाद के सुदूर गुलरहाई और चित्रकूट के भरथौल के आम लोग, जिनके आवेदन से प्राथमिक विद्यालय के छात्र-छात्राओं को स्कूल ड्रेस और किताबें मिलीं.
250 शब्दों की सीमा तय करना एक बड़ी समस्या है. इस देश की एक बड़ी आबादी अशिक्षित है, वह कैसे इतने कम शब्दों में अपनी बात रख पाएगी? सूचना शुल्क में जो बदलाव की बात हो रही है, उससे तो पीआईओ अपनी मर्जी से सूचना जुटाने में लगी मेहनत और समय का भी शुल्क वसूलना शुरू कर देंगे. पहले भी सूचना उपलब्ध कराने के नाम पर आवेदक से पीआईओ का वेतन मांगा जाता रहा है. सरकार को हमारी मांगें नहीं दिख रही हैं, उल्टे वह जानबूझ कर इस क़ानून को कमज़ोर करने की कोशिश कर रही है.
अरविंद केजरीवाल,
रेमन मैगसेसे अवार्ड विजेता एवं आरटीआई कार्यकर्ता
दरअसल, सूचना क़ानून के नियमों में प्रस्तावित संशोधन के पीछे एक लंबी कहानी है. सितंबर 2009 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने एक पत्र प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा. अपने पत्र में उन्होंने न्यायपालिका को आरटीआई क़ानून के दायरे से बाहर रखने का आग्रह किया था. तर्क यह कि इस क़ानून की वजह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है. हालांकि अब बालाकृष्णन एनएचआरसी के अध्यक्ष हैं और वह अब भी इस संशोधन की वकालत कर रहे हैं. अक्टूबर, 2010 में दिए एक बयान में वह कहते हैं कि इस क़ानून में कुछ खामियां हैं, जिनका बड़े स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है. यह आरटीआई क़ानून के अनेक प्रावधानों में अंतरावलोकन का समय है. संभवत: यह विधेयक संसद में जल्दबाज़ी में पारित किया जाएगा. उनके इस बयान से पता चलता है कि सरकार काफी समय से इस संशोधन की तैयारी कर रही है. ग़ौरतलब है कि आरटीआई की वजह से ही धीरे-धीरे आम आदमी ने न्यायपालिका से भी सवाल पूछना शुरू कर दिया था. आरटीआई के इस्तेमाल से ही पता चला था कि उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने अपनी पत्नी के साथ विदेश यात्रा की थी, जबकि नियम के मुताबिक़ उस यात्रा के दौरान मुख्य न्यायाधीश अपनी पत्नी को साथ नहीं ले जा सकते थे. मामला सार्वजनिक होते ही सरकार ने कई दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनमें जजों की विदेश यात्राओं में 30 प्रतिशत तक कटौती की भी बात थी.
मैं समझता हूं कि 250 शब्दों की सीमा सही है. कई बार लोग 15 पन्नों का आवेदन भेज देते हैं. संसद में पूछे जाने वाले प्रश्नों के लिए भी एक शब्द सीमा होती है. वे 150 शब्दों से ज़्यादा नहीं होते. हां, एक विषय तय कर देने से यह मुश्किल होगी कि फिर पीआईओ अपने हिसाब से विषय तय करने लगेंगे. जहां तक डाक शुल्क आवेदक से लिए जाने की बात है तो मैं समझता हूं कि यह जायज़ है, क्योंकि सरकार अभी जो ख़र्च कर रही है, वह भी तो जनता का ही पैसा है.
शैलेष गांधी,
केंद्रीय सूचना आयुक्त
बहरहाल, 2009 में बालाकृष्णन द्वारा प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र की भनक जब कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों को लगी, तब उन्होंने सोनिया गांधी से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की. सोनिया गांधी 9 नवंबर, 2009 को अपने पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री के सामने यह स्पष्ट करती हैं कि वह इस क़ानून में किसी भी तरह के संशोधन के ख़िला़फ हैं. वह लिखती हैं कि स़िर्फ 4 सालों में ही इस क़ानून ने आम आदमी को बहुत कुछ दिया है. मेरी राय में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे अभी भी इस क़ानून से बाहर हैं और ऐसी सूरत में इस क़ानून में किसी भी संशोधन की ज़रूरत नहीं है. वह प्रधानमंत्री को बताती हैं कि सरकार की असली समस्या कर्मचारियों में प्रशिक्षण का अभाव और सरकारी आंकड़ों का बेतरतीब रखरखाव है. बावजूद इसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी को जवाब दिया कि वह उनके विचारों से सहमत हैं, लेकिन इसके साथ कुछ ऐसे मुद्दे भी हैं, जिनके लिए इस क़ानून में संशोधन करना ज़रूरी हो गया है. यानी पीएम भी आम आदमी को ताक़तवर बनाने वाले इस क़ानून में संशोधन के पक्ष में पहले से ही खड़े थे. और हो भी क्यों न. जब यह क़ानून इन नेताओं की असलियत का भंडाफोड़ कर रहा हो. एक उदाहरण पर ग़ौर करें. आरटीआई की बदौलत ही आम लोग यह जान सके कि चार साल में हमारे देश के मंत्रियों ने चाय-पानी पर आम आदमी की गाढ़ी कमाई में से लगभग 26 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए. जितनी तेज इन्हें प्यास लगती है, उतनी ही तेज प्यास इनकी गाड़ियों को भी लगती है. इसके अलावा साल 2003 से 2008 के बीच 44 मंत्रालयों एवं उनके अधीन विभिन्न विभागों के मंत्रियों एवं अधिकारियों ने केवल स्थानीय यात्राओं पर 58 करोड़ 54 लाख रुपये उड़ा दिए.
केंद्र सरकार का कार्मिक विभाग, जो इस क़ानून के लिए नोडल एजेंसी के तौर पर काम करता है, शुरू से ही इस क़ानून के कुछ नियमों में फेरबदल करना चाहता था. सूचना क़ानून बनने के पहले ही साल में कुछ ब्यूरोक्रेट्स की सलाह पर सरकार ने इसमें संशोधन कर फाइल नोटिंग जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान को ख़त्म करने की कोशिश की. हालांकि सिविल सोसायटी, वामपंथी पार्टियों और कुछ संगठनों के भारी विरोध के बाद सरकार ने यह फैसला वापस ले लिया था. फिर भी बार-बार केंद्र और राज्य सरकारें इस क़ानून के नियमों में कुछ न कुछ हेरफेर के चक्कर में लगी ही रहती हैं, ताकि आम आदमी की ताक़त दिनोंदिन कमज़ोर होती जाए. कोई सवाल न पूछ सके, कोई बदलाव न हो सके, ताकि बिहार के मधुबनी ज़िले का कोई दूसरा चंद्रशेखर आरटीआई की वजह से पंचायत शिक्षक नियुक्ति में हुए फर्जीवाड़े का खुलासा न कर सके. या उड़ीसा की 70 वर्षीय कबनाकलता त्रिपाठी की 13 साल से लटकी पेंशन आरटीआई डालने के बाद एक महीने में न मिल सके. या फिर बिहार के बेगूसराय के विष्णुदेव शर्मा द्वारा एक आवेदन डालते ही उनकी बकाया पेंशन बैंक वालों को उनके खाते में डालने की जहमत न उठानी पड़े.
आरटीआई में प्रस्तावित संशोधन के मुद्दे पर जब चौथी दुनिया ने रेमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल से बात की तो उनका कहना था कि सरकार को हमारी मांगें दिखाई नहीं देतीं. हम सालों से कहते आ रहे हैं कि सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया बनाई जाए, ताकि अच्छे लोगों को सूचना आयुक्त बनाया जा सके, लेकिन इस ओर ध्यान देने के बजाय केंद्र सरकार आम आदमी के इस क़ानून को और कमज़ोर बनाने में लगी हुई है. दरअसल, पूर्व नौकरशाहों को सरकार सूचना आयुक्त नियुक्त करती रही है. कुछ वर्तमान सूचना आयुक्त तो डीओपीटी में ही सचिव रह चुके हैं. असल में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ज़िम्मेदार विभाग डीओपीटी के पास नियुक्ति के संबंध में कोई स्पष्ट नियम-क़ानून नहीं हैं. इसी का फायदा उठाकर सरकार अपने विश्वस्त एवं व़फादार ब्यूरोक्रेट्स को सूचना आयुक्त बना देती है, जो किसी भी क़ीमत पर अपने आकाओं के हितों की अनदेखी नहीं कर सकते. कुछ राज्य सरकारें भी अपने यहां इस क़ानून के नियमों में संशोधन करती रही हैं. मसलन, कुछ राज्य सरकारों ने आरटीआई शुल्क दस के बजाय 100 रुपये और फोटो कॉपी शुल्क 2 के बजाय 5 रुपये कर दिया. जून, 2009 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर 14 महत्वपूर्ण विषयों को इस क़ानून के दायरे से बाहर निकालने का तुगलकी फरमान जारी किया था. ज़ाहिर है, ऐसे फरमानों का मकसद गरीबों को उनके अधिकारों से वंचित करने और उनके सशक्तिकरण को रोकने के बराबर ही माना जाएगा. क्योंकि, आरटीआई ही वह क़ानून है, जिसने ग़रीबों को राशन तक दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. दिल्ली में तो ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं. पुरी की अनासारा गांव की 68 वर्षीय जनातुन बेगम और उनके पति को अंत्योदय योजना के तहत मिलने वाला अनाज आरटीआई की वजह से दोबारा मिलना शुरू हुआ था. जहानाबाद ज़िले के कताई बिगहा गांव में ग्रामीणों को सही मात्रा में राशन और मिट्टी का तेल मिलने लगा था. यही नहीं, सूचना के अधिकार ने पुलिस की तानाशाही को भी काफी हद तक कम किया है. उदाहरण के लिए पटना के सगुना निवासी अमित आनंद की जमीन कोइलवर थानाध्यक्ष के क़ब्ज़े से मुक्त हो गई. देवरिया ज़िले के धनेसर यादव की बेटी का जब गांव के कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया और पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, तब धनेसर यादव ने सूचना कानून के तहत पुलिस कप्तान कार्यालय को आवेदन दिया, जिसमें उन्होंने अपनी शिक़ायत पर की गई कार्रवाई के बारे में पूछा. आवेदन मिलते ही पुलिस ने एफआईआर दर्ज करते हुए धनेसर की अगवा पुत्री को बरामद कर लिया और आरोपी भी गिरफ़्तार कर लिए गए.
लेकिन इस बार केंद्र सरकार आरटीआई के नियमों में संशोधन को लेकर जिस तरह गंभीर दिख रही है, उससे लगता है कि आम आदमी के जीने और जानने के अधिकार से जुड़ा यह क़ानून पंगु बन जाएगा. फिर कोई आम आदमी सवाल नहीं पूछ सकेगा. वे सवाल, जो उसे ताक़त देते हैं, सम्मान देते हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन राहुल गांधी या सोनिया गांधी की सलाह को ही कांग्रेस पार्टी आदेश मानती रही है, क्या वे भी इस मुद्दे पर चुप रहेंगे? क्या कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का उनका नारा महज़ नारा ही बनकर रह गया है? अब चाहे जो भी बात हो, जनता इनसे यह ज़रूर जानना चाहेगी कि अब कांग्रेस का हाथ किसके साथ है?
एनएसी और आरटीआई
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के एक उपसमूह की बैठक 13 दिसंबर को हुई. यह उपसमूह उत्तरदायिता और पारदर्शिता के लिए बना है, जिसकी अध्यक्ष एनएसी की सदस्य एवं सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय हैं. बैठक का एजेंडा डीओपीटी द्वारा आरटीआई क़ानून के नियमों में प्रस्तावित संशोधन था. उपसमूह का अध्यक्ष होने के नाते अरुणा राय को यह अधिकार है कि इस बैठक में वह कुछ बाहरी लोगों को भी बुला सकती हैं. नतीजतन इस बैठक में सूचना का अधिकार आंदोलन से जुड़े कुछ प्रख्यात लोगों जैसे शेखर सिंह, निखिल डे एवं अरविंद केजरीवाल को भी बुलाया गया. इन तीनों ने एक स्वर से प्रस्तावित संशोधन की मुख़ाल़फत की और इसे आम आदमी के ख़िला़फ बताया. बहरहाल, इस बैठक की रिपोर्ट एनएसी की अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंपी जाएगी. अगली बैठक दिसंबर के आख़िरी हफ्ते में होनी है. इस बात का इंतज़ार उक्त तीनों आरटीआई कार्यकर्ताओं के अलावा देश की जनता को भी रहेगा कि सोनिया गांधी एनएसी अध्यक्ष के नाते इस मुद्दे पर क्या रुख़ अपनाती हैं.
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आर टी आई क़ानून ने आम आदमी को बहतु ताकत दी है. आज एक पढ़ा लिखा व्यक्ति हिम्मत करता है कम से कम सरककर से जवाब पूछ सकता है. इस कानून ने सरकार की अफसर और राजनेताओ की नीद हिला दी है. एक याचिका लाखो, करोडो के भ्रस्ताचार को उजागर कर देती है.
अगर इस कानून में संसोधन लाया जा रहा है तो इसका मतलब केवल और केवल भ्रस्ताचार के खेल में व्यवधान पड़े आर टी आई क़ानून की ख़त्म करना है.
आजादी के बाद से केवल दो ही चीजो के भाव बड़े है-
१- जमीनों के -भ्रष्टाचारियो और कालाबाजारिओ के पास १०० करोड़ लोगो को घर मिल जावे इतनी जमीन है जो इनकेसाथ तो जाएगी नहीं फिर भी कब्जा जमाये बैठे है |
२- कमीनो के- भ्रष्टाचारियो ,गुंडों ,कालाबाजारियो .डाकुओ.लूटेरो के भाव इतने बाद गए है की क़ानून और पुलिस को ये जेब में लेकर चलते है |
आजादी के बाद से दो ही चीजो के भाव कम हुए है –
१- हसीनो के – टीवी,सिनेमा ,इन्टरनेट और पत्रिकाओं में १०/-२०/- रुपये में नंगी घूम रही है भारतीय संकृति में इन्हें वैश्या कहते है और धर्मनिरपेक्ष संस्कृति में इन्हें कलाकार या अदाकारा कहते है | टीवी के टेलेंट शोज में बाकायदा नंगा होने की हिम्मत रखने वाली पश्चिमी संस्कृति का अनुशरण करनेवाली भारतीय हसीनो की खोज की जा रही है और नतीजे भी मुन्नी की बदनामी और …शीला की जवानी की तरह बहुत अच्छे आ रहे | भारत सरकार की पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति के आपसी सांस्कृतिक आदान प्रदान की योजना सफल हो रही है |
२-पसीनो के – मेहनतकश पसीना बहाने वाले भारतीय नागरिको का कोई मोल नहीं रह गया दो वक्त की रोटी को तरस रहे है , प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह कहते है की गरीबो को सस्ता अनाज नहीं दे सकते क्योकि भ्रष्ट सांसदों को सस्ता शाही भोजन देना जरूरी है |
वाहरी सरकार धन्य है तू और तेरा भ्रष्टाचार ………………..
महेश चन्द्र वर्मा
प्रधान सम्पादक ,सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार ,साप्ताहिक,इंदौर
आरटीआई संशोध्ान:यह भ्रष्टाचार को बचाने की साजिश है
भ्रष्ट सरकारों का कोई कानून इस देश को भ्रष्टाचारियो की गुलामी से आजादी नहीं दिला सकता |
भारत माता को भ्रष्टाचारियो की गुलामी से केवल मै ही आजाद करवा सकता हु | किन्तु हमारे देश के भ्रष्ट नेता ,मंत्री,संत्री,अधिकारी और कर्मचारी चाहते ही नहीं है की भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण हो | मै पिछले तैतीस वर्षो से देश के भ्रष्ट कर्णधारों को लिखता आ रहा हु की मुझे देश से भ्रष्टाचार मिटाने का काम ठेके पर दे दो मै बासठ वर्षो के भ्रष्टाचार को मात्र सात वर्षो में भ्रष्टाचार मुक्त कर सकता हु ,किन्तु मेरे पत्रों को पड़कर देश के भ्रष्ट कर्णधारों को सांप सूंघ जाता है क्यों ?
आरटीआई क़ानून में कुछ खामियां हैं, जिनका बड़े स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है. यह आरटीआई क़ानून के अनेक प्रावधानों में अंतरावलोकन का समय है. (अक्टूबर 2010 में दिया गया बयान) (सितंबर 2009 में मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजे अपने पत्र में न्यायपालिका को आरटीआई क़ानून के दायरे से बाहर रखने का आग्रह किया था. तर्क यह कि इस क़ानून की वजह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है.)
के जी बालाकृष्णन
चेयरमैन, एनएचआरसी
अब देखिये देश की जनता जिनकी ओर न्याय की आस लिए देखती है और जो कानून और न्याय की दुहाई देते है वे ही स्वयं को कानून के दायरे से अलग रखना चाहते है क्योकि कानून का सरकारी व्यापार बंद हो जावेगा जिसका टर्न ओवर है पांच सौ लाख करोड़ सालाना ,यदि नहीं तो देश के पुलिस और न्यायालयों के भ्रष्ट अधिकारिओ की जमा संपत्तियो का हिसाब लगाकर देखलो हवलदार ही करोडपति मिलेंगे अधिकारिओ ,थानेदारो और न्यायधिशो की हराम की कमाई जोड़ी जावेगी तो यह पञ्च सौ लाख करोड़ सालाना के आकडे को भी पार कर जावेगी और देश के मुख्या न्यायाधीश महोदय कहते है की इस क़ानून की वजह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है |वे ऐसा कहने की हिम्मत इसलिए जुटा पाए क्योकि देश की जनता ही भ्रष्टाचार के दल-दल से बहार नहीं आना चाहती !
महेश चन्द्र वर्मा ,प्रधान सम्पादक , “सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार”
साप्ताहिक समाचार पत्र ,इंदौर ,म.प्र.
मै चौथी दुनिया के प्रधान सम्पादक महोदय से प्रार्थना करता हु की मेरी बात देश के भ्रष्ट कर्णधारों तक पहुचाने में मेरी मदद कर अनुग्रहीत करे |
धन्यवाद
… भ्रष्ट व्यवस्था रूपी विशाल इमारत में “सूचना का अधिकार” महज एक “छोटी खिड़की” से ज्यादा कुछ नहीं है, चंद चालाक लोग इस खिड़की का दुरुपयोग समझदारी पूर्वक कर रहे हैं तो कुछेक पीड़ित लोगों को तनिक न्याय की आस बनी है, वर्त्तमान समय में सिर्फ सूचना का अधिकार अधिनियम कारगर नहीं है वरन देश में एक स्वतन्त्र, निष्पक्ष व पारदर्शी (कम से कम एक ) इकाई का गठन अत्यंत आवश्यक है !!