काले हीरे का काला बाजार

झारखंड की सत्ता संस्कृति कमोबेश कोयले और लोहे के अवैध धंधे से ही ऊर्जा प्राप्त करती है. यह धंधा राज्य के ताक़तवर नेताओं और आला अधिकारियों के संरक्षण में बड़े ही संगठित रूप से संचालित होता है. कोल इंडिया की दो अनुशंगी कंपनियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड की खदानें पूर्ण रूप से और ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की कुछेक खदानें झारखंड की सीमा के अंदर आती हैं. इन इलाक़ों में एक प्रचलित शब्द है डिस्को पेपर. इसका इस्तेमाल चोरी के कोयले को सड़क मार्ग से मंडी तक पहुंचाने के ग़ैर सरकारी परमिट के रूप में किया जाता है. रास्ते में पड़ने वाले पुलिस थानों से लेकर तमाम सरकारी महकमे को इसकी जानकारी रहती है. यह एक सांकेतिक टोकन होता है, जिसे कोयला माफिया हर दिन बदल देता है. प्राय: दस या बीस रुपये के नोटों की गड्डी से एक-एक नोट को निकालकर आधा फाड़ दिया जाता है और चोरी का कोयला ले जाने वाले ट्रक को निर्धारित फीस के एवज में दिया जाता है. किस इलाक़े से किस सीरीज़ के नोट जारी किए गए हैं, सुबह माफिया के गुर्गे रास्ते के तमाम थानों को सूचित कर देते हैं. ट्रक वालों को स़िर्फ इसे दिखाना होता है. उन्हें हर थाना क्षेत्र में वीआइपी ट्रीटमेंट मिलता है. वैध कोयले से लदी गाड़ी भले ही रोक ली जाए, लेकिन अवैध कोयले की गाड़ियों को कोई नहीं रोकता. कारण, हर सप्ताह माफिया की तऱफ से बंधी बंधाई रकम का पैकेट उन तक पहुंच जाता है. पुलिस की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये कभी-कभी मैच फिक्सिंग के अंदाज़ में कोयले की बरामदगी भी करा दी जाती है.

कोल इंडिया की दो अनुशंगी कंपनियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड की खदानें पूर्ण रूप से और ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की कुछेक खदानें झारखंड की सीमा के अंदर आती हैं. इन इलाक़ों में एक प्रचलित शब्द है डिस्को पेपर. इसका इस्तेमाल चोरी के कोयले को सड़क मार्ग से मंडी तक पहुंचाने के ग़ैर सरकारी परमिट के रूप में किया जाता है. रास्ते में पड़ने वाले पुलिस थानों से लेकर तमाम सरकारी महकमे को इसकी जानकारी रहती है. यह एक सांकेतिक टोकन होता है, जिसे कोयला माफिया हर दिन बदल देता है.

झारखंड के कोयला खदान क्षेत्रों से लेकर हाइवे तक कार्य विभाजन के आधार पर धंधे का संचालन होता है. माफिया, पुलिस, औद्योगिक सुरक्षा बल और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में कुछ दबंग किस्म के अपराधकर्मी बंद खदानों में अवैध उत्खनन कराते हैं. इसमें प्राय: स्थानीय ग़रीब बेरोज़गारों को दैनिक मज़दूर के रूप में लगाया जाता है. असुरक्षित और अवैज्ञानिक खनन कार्य के कारण दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं, जिसमें मौतें भी हो जाती हैं, लेकिन प्राय: स्थानीय ग्रामीण शवों को हटा लेते हैं और चुपके से अंतिम संस्कार कर देते हैं. अवैध उत्खनन में लिप्त होने की बात कोई स्वीकार नहीं करता. प्रतिदिन अवैध उत्खनन से उत्पादित कोयले को अवैध डिपो में एकत्र किया जाता है. जंगल, पहाड़ और आबादी से ज़रा हटकर बने इन डिपो का संचालन भी माफिया के गुर्गों की टीम के ज़िम्मे रहता है. स्थानीय ग्रामीण कोयला खदानों से कोयला चुराकर साइकिलों पर लादकर इन्हीं डिपो में लाकर बेचते हैं. इसके एवज में उन्हें भरण-पोषण भर रकम मिल जाती है. पुलिस वाले भी इन्हीं को परेशान करते हैं और अवैध वसूली करते हैं. रोज़गार के अभाव में ग्रामीण इस अवैध धंधे में शामिल हो जाते हैं. स्थानीय थाने को प्रति ट्रक एक हज़ार से तीन हज़ार तक नज़राना दिया जाता है. हाइवे के पहले पड़ने वाले थानों को भी प्रति ट्रक की दर से नज़राना तय रहता है. डिस्को पेपर हाइवे में प्रभावी होता है. कोयलांचल के पुलिस थानों की प्रतिदिन की कमाई लाखों में होती है, इसीलिये इन थानों में पोस्टिंग के लिए पुलिस अधिकारी मुंहमांगी रकम देने को तैयार रहते हैं. इस धंधे में पुलिस, पत्रकार, नेता और यहां तक की नक्सलियों का भी हिस्सा रहता है, जिसे पूरी ईमानदारी के साथ निर्धारित अवधि में बांट दिया जाता है. पुलिस थानों के प्रभारी अपने आला अधिकारियों को इसका हिस्सा पहुंचाते हैं. माफिया की तरफ से पुलिस, प्रशासन और राजधानी के आकाओं को अलग से पैकेट भेजा जाता है. शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल हो जिसके शीर्ष नेताओं को उनकी हैसियत के मुताबिक़ थैली न पहुंचाई जाती हो. ऐसा नहीं कि यह धंधा अनवरत रूप से चलता हो. चुनाव के पूर्व या केंद्र के ज़्यादा दबाव बढ़ने पर कुछ समय के लिए इसका पैमाना घटा दिया जाता है. ऐसे मौक़ों पर सरकार की छवि सुधारने के लिए ईमानदार और कड़े प्रशासकों का पदस्थापन कोयलांचल के इलाकों में किया जाता है. फिर माहिर अधिकारियों को भेजकर धंधे का दायरा बढ़ा दिया जाता है.

चोरी के कोयले को मंडी तक पहुंचाने का काम भी कुछ खास ट्रक मालिक करते हैं. उन्हें सामान्य से अधिक भाड़ा मिलता है और रास्ते में कोई परेशानी नहीं होती. कोयला माफिया के पास ऐसे ट्रकों की लिस्ट रहती है. वे हर ट्रिप के बाद माफिया के यहां उपस्थिति दर्ज करा देते हैं. उन्हें दिन के व़क्त ही बता दिया जाता है कि किस डिपो से लोड लेना है. शाम ढलने के बाद इनपर कोयले की लदाई होती है और देर रात वे हाइवे पकड़ लेते हैं. अधिकांश कोयला डिहरी और बनारस की मंडियों में खपाया जाता है, जहां से इसे देश के दूसरे इलाक़ों के कोयला व्यापारी खरीद ले जाते हैं.

कोयला चोरी को रोकने की बात हर सरकार करती है. इसके लिये तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं. कभी टास्क फोर्स बनाई जाती है तो कभी लगातार छापेमारी की जाती है. कभी चिन्हित कोयला तस्करों को गिरफ्तार कर जेल में भी डाला जाता है. लेकिन सब स़िर्फ दिखावे के लिये. सत्ता में बैठे लोगों के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग रहते हैं. एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष क़रीब 1000 करोड़ का कोयला चोरी से मंडियों तक पहुंचाया जाता है. कुछ बड़े तस्करों का जाल तो नेपाल और चीन तक बिछा हुआ है. चोरी का कोयला स्थानीय स्तर पर भी रोलिंग मिलों, ईंट भट्ठों आदि में धड़ल्ले से खपाया जाता है. उन्हें यह कोयला सस्ता पड़ता है. चोरी का कोयला खपाने वाले कल-कारखानों का नज़राना भी स्थानीय स्तर से राजधानी तक पहुंचता है. बहरहाल, काले हीरे के काले धंधे में कई स़फेदपोश लाल हो रहे हैं. इसे कोई स्वीकार करे न करे, लेकिन कोयले की दलाली में अच्छे-अच्छों के हाथ काले हो रहे हैं, जिसे वे तरह-तरह के दास्तानों के पीछे छिपाए रहते हैं.