उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्य और आतंकित ड्रैगन


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आख़िरकार भारत ने एक अच्छा काम किया. इसने चीन के लू श्याबाओ को मिले नोबल पुरस्कार समारोह में शिरकत करने का फैसला किया. भारत ने उन देशों से अलग रहने का निर्णय किया, जो इस मुद्दे पर चीन के समर्थन में थे और ली को मिलने वाले पुरस्कार का बहिष्कार कर रहे थे. इस मुद्दे पर चीन का साथ देने वाले ज़्यादातर देशों का रिकॉर्ड मानवाधिकार के मामले में बहुत ख़राब रहा है. मैं जानता हूं, इनमें से कई गुट निरपेक्ष आंदोलन के सदस्य हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में भारत का गुट निरपेक्ष आंदोलन में बने रहना बेतुका लगता है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि सउदी अरब, क्यूबा और सोमालिया चीन के साथ खड़े नज़र आए. लेकिन विचित्र बात यह है कि चीन अंतरराष्ट्रीय अनुमोदन से कैसे डरा हुआ है? एक असहमत आदमी को मिले पुरस्कार से चीन इतना चिंतित है कि उसने इसके बहिष्कार की घोषणा कर दी और बाक़ी देशों से भी इसके लिए अपील की. यही कारण है कि चीन ने जल्दबाज़ी में कन्फ्यूशियस पुरस्कार की घोषणा कर दी. मुझे शक है कि हो न हो, अगले साल फिर एक किसी असंतुष्ट चीनी को कहीं नोबल पुरस्कार न मिल जाए.

शूद्र या दलित भारत में कभी भी समान अधिकार नहीं पा सके. मुस्लिम शासक भी इस्लाम के मूल तत्व समानता की बात लागू नहीं करा पाए. सच्चाई यह है कि औपनिवेशिक काल ने आर्थिक शोषण करने के बावजूद भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करने के हिसाब से काफी कुछ दिया है. स्वतंत्रता के 63 सालों बाद भारत औपनिवेशिक काल की बुरी यादों को पीछे छोड़कर एक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है.

मुझे याद आ रहा है कि कैसे 1958 में संयुक्त सोवियत रूस अपने नागरिक बोरिस पैसट्रेनक को उनके उपन्यास डॉक्टर शिवागो के लिए नोबल पुरस्कार मिलने पर डरा हुआ था. हमारे देश में भी स्थानीय कम्युनिस्ट हैं, जो इस उपन्यास को बिना पढ़े ही इसकी निंदा करते नहीं थकते. इनमें से बहुतों का कहना है कि बोरिस को पुरस्कार देने के पीछे अमेरिका की वह साम्राज्यवादी सोच थी, जो रूस को बदनाम करना चाहती थी. चूंकि ख्रुश्चेव ने ख़ुद ही स्टालिन के कृत्यों की घोर निंदा की थी, ऐसे में मैं नहीं जानता कि कोई और इससे ज़्यादा बुरा क्या कर सकता था. लेकिन एक ताक़तवर तानाशाही शासन की यही प्रकृति भी होती है. ये लोग आम आदमी की राय से डरते हैं. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर दोनों पर. चीन ताक़तवर है, लेकिन इसका शासन एक भुरभुरे पदार्थ की तरह है. यदि आप थ्यानमेन टेप कार्यवाही को ग़ौर से पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि पोलित ब्यूरो के बूढ़े सदस्य कितने डरे हुए थे. उनमें इतना साहस नहीं था कि वे विरोध कर रहे नौजवानों से बातचीत कर सकें. चीनी शासन इतना डरा हुआ था कि उसने इन निहत्थे नौजवानों के ख़िला़फ टैंक का इस्तेमाल किया.

मतभेद के किसी मसले पर भारत में भी कई ऐसे क्षण आए हैं, जब सरकार ने सही क़दम नहीं उठाए. मक़बूल फिदा हुसैन को ज़बरन देश निकाला और हिंदू कट्टरवादियों द्वारा उनका अपमान एक लोमहर्षक घटना थी. सलमान रुश्दी की किताब को प्रतिबंधित करने, ऐसे लोगों द्वारा उसकी प्रतियां जलाने और दंगा भड़काने की कोशिश, जिन्होंने कभी उस किताब को पढ़ा ही नहीं, भी ऐसे ही उदाहरणों में शामिल हैं. इस तरह संविधान में मौलिक अधिकार की व्यवस्था के बाद भी सरकार ने किताब को प्रतिबंधित करके भारत को ऐसे देशों की कतार में शामिल कर दिया, जो प्रतिक्रियावादी माने जाते हैं. चीन के मामले में भी अगर देखा जाए तो यह हो सकता है कि भारत में भी कई लोग लू श्याबाओ की क़ैद को जायज़ समझते हों. लेकिन एक देश के रूप में भारत इस सोच का साथी नहीं बन सकता. भारत का संविधान एक ऐसा दस्तावेज है, जो उदारवादी लोकतांत्रिक परंपरा के प्रति भारत के लगाव को सुनिश्चित करता है. इसी परंपरा ने अंग्रेजों के ख़िला़फ भारत के शस्त्रविहीन आंदोलन को रास्ता दिखाया. असल में गांधी, नेहरू या कांग्रेस के ज़्यादातर नेताओं ने ब्रिटेन में रहने के दौरान ही इन मूल्यों को भलीभांति समझ लिया था. दादाभाई नौरोजी के जमाने से ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मूल आलोचना इसी बात को लेकर थी कि भारत में ब्रिटिश शासन ग़ैर ब्रिटिश रूप से चल रहा था.

बहुत से लोगों के लिए इस धारणा को मानने में शर्म महसूस होती है कि मानवाधिकार पश्चिमी देशों से आया है, लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि भारत के अतीत ने ही हमें बताया है कि कैसे लोगों के बीच समान अधिकार की बात की जा सकती है. अशोक या अकबर की सहनशीलता या जहांगीर का न्याय, ये ऐसी बातें हैं, जिन पर गर्व किया जा सकता है. लेकिन समग्र रूप से देखें तो भारतीय समाज ने इस समानता को कभी स्वीकार नहीं किया. शूद्र या दलित भारत में कभी भी समान अधिकार नहीं पा सके. मुस्लिम शासक भी इस्लाम के मूल तत्व समानता की बात लागू नहीं करा पाए. सच्चाई यह है कि औपनिवेशिक काल ने आर्थिक शोषण करने के बावजूद भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात करने के हिसाब से काफी कुछ दिया है. स्वतंत्रता के 63 सालों बाद भारत औपनिवेशिक काल की बुरी यादों को पीछे छोड़कर एक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है. ज़रूरत स़िर्फ उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की है. अगर भारत इस चीज को खो देता है तो यह भी चीन की तरह एक आतंकित तानाशाह बन जाएगा.


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