शांति और विकास की चाहत ने जीत दिलाई

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गया ज़िले के दस विधानसभा क्षेत्रों के परिणामों ने सभी को दंग कर दिया. ज़िले में राजद-लोजपा गठबंधन और कांगे्रस की हालत इतनी खराब होगी, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था. अमन और विकास की हवा ऐसी चली कि जदयू-भाजपा को दस में से नौ सीटें मिल गईं. अब तो यही कहा जा सकता है कि नक्सलवाद से त्रस्त और विकास से मरहूम लोगों ने विकास की आस में जनादेश दिया है.

बात गया शहर विधानसभा क्षेत्र से शुरू करते हैं, जहां के विधायक और मंत्री प्रेम कुमार भाजपा के टिकट पर लगातार छठीं बार सफल रहे. मंत्री रहते शहर में पेयजल जैसी गंभीर समस्या का समाधान नहीं करने के साथ-साथ शहरवासी की उपेक्षा करने का आरोप प्रेम कुमार पर लगता रहा. वजीरगंज विधानसभा से भाजपा के वीरेंद्र कुमार सिंह को सफलता मिली. वह पिछले कई चुनाव में अतरी विधानसभा से भाजपा के टिकट पर चुनाव हार चुके थे. यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न था. यहां वीरेंद्र सिंह को अपने गठबंधन के ही सबसे अधिक बाग़ियों को झेलना पड़ा. इसके बावजूद उन्होंने कांग्रेस के अवधेश कुमार सिंह जैसे दिग्गज को बड़े अंतर से हराया. बाराचट्टी विधानसभा सुरक्षित से जदयू के वरिष्ठ नेता जीतन राम मांझी की समधिन ज्योति मांझी भी बड़े अंतर से जीतीं.

अतरी विधानसभा क्षेत्र से जदयू के एक सामान्य कार्यकर्ता प्रो. कृष्णनंदन यादव को सफलता मिली. यह क्षेत्र राजद के गढ़ के रूप में जाना जाता था और यहां के पूर्व विधायक राजेंद्र यादव के आतंक  का सशक्त विरोध कोई भी नहीं कर पाता था. लेकिन इस बार जनता ने साहस दिखाते हुए राजेंद्र को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

नवसृजित शेरघाटी विधानसभा क्षेत्र से पहले प्रतिनिधि के रूप में जदयू के विनोद प्रसाद यादव विधानसभा पहुंचे. बताया जाता है कि विधानसभा के अध्यक्ष उदयनारायण चौधरी का वरदहस्त उन्हें प्राप्त था. यहां राष्ट्रीय जनता दल से पूर्व मंत्री व राजद के वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान राजद प्रत्याशी थे. परिसीमन के बाद उन्होंने अपना क्षेत्र गुरुआ से बदलकर शेरघाटी कर लिया. लेकिन गुरुआ की उपेक्षा करने के मामले ने उनका पीछा नहीं छोड़ा और करारी शिकस्त मिली. इमामगंज विधानसभा क्षेत्र जदयू के लिए सबसे अधिक प्रतिष्ठा का प्रश्न था. यहां से बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदयनारायण चौधरी जदयू प्रत्याशी के रूप में थे. यहां प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी ने वोट बहिष्कार और उदय नारायण चौधरी के खिला़फ मत देने का आह्वान अपरोक्ष रूप से किया था. ब़डी मुश्किल से उन्हें जीत मिली.

गुरुआ विधानसभा क्षेत्र पर पहले से राजद का क़ब्ज़ा था, लेकिन परिसीमन से क्षेत्र ऐसा प्रभावित हुआ कि यहां के विधायक शकील अहमद खान को यहां से जाना पड़ा. यहां से भाजपा के सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा लगभग 11 हज़ार मतों से विजयी हुए. टिकारी विधानसभा क्षेत्र में डॉ. अनिल कुमार को पुन: बड़ी सफलता मिली.

अतरी विधानसभा क्षेत्र से जदयू के एक सामान्य कार्यकर्ता प्रो. कृष्णनंदन यादव को सफलता मिली. यह क्षेत्र राजद के गढ़ के रूप में जाना जाता था और यहां के पूर्व विधायक राजेंद्र यादव के आतंक का सशक्त विरोध कोई भी नहीं कर पाता था. लेकिन इस बार मतदाताओं ने पूर्व विधायक राजेंद्र यादव के आतंक से मुक्ति और विकास के सपने को साकार करने के लिए कृष्णनंदन यादव को करीब 20 हज़ार मतों से विजयी बनाया. बोधगया सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से पूर्व विधायक श्याम देव पासवान भाजपा के टिकट पर जीते. हालांकि यहां के तत्कालीन भाजपा के हरि मांझी के सांसद बन जाने के बाद हुए उप चुनाव में लोजपा के कुमार सर्वजीत ने सफलता प्राप्त की थी. लेकिन हरि मांझी के द्वारा क्षेत्र की उपेक्षा ‍किये जाने के आक्रोश में कुमार सर्वजीत को विधानसभा पहुंचने में मदद मिली. कहा जा सकता है कि भाजपा-जदयू के किसी प्रत्याशी ने नहीं बल्कि नीतीश कुमार ने जीत दर्ज की. बेलागंज विधानसभा क्षेत्र राजद के पूर्व मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव पुन: विजयी हुए. उन्होंने अपने विरोधी जदयू के मो. अमजद को क़रीब पांच हज़ार मतों से हराया. गया ज़िले के दस विधानसभा क्षेत्रों में विधानसभा चुनाव का लब्बोलुआब यही रहा कि नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में विकास के साथ लोगों को अमन-चैन चाहिए और लोगों ने इसी उम्मीद से जदयू-भाजपा को एक बड़ा जनादेश दिया.

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