डॉ. बिनायक सेन के मामले में आए अदालती फैसले के बाद लोकतांत्रिक ढांचे के तीन स्तंभ न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना के केंद्र में हैं, पर चौथा स्तंभ मीडिया अब तक इस चर्चा से बाहर है. जबकि स्थानीय यानी छत्तीसगढ़ी मीडिया ने आज से चार साल पहले ही बिनायक सेन को दोषी क़रार दे दिया था. राज्य मशीनरी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले छत्तीसगढ़ के मीडिया ने बिनायक सेन को लेकर प्रारंभिक दौर में ही दुष्प्रचार का एक ज़बरदस्त अभियान छेड़ रखा था. उस दौरान लगभग ख़बरें पूर्वाग्रह और दुष्प्रचार से प्रेरित थीं. पत्रकार तिहरी भूमिकाएं निभा रहे थे. वे पत्रकार भी थे, पुलिस भी और जज भी. ख़बरों के लिए पुलिसिया स्रोत ही पहला और आख़िरी स्रोत था. थाने से निकला वक्तव्य सारे सचों से ऊपर था. आरोपी को अपराधी लिखने-साबित करने की होड़ सी मची थी. मामला ठीक से अदालत भी नहीं पहुंच पाया था कि मीडिया ने अपना एकतरफा फैसला सुना दिया और डॉ. बिनायक सेन रातोंरात चिकित्सक से खूंख्वार हो गए.
स्थानीय अख़बारों की मंशा साफ ज़ाहिर होती है कि किस तरह डॉ. बिनायक सेन के ख़िला़फ शुरुआती दौर से ही माहौल बनाया जा रहा था. हरिभूमि अपनी ख़बरों में एक क़दम आगे बढ़कर यह माहौल तैयार कर रहा था कि इलिना सेन को भी गिरफ़्तार कर लिया जाना चाहिए, क्योंकि ये सारे जनवादी ख़तरनाक हैं. पुलिस और सरकार के लिए किसी भी व्यक्ति को अपराधी घोषित करना बेहद आसान होता है. इस प्रक्रिया में यदि मीडिया की पर्याप्त मिलीभगत हो तो मनमाफिक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं.
डॉ. सेन की गिरफ़्तारी के बाद से ही स्थानीय मीडिया दुष्प्रचार के सुनियोजित काम में लग गया था. स्थानीय अख़बारों ने मोटे-मोटे शीर्षक के साथ ख़बर लगाई, पुलिस के हत्थे चढ़ा नक्सली डाकिया. हरिभूमि ने लिखा, जिस नक्सली डाकिए की तलाश में रायपुर पुलिस दिन-रात जुटी थी, उसे मुखबिर की सूचना पर पकड़ने में तारबाहर पुलिस को सफलता हासिल हुई है. बिनायक सेन नामक इस व्यक्ति की तलाश रायपुर पुलिस को थी. माना जा रहा है कि यह जेल में बंद और शहर में गोपनीय रूप से रह रहे नक्सलियों का पत्रवाहक है. उनकी सूचनाओं को बस्तर और दूसरी जगहों में तैनात नक्सलियों तक पहुंचाने के लिए इसने अपना अलग तंत्र तैयार कर रखा है. घेराबंदी कर नक्सलियों के इस प्रमुख डाकिए को पुलिस ने धर दबोचा. शुरू से ही यह आशंका थी कि नक्सलियों का यह प्रमुख डाकिया बिलासपुर ज़िले में कहीं छिपा हुआ है. इस ख़बर के बीच में उपशीर्षक देकर एक और ख़बर थी, नक्सली देखने थाने में लगी भीड़. लिखा था, तारबाहर पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद बिनायक सेन की नक्सलियों के प्रमुख डाकिए के रूप में पहचान हुई. यह ख़बर पूरे शहर में फैल गई. तारबाहर थाने में नक्सली डाकिए को देखने के लिए लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. लोग उसकी एक झलक पाने के लिए काफी समय तक खड़े रहे. ऐसी तमाम ख़बरों में डॉ. बिनायक सेन के लिए हर जगह नक्सली डाकिया, नक्सली मैसेंजर एवं नक्सली हरकारा जैसे विशेषण ही इस्तेमाल किए गए. ख़बर की भाषा और लहजे को ऐसे बरता गया, मानों गिरफ़्तार किए गए शख्स की सार्वजनिक पहचान से सारे अखबार अनजान हों. उनके नाम के आगे न डॉक्टर था, न मानवाधिकार कार्यकर्ता. एक अपरिचित पाठक के लिए बिनायक सेन का मतलब चोर, बलात्कारी या चाकूबाज कुछ भी हो सकता है. पूरे दो हफ्ते तक डॉ. बिनायक सेन की चिकित्सक और मानवाधिकार कार्यकर्ता की पहचान सुनियोजित तरीक़े से छुपाई गई. इससे पहले तक डॉ. बिनायक सेन की समाजसेवा और मानवाधिकारों को लेकर उनके संघर्ष को स्थानीय मीडिया में कोई जगह नहीं मिली. जब उन्हें दुर्भावनावश गिरफ़्तार कर लिया गया तो स्थानीय मीडिया इस मामले को लेकर अचानक इस तरह से सामने आया, जैसे उसने डॉ. सेन के नक्सली होने की पूरी पड़ताल पहले से ही कर रखी हो. कई अख़बार इनकी गिरफ़्तारी के पहले से ही पीयूष गुहा (पुलिस द्वारा गिरफ़्तार व्यवसायी) के लिए नक्सली मैसेंजर लिख रहे थे. बाद में यही विशेषण डॉ. सेन के लिए भी प्रयोग किया जाने लगा. उक्त अख़बार छत्तीसगढ़ पुलिस के नक्शेक़दम पर चल रहे थे, क्योंकि जेल के दस्तावेजों में डॉ. बिनायक सेन को हार्डकोर नक्सली दर्ज किया गया था. हालांकि तब कई संगठनों ने इसका विरोध किया था कि न्यायिक फैसले के पूर्व इस तरह के दुष्प्रचार सर्वथा अनुचित हैं.
यह अदालती ट्रायल के पहले का ट्रायल था, जिसकी बुनियाद पूर्वाग्रह, भ्रम, दुष्प्रचार और तथ्यहीनता पर केंद्रित थी. दुष्प्रचार का अभियान चलाने वाले अख़बारों में बड़े समझे जाने वाले नाम भी शामिल थे. नई दुनिया ने लिखा, नक्सली सूची में कई बड़े लोग. यह ख़बर किसी कोण से तथ्यात्मक नहीं थी, बल्कि एक मुहिम का हिस्सा थी. इसी अख़बार ने लिखा, एनजीओ की दो युवतियां लापता. यह डॉ. सेन की छवि ध्वस्त करने की एक और कोशिश थी. पुलिस ने इसे ज़बरदस्ती एक गंभीर मामला बताया और कहा कि इस आधार पर इलिना सेन के ख़िला़फ भी जुर्म साबित किया जा सकता है. ग़ौरतलब है कि जिस एनजीओ (रूपांतर) में काम करने के लिए दोनों लड़कियां दिल्ली गई थीं, उसे इलिना सेन चलाती थीं. दोनों लड़कियां, जिन्हें लापता बताया जा रहा था, वे बालिग थीं. यदि वे रूपांतर छोड़कर कहीं और चली गई थीं तो यह सर्वथा उनका फैसला था. पर इस ख़बर को जिस तरीक़े से बिनायक सेन और उनके परिवार के ख़िला़फ गढ़ा गया, वह दुराग्रहपूर्ण और दुष्प्रचार का हिस्सा था. हरिभूमि की एक ख़बर थी, नक्सली समर्थकों की खैर नहीं. इसमें ख़बर जैसा कुछ भी नहीं था. एक कहानी थी, जिसमें सलवाजुडूम की शुरुआत को उस दिन से माना गया था, जब बस्तर में भगवान गणेश की मूर्ति को नक्सलियों ने तोड़ा-फोड़ा था, गणेश बैठाने का विरोध कर हिंदू धर्म पर हमला बोला था और अपने ख़िला़फ स्वयं ही माहौल तैयार कर लिया था. सलवाजुडूम की स्थापना की यह एक हास्यास्पद कथा थी. ख़बर में आगे सफेदपोश नक्सलियों पर रासुका के तहत कार्रवाई की बात कही गई थी. अख़बार साफ तौर पर अपना मत ज़ाहिर कर रहा था कि सेन पर रासुका के तहत राजद्रोह लगे. इससे स्थानीय अख़बारों की मंशा समझी जा सकती है.
इसी तरह दैनिक भास्कर ने लिखा, धर्मांतरण के आरोप में युवकों की पिटाई. यह ख़बर भी सीधे तौर पर दुष्प्रचार के तहत प्लांट की गई थी. लिखा गया कि डॉ. बिनायक सेन अपने प्रभाव वाले गांवों में धर्मांतरण करा रहे थे. इसके लिए उन्होंने कई युवकों को पैसे दिए थे. साथ ही बगरूमनाला में क्लीनिक चलाने के पीछे भी धर्मांतरण ही इनका मुख्य मकसद था. इस बेबुनियाद ख़बर की कोई सीमा नहीं थी. ज़ाहिर है, इसे बिनायक सेन की
चिकित्सक-सामाजिक कार्यकर्ता वाली छवि खंडित करने के लिए प्रकाशित किया गया था.
दुष्प्रचार की इसी कड़ी में नवभारत ने ख़बर बनाई, बस्तर में बिजली टावरों को उड़ाने का षड्यंत्र सान्याल ने जेल में रचा. ख़बर के बीच तस्वीर बिनायक सेन की लगी थी. शीर्षक से संबंधित केवल एक पंक्ति लिखी गई, शेष चार कॉलमों में पूरी बात सेन पर केंद्रित थी कि वह और श्रीमती सेन नक्सलियों से मिले हुए हैं. उनके बीच इनकी घुसपैठ है. सेन के चिकित्सक होने को भी झुठलाया गया. ख़बर के बीच में उनकी तस्वीर इस प्रकार लगाई गई, जैसे टावर डॉ. सेन ने ही उड़ाया हो. स्थानीय अख़बार शुरू में सेन को फरार और भगोड़ा तक घोषित कर चुके थे, जबकि वह बच्चों के साथ कोलकाता के पास कल्याण में अपनी मां से मिलने गए हुए थे. उन्हें मित्रों से जानकारी मिली कि पुलिस के साथ-साथ मीडिया भी उन्हें फरार बता रहा है. इस पर उन्होंने फौरन अख़बारों से संपर्क कर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी और अपना मोबाइल नंबर भी प्रकाशित कराया था कि जिन्हें कोई शंका हो, वे बात कर लें.
इस किस्म की ख़बरों से स्थानीय अख़बारों की मंशा साफ ज़ाहिर होती है कि किस तरह डॉ. बिनायक सेन के ख़िला़फ शुरुआती दौर से ही माहौल बनाया जा रहा था. हरिभूमि अपनी ख़बरों में एक क़दम आगे बढ़कर यह माहौल तैयार कर रहा था कि इलिना सेन को भी गिरफ़्तार कर लिया जाना चाहिए, क्योंकि ये सारे जनवादी ख़तरनाक हैं. पुलिस और सरकार के लिए किसी भी व्यक्ति को अपराधी घोषित करना बेहद आसान होता है. इस प्रक्रिया में यदि मीडिया की पर्याप्त मिलीभगत हो तो मनमाफिक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. डॉ. बिनायक सेन के मामले में पुलिस और राज्य सरकार ने मीडिया की सहायता से यही काम किया. दुष्प्रचार के लिए ऐसी आधारहीन ख़बरें प्लांट की गईं, जिनसे बिनायक सेन के व्यक्तित्व और सार्वजनिक कार्यों को न केवल ज़बरदस्त क्षति पहुंचे, बल्कि उन्हें सीधे तौर पर नक्सली साबित कर न्यायालय पर भी पर्याप्त दबाव बनाया जा सके. आज साढ़े तीन साल बाद जब डॉ. सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है तो इसे राज्य सरकार, पुलिस एवं ब्यूरोक्रेसी के षड्यंत्र के साथ-साथ स्थानीय मीडिया के ट्रायल, दुष्प्रचार और उसके पूर्वाग्रह के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए. जहां तक न्यायालय की भूमिका का सवाल है, अदालतें राजनीतिक समीकरणों और मीडिया के प्रभाव से निरपेक्ष नहीं होती हैं.
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कुते की तरह तलुये चाटने की आदत पड गई है हिंदी पत्रकारों को । जब बोलता हूं , पुलिस द्वारा नक्सलवादियों के साथ किये जा रहे जुल्म या उनकी फ़र्जी मुठभेड मे की गई हत्या को न्यायसंगत नही ठहराया जा सकता तो महान अखबार और पत्रिकाओं के पत्रकारों का की सलाह होती है जाने दिजिये ठिक हीं तो हो रहा है । डा० बिनायक अगर अपराधी हैं तो इस मुल्क का हर वह शख्स अपराधी है जो सरकार की नितियों से इतेफ़ाक नही रखता । मेरा तो सलाम है डा० बिनायक को ।
“लोकतांत्रिक ढांचे के तीन स्तंभ न्यायपालिका, कार्यपालिका एवं विधायिका राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना के केंद्र में हैं, पर चौथा स्तंभ मीडिया अब तक इस चर्चा से बाहर है”.
तो चर्चा कहाँ हो रही है ।
पूरे प्रदेश के मीडिया पर इस तरह से इल्जाम लगाना क्या दर्शाता है ।डॉ बिनायक सेन की गिरफ़्तारी के पहले कितने लोग उन्हे छत्तीसगढ़ में जानते थे ? वेल्लोर(तमिलनाडू) से छत्तीसगढ़ आने के पीछे क्या प्रयोजन था ।