श्रवण आश्रम फैजाबाद जनपद से 16 किलोमीटर दक्षिण फैजाबाद रायबरेली रोड के पश्चिमी सिरे पर अवस्थित है. यह आश्रम पौराणिक धरोहर के रूप में भले ही वर्ष में एक बार पूर्णिमा को क्षेत्रीय मेले के रूप में गुंजायमान होता हो, लेकिन स्वयं में आश्रम स्थल विकास का अंश भी नहीं छू पाया है. पौराणिक मान्यता के अनुसार अयोध्या नरेश राजा दशरथ वन्य जीवों के आखेट के लिए इस क्षेत्र में गए हुए थे, वहीं वारूनी झील में अंधे माता-पिता की प्यास बुझाने के लिए श्रवण अपना पात्र डुबा रहे थे. इस ध्वनि को किसी जंगली जीव की आहट समझकर दशरथ ने हृदयभेदी बाण चला दिया. घायल श्रवण को लेकर जब राजा दशरथ उनके माता पिता के पास पहुंचे तब तक श्रवण मर चुके थे. आहत श्रवण के माता पिता ने पुत्र वियोग में दशरथ को श्राप दे डाला. पुत्र शोक में श्रवण के माता पिता की भी वहीं मृत्यु हो गई. दशरथ ने श्रवण व उनके माता-पिता के शवों को तमसा-विसुही नदी के संगम पर अंतेष्ठि कर दी. वह स्थान अब श्रवण क्षेत्र के रूप जाना जाता है. पर आज भी यह ऐतिहासिक जगह न तो चर्चित हो सकी है और न ही विकसित.
जन श्रुतियों में श्रवण हत्या के श्राप का दंश झेल रहे क्षेत्रवासी क्या यह मिथक तोड़कर अंधी-अंधा आश्रम का जीर्णोंद्धार करवा सकेंगे और क्षेत्र के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे? यह यक्ष प्रश्न आज भी जवाब की तलाश में भटक रहा है.
813 एक़ड के क्षेत्रफल में फैले अंधी-अंधा आश्रम पर लगभग 6 मीटर की परिधि में यहां पर अंजान विरवा नामक वृक्ष फैला हुआ है. आश्रम में लगे तेंदू के वृक्ष का प्रयोग यहां के लोग औषधि के रूप में करते हैं. पीती-रामा नामक सरोवर में स्नान लोगों को चर्मरोगों से मुक्ति दिलाने का सुलभ साधन माना जाता है. अंजान विरवा के सामने ग़डा पुराना पाषाण शिलालेख जिस पर हिंदी और अंग्रेजी में श्री-1001 श्रवण आश्रम लिखा हुआ है. इन स्मृतियों का साक्षी है कई सौ साल पुराना कुआं निकटस्थ पीपल का वृक्ष तथा छोटे-छोटे तीन मंदिर जिनमें से एक में माता-पिता सहित श्रवण की प्रतिमा स्थापित है, जो क्षेत्र वासियों के लिए पूज्य व दर्शनीय है.
जहां तक यहां के विकास का प्रश्न है तो क्षेत्रीय लोगों की यह मान्यता निश्चित ही प्रभावी दिखती है कि यह क्षेत्र श्रवण हत्या के श्राप से ग्रस्त है और इसका कभी विकास नहीं हो सकता. गांव के लोग व्यक्तिगत-पारिवारिक विकास के नाम पर इस गांव से पलायन का दंश झेलते-झेलते आजिज आ चुके हैं. बीते तीन दशकों में मिल्कीपुर के कथित महारथी राजनीतिज्ञ पूर्व सांसद विधायक मित्रसेन यादव, व 75 करो़ड का पैकेज ले चुके राम चंदर यादव, भाजपा नेता पूर्व विधायक मथुरा तिवारी, कथित धर्म धुरंधर राष्ट्रीय भाजपा नेता पूर्व सांसद विनय कटियार ने भी इस क्षेत्र के विकास के लिए कुछ नहीं किया. स्थानीय क्षेत्रवासियों के नाम पर बारून बाज़ार की नई पीढ़ी ने अब जिस तरह एकजुट होकर वारूनी झील के तट पर स्थित दशरथ तालाब एवं हनुमान मंदिर के जीर्णोद्धार व सौंदर्यीकरण से लेकर अंधी-अंधा स्थान को नया रूप देने की योजना बनाकर अमली जामा देने का कार्य शुरू किया है, वह निश्चित ही इस क्षेत्र के श्राप ग्रस्त मिथक को तोड़ने की कड़ी साबित होता प्रतीत हो रहा है.
क्षेत्र के स्थानीय लोगों की मानें तो वह इस क्षेत्र के विकास को लेकर कुछ करना चाहते हैं, जिसमें स्थानीय युवा उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष चंद्र किशोर कौशल जहां जन-जन को इस मातृ-पितृ भक्ति के उदाहरण स्थल अंधी-अंधा आश्रम के प्रति श्रद्धावान होकर
अपने-अपने माता-पिता की पुण्य स्मृति में एक नाम अंकित शिलालेख लगवाने की मार्मिक अपील करते हैं. वहीं पूर्व अध्यक्ष एवं जगन्नाथ प्रसाद जायसवाल इंटर कॉलेज के प्रबंधक संजय जायसवाल हर हाल में इस स्थान के प्रति श्रद्धा और आस्था का प्रतीकात्मक कार्य किये जाने हेतु हर व्यक्ति से अपेक्षा करते हैं. अंधी-अंधा संपर्क मार्ग पर स्थित अमन आई केयर सेंटर के चिकित्सक डॉ. मस्त राम यादव इस स्थान के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए खासे चिंतित होकर क्षेत्रवासियों की सुसुप्त भावनाओं को जागृत करने के लिए दॄढसंकल्प नज़र आते हैं. स्थानीय लोकप्रिय युवा समाजसेवी रिंकू उ़र्फ राकेश कौशल पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहर अंधी-अंधा स्थान को आज के परिप्रेक्ष्य में मौन परीक्षा लेते देखते हैं. भविष्य के नाम पर वह यह भी कहने में कोई संकोच नहीं करते कि राम रहीम की बात ब़डी संजीदगी से करने वाले लोग आज भी अपने ही माता-पिता के नाम पर चिंतनहीन और संवेदनहीन नज़र आते हैं.
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