हंगामा है क्यों बरपा

छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के उपाध्यक्ष बिनायक सेन को राजद्रोह के मामले में उम्रकैद की सज़ा सुनाई. बिनायक सेन को यह सज़ा कट्टर नक्सलियों के साथ संबंध रखने और उनको सहयोग देने के आरोप में सुनाई गई है. अदालत द्वारा बिनायक सेन को उम्रकैद की सज़ा सुनाए जाने के बाद देश भर के मुट्ठी भर चुनिंदा वामपंथी लेखक-बुद्धिजीवी आंदोलित हो उठे हैं. उन्हें लगता है कि न्यायपालिका ने बिनायक सेन को सज़ा सुनाकर बेहद ग़लत किया है और राज्य की दमनकारी नीतियों का साथ दिया है. उन्हें यह भी लगता है कि यह विरोध की आवाज़ को कुचलने की एक साजिश है. बिनायक सेन को हुई सज़ा के ख़िला़फ वामपंथी छात्र संगठन से जुड़े विद्यार्थी और नक्सलियों के हमदर्द दर्जनों बुद्विजीवी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए और उन्होंने जमकर नारेबाज़ी की. बेहद उत्तेजक और घृणा से लबरेज भाषण दिए गए. जंतर-मंतर पर जिस तरह के भाषण दिए जा रहे थे, वे बेहद आपत्तिजनक थे. वहां बार-बार यह दुहाई दी जा रही थी कि राज्य सत्ता विरोध की आवाज़ को दबा देती है और अघोषित आपातकाल का दौर चल रहा है. वहां मौजूद एक वामपंथी विचारक ने शंकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या को सरकार-पूंजीपति गठजोड़ का नतीजा बताया. उनका तर्क था, जब भी राज्य सत्ता के ख़िला़फ कोई आवाज़ अपना सिर उठाने लगती है तो सत्ता उसे ख़ामोश करने का हरसंभव प्रयास करती है.

शंकर गुहा नियोगी या सफदर की हत्या की पुरजोर निंदा की जानी चाहिए और दोषियों को किसी भी क़ीमत पर नहीं बख्शा जाना चाहिए, लेकिन उतने ही पुरजोर तरीक़े से फैक्ट्री मैनेजर की हत्या का भी विरोध होना चाहिए और उसके मुजरिमों को भी उतनी ही सज़ा मिलनी चाहिए, जितनी नियोगी और सफदर के हत्यारों को. दो अलग-अलग हत्याओं के लिए दो अलग-अलग मापदंड नहीं हो सकते.

शंकर गुहा नियोगी और सफदर हाशमी की हत्या तो इन वामपंथी लेखकों-विचारकों को याद रहती है, उसके ख़िला़फ डंडा-झंडा लेकर साल दर साल धरना-प्रदर्शन एवं विचार गोष्ठियां भी आयोजित होती हैं, लेकिन उसी साहिबाबाद में नवंबर में पैंतालिस साल के युवा मैनेजर की मज़दूरों द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने के ख़िला़फ इन वामपंथियों ने एक भी शब्द नहीं बोला. मज़दूरों द्वारा मैनेजर की सरेआम पीट-पीटकर नृशंस तरीक़े से हत्या पर इनमें से किसी ने भी मुंह खोलना गंवारा नहीं समझा. कोई धरना-प्रदर्शन या बयान तक जारी नहीं हुआ, क्योंकि मैनेजर तो पूंजीपतियों का नुमाइंदा होता है, लिहाज़ा उसकी हत्या को ग़लत क़रार नहीं दिया जा सकता है. लेकिन वामपंथी यह भूल जाते हैं कि गांधी के इस देश में हत्या और हिंसा को किसी भी तरह जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है. शंकर गुहा नियोगी या सफदर की हत्या की पुरजोर निंदा की जानी चाहिए और दोषियों को किसी भी क़ीमत पर नहीं बख्शा जाना चाहिए, लेकिन उतने ही पुरजोर तरीक़े से फैक्ट्री मैनेजर की हत्या का भी विरोध होना चाहिए और उसके मुजरिमों को भी उतनी ही सज़ा मिलनी चाहिए, जितनी नियोगी और सफदर के हत्यारों को. दो अलग-अलग हत्याओं के लिए दो अलग-अलग मापदंड नहीं हो सकते.

ठीक उसी तरह अगर बिनायक सेन के कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं तो उन्हें इसकी सज़ा मिलनी ही चाहिए और अगर निचली अदालत से ग़लत फैसला हुआ है तो वह हाईकोर्ट या फिर सुप्रीमकोर्ट से निरस्त हो जाएगा. बिनायक सेन की पत्नी इलना सेन ने दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए हाईकोर्ट जाने का इरादा भी जताया. अदालतें सबूत और गवाहों के आधार पर फैसला करती हैं. आप अदालतों के फैसले की आलोचना तो कर सकते हैं, लेकिन उन फैसलों को वापस लेने के लिए धरना-प्रदर्शन को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. लोकतंत्र में संविधान के मुताबिक़ एक तय प्रक्रिया है और संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने वाले सभी ज़िम्मेदार नागरिकों से उस तय संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने की अपेक्षा की जाती है. अगर निचली अदालत में कुछ ग़लत हुआ है तो ऊपर की अदालतें उसे हमेशा सुधारती रही हैं. ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जिनमें निचली अदालत से मुजरिम बरी क़रार दिए गए, लेकिन ऊपरी अदालत ने उन्हें कसूरवार ठहराते हुए सज़ा दी. दिल्ली के चर्चित प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड में आरोपी संतोष सिंह को निचली अदालत ने बरी कर दिया, लेकिन उसे ऊपर की अदालत से सज़ा मिली. ठीक उसी तरह निचली अदालत से दोषी क़रार दिए जाने के बाद भी कई मामलों में ऊपर की अदालत ने मुजरिमों को बरी किया.

बिनायक सेन के मामले में भी उनके परिवारवालों ने हाईकोर्ट जाने का ऐलान कर दिया है, लेकिन बावजूद इसके वामपंथी नेता और बुद्धिजीवी अदालत पर दबाव बनाने के मकसद से धरना-प्रदर्शन और बयानबाज़ी कर रहे हैं. दरअसल इन वामपंथियों के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि अगर कोई भी संस्था इनके मन मुताबिक़ चले तो वह संस्था आदर्श है, लेकिन अगर इनके सिद्धांतों और चाहत के ख़िला़फ कुछ काम हो गया तो वह संस्था सीधे-सीधे सवालों के घेरे में आ जाती है. अदालतों के मामले में भी ऐसा ही है. जो फैसले इनके मन मुताबिक़ होते हैं, उनमें न्याय प्रणाली में इनका विश्वास गहरा जाता है, लेकिन जहां भी इनके अनुरूप फैसले नहीं होते, वहीं न्याय प्रणाली संदिग्ध हो जाती है. रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के पहले यही वामपंथी नेता कहा करते थे कि कोर्ट को फैसला करने दीजिए. वहां से जो तय हो जाए, वह सबको मान्य होना चाहिए, लेकिन जब इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला इनके मन मुताबिक़ नहीं आया तो अदालत की मंशा संदिग्ध हो गई. इस तरह के दोहरे मानदंड नहीं चल सकते.

अगर हम वामपंथ के इतिहास को देखें तो इनकी भारतीय गणतंत्र और संविधान में आस्था हमेशा से शक के दायरे में रही है. जब भारत को आज़ादी मिली तो इन्होंने उसे शर्म क़रार देते हुए उसे महज गोरे बुर्जुआ के हाथों से काले बुर्जुआ के बीच शक्ति हस्तांतरण बताया था. यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि सीपीआई ने फरवरी उन्नीस सौ अड़तालिस में नवजात राष्ट्र भारत के ख़िला़फ हथियारबंद विद्रोह शुरू किया था और उस पर काबू पाने में तकरीबन तीन साल लगे थे और वह भी रूस के शासक स्टालिन के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो पाया था. उन्नीस सौ पचास में सीपीआई ने संसदीय व्यवस्था में आस्था जताते हुए आम चुनाव में हिस्सा लिया, लेकिन साठ के दशक की शुरुआत में पार्टी दो फाड़ हो गई और सीपीएम का गठन हुआ. सीपीएम हमेशा से रूस के साथ-साथ चीन को भी अपना रहनुमा मानती थी. तकरीबन एक दशक बाद सीपीएम भी टूटी और माओवादी के नाम से एक नया धड़ा सामने आया. सीपीएम तो सिस्टम में बनी रही, लेकिन माओवादियों ने सशस्त्र क्रांति के जरिए भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने का ऐलान कर दिया था. विचारधारा के अलावा भी वे हर चीज के लिए चीन का मुंह देखते थे. माओवाद में यकीन रखने वालों का एक नारा उस वक्त काफी मशहूर हुआ था, चीन के चेयरमैन-हमारे चेयरमैन. माओवादी नक्सली अब भी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारतीय गणतंत्र को उखाड़ फेंकने की मंशा पाले बैठे हैं. क्या उस विचारधारा को समर्थन देना राजद्रोह नहीं है. नक्सलियों के हमदर्द हमेशा से यह तर्क देते हैं कि वे हिंसा का विरोध करते हैं, लेकिन साथ ही वे यह जोड़ना नहीं भूलते कि हिंसा के पीछे राज्य की दमनकारी नीतियां हैं.

देश में हो रही हिंसा का खुलकर विरोध करने के बजाय नक्सलियों को हर तरह से समर्थन देना कितना जायज़ है, इस पर राष्ट्रव्यापी बहस होनी चाहिए. एंटोनी पैरेल ने ठीक कहा है कि भारत के मार्क्सवादी पहले भी और अब भी भारत को मार्क्सवाद की तर्ज पर बदलना चाहते हैं, लेकिन वे मार्क्सवाद में भारतीयता के हिसाब से बदलाव नहीं चाहते. एंटोनी के इस कथन से यह साफ हो जाता है कि यही भारत में मार्क्स के चेलों की सबसे बड़ी कमजोरी है. बिनायक सेन अगर बेकसूर हैं तो अदालत से वह बरी हो जाएंगे, लेकिन अगर कसूरवार हैं तो उन्हें सज़ा अवश्य मिलेगी. देश के तमाम बुद्धिजीवियों को अगर देश के संविधान और कानून में आस्था है तो उन्हें धैर्य रखना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव बनाने के लिए किए जा रहे धरना-प्रदर्शन को तत्काल रोक दिया जाना चाहिए.

(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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