
विस्मार्क ने कहा था कि कोई भी सच तब तक सच नहीं है, जब तक आधिकारिक तौर पर उसका खंडन न कर दिया जाए. आज यही बात हम थोड़े अलग अंदाज़ में कह सकते हैं. मसलन, कोई भी सच तब तक सच नहीं है, जब तक वह लीक न हो जाए और खासकर इंटरनेट पर. अभी हमारे पास विकीलीक्स है, राडिया के टेप हैं, कुछ और सच भी हो सकते हैं, जो ऑनलाइन लीक किए जाएंगे या मीडिया के हाथों में दे दिए जाएं. आधिकारिक तौर पर शासन हमेशा ऐसे खुलासों की भर्त्सना ही करता है, लेकिन ऑनलाइन खुलासे को नकार पाना बहुत कठिन काम है.ऐसे खुलासे को संदर्भहीन बता पाना भी मुश्किल है. यही कारण है कि ये खुलासे लगातार हो पा रहे हैं. कुछ खुलासे, जैसे कि अमेरिका ईरान को परमाणु ताक़त बनने से रोकना चाहता है और उसके इस काम में सउदी अरब, इजरायल और जॉर्डन सहायता करने को लालायित हैं, शायद ही चौंकाएं, लेकिन उत्तरी कोरिया की रक्षा करते-करते अब चीन उब गया है, यह आश्चर्य पैदा करने वाला खुलासा है.
वैसे उन सभी लोगों को, जो यह सोचते हैं कि चीन की अधिनायकवादी व्यवस्था भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के मुक़ाबले चीन में ज़्यादा विकास कर सकी है, यह साफ करना चाहिए कि दक्षिण कोरिया के मुक़ाबले उत्तरी कोरिया क्यों इतना ग़रीब है. कैसे उत्तरी कोरिया एक लड़ाकू देश बनता जा रहा है. मुझे लगता है कि इनके राजनयिकों को पहले से इस खुलासे का अंदेशा था. उत्तरी कोरिया जल्दी से ऐसे हालात पैदा करना चाहता था, जो चीन को उसकी मदद करने के लिए बाध्य करें. अगर कोरियाई युद्ध पूर्वी एशिया में फैलता है तो चीन एक छोर और अमेरिका दूसरे छोर पर होगा. और भारत को सावधानीपूर्वक अपनी सीमा देखनी होगी. विकीलीक्स से एक और मजेदार कहानी का खुलासा हुआ है. वह यह कि अमेरिका लगातार पाकिस्तान से त्रस्त होता जा रहा है. उसे पाकिस्तान से सीमित फायदा ही है. चाहे वह आतंक के ख़िला़फ उसकी जमीन का इस्तेमाल हो या नाभिकीय ईंधन की सुरक्षित आपूर्ति. हम देखते हैं कि अमेरिका पाकिस्तानी कट्टरता और उसे दी जाने वाली विशाल आर्थिक सहायता जिसका इस्तेमाल वह हथियार ख़रीदने में करता है, के आगे असहाय है. अमेरिका ने ख़ुद को एक गड़बड़ झाले में फंसा लिया है. पहले पाकिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल तालिबानियों को सहायता देने में, ताकि अ़फग़ानिस्तान से सोवियत सेना को भगाया जा सके और एक बार फिर उन्हीं तालिबानियों को अ़फग़ानिस्तान से निकालने में. ये दोनों काम ही अमेरिका के लिए फांस बन गए. ओसामा बिन लादेन तो उतना ही शुद्ध है, जितना अमेरिकी उत्पाद सुपर मैक.
भारत के लिए यह व्यर्थ है कि वह पाकिस्तान को आरोपित करने के लिए अमेरिका पर निर्भर रहे. अमेरिका जब अ़फग़ानिस्तान में फंसा तो उसे ब्लैकमेल करने के लिए पाकिस्तान को एक सुनहरा अवसर हाथ लग गया. जोसेफ बिडेन की वह बात जो उन्होंने गॉर्डन ब्राउन को बताई, यह साबित करती है कि अमेरिकी कितने सहमे हुए हैं.
ज़रदारी ने बिडेन को कहा था कि उन्हें चिंता है कि पाक सेना प्रमुख जनरल कियानी उनकी हत्या करा सकते हैं. वह जानते हैं कि वह एक शेर की सवारी कर रहे हैं और इस सवारी से उतरने में उन्हें डर लग रहा है. ओबामा शायद भारत की पीठ थपथपा सकते हैं, लेकिन जब आपने इस्लामाबाद में अमेरिकी राजदूत द्वारा भेजे गए ई-मेल को देख लिया है, तब ऐसे में अमेरिकी समर्थन का क्या महत्व है. किसी भी हालत में भारत अमेरिका से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि वह उसके हित में कुछ करे. इसके लिए भारत को ख़ुद पर ही निर्भर होना पड़ेगा. अगली बार हो सकता है कि अमेरिका कुछ नीतियां थोपने की कोशिश करे. मसलन, परमाण्विक नागरिक जवाबदेयता बिल. भारत को तब इसे सिरे से खारिज कर देना चाहिए.
राडिया के टेप भी कुछ यही कहानी कहते हैं. इस बात में कोई आश्चर्य नहीं है कि औद्योगिक घराने अपने स्वार्थ के लिए जन संपर्क एजेंसियों की सेवाएं लेते हैं, जो उनकी ओर से लोगों से संपर्क करें. असल आश्चर्य की बात तो यह है कि भारतीय राजनीति में पनप रहे भ्रष्टाचार के बारे में हमारी जो आशंकाएं थीं, वे सही साबित हो रही हैं. दिक्कत स़िर्फ इस बात की है कि जिस मीडिया के बारे में हम यह मानते थे कि वह राजनीतिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के मामले में निष्पक्ष रहता है, वह मीडिया भी दूषित हो गया. राजनीतिज्ञों ने उन सबको भ्रष्ट बना दिया, जो उनके संपर्क में आए. दुनिया भर के लोगों ने इस भ्रष्टाचार पर ध्यान दिया है. अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत व्यापार के लिए सही जगह रह गया है. भारत भ्रष्टाचार के मसले पर अपनी नग्नता छुपा पाने में असफल रहा है. आज हम 2-जी, सीवीसी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा रियल एस्टेट कंपनियों को ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से लोन देने जैसे घोटालों से दो-चार हो रहे हैं. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की स्थिति के बारे में क्या कहा जाए. कांग्रेस के पास अपना बचाव करने का अजीब नुस्खा है. वह कहती है कि भाजपा भी भ्रष्ट है. क्या इस तरह अपने बचाव के तरीक़े को गंभीर कहा जा सकता है? क्या भारतीयों को इस बात से ख़ुश होना चाहिए कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भ्रष्ट हैं और खुलेआम ऐसा बोल रही हैं? क्या मतदाताओं के पास स़िर्फ यही एक लोकतांत्रिक विकल्प बचा है कि वे कम या ज़्यादा भ्रष्ट पार्टियों में से किसी एक को चुनें?
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