ख़ुशियां तो व्यवस्था परिवर्तन से आएंगी

मानव सभ्यता का एक और वर्ष व्यतीत हो गया. पुरानी यादें-कड़वाहटें जेहन में बसाए, नववर्ष आगमन के हर्षोल्लास में मनुष्य आशामयी जीवन जीने की तमन्ना अपने हृदय में संजोए है. एक-दूसरे को नववर्ष मंगलमय हो का संदेश देना भी आज महज़ एक औपचारिकता बनकर रह गया है. पुरानी बातों को भूलने की अद्भुत क्षमता वाला मनुष्य स़िर्फ और स़िर्फआशा के सहारे वर्ष 2011 में अपनी तरक्की के सपने देख सकता है. हो सकता है कि 2010 किसी पूंजीपति के लिए, व्यवसायिक घराने के लिए मंगलकारी रहा हो. संभव है कि किसी राजनीतिक दल या राजनेता को तरक्की हासिल हुई हो, विकास का लाभ मिला हो. पर यह ध्रुव सत्य है कि आम नागरिक तो 2010 में भी स़िर्फ ठगा ही गया. 2010 में जो भी उम्मीद का, तरक्की का ख्वाब आम नागरिक की आंखों में आया, उसे महंगाई और राजनेताओं-नौकरशाहों के ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैये ने चकनाचूर कर दिया.

एक देश-एक प्राण की भावना का स्थान स़िर्फ स्वयं हित की सोच ने ले लिया है, इस नववर्ष में इसे बदलना चाहिए. अब तो युवाओं को न तो गांधी मिलेंगे और न जय प्रकाश, उन्हें खुद सरदार भगत सिंह और अन्य अमर क्रांतिकारियों की राह पर चलकर अपना नेतृत्व स्वयं करना होगा. जनता, किसान-मज़दूरों के हक़ की लड़ाई तेज़ करनी होगी. व्यवस्था परिवर्तन के बग़ैर किसी भी समस्या का हल संभव नहीं है.

मध्यम वर्ग इस आशा और विश्वास के सहारे है कि हो सकता है, 2011 में उसके जीवनयापन की दशा सुधरे, उसका आत्मविकास हो. उम्मीद की तरंगों पर सवार होकर उसने 2011 का स्वागत टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले रंगारंग कार्यक्रम देखकर किया. नववर्ष के स्वागत में जगह-जगह जलसे तो बहुत हुए, लेकिन वे किसी दुखियारे, ग़रीब, बेबस, मज़दूर, किसान एवं बेसहारा की झोपड़ी में उम्मीद की एक किरण नहीं जगा पाए. पूंजीवाद का घिनौना ताडंव ऐसे मौक़ों पर अक्सर देखने को मिलता है. शराब की नदियां बहा दी जाती हैं, भोग-विलास का शर्मनाक प्रदर्शन लगभग हर होटल में देखने को मिल जाता है. प्रत्येक वर्ष ग़रीबी का मज़ाक उड़ाते हुए लाखों-करोड़ों रुपये नववर्ष के स्वागत के बहाने पानी की तरह स़िर्फ मौजमस्ती के लिए रातोंरात बहा दिए जाते हैं. एक तऱफभूख से बेहाल लोग, दूध को तरसते नौनिहाल हैं और दूसरी तऱफ नाना प्रकार के व्यंजन एवं जी भरकर पीने को उपलब्ध शराब! यह सामाजिक-आर्थिक असमानता हमें कहां ले जाएगी? पूंजीवाद का वीभत्स-क्रूर प्रदर्शन ग़रीबों-मेहनतकशों का मज़ाक उड़ाते हुए जारी है.

अब नववर्ष के स्वागत में मानवता का भी ध्यान रखना प्रारंभ हो. हम अपने पड़ोसी के साथ संबंध सुधार सकते हैं, भूखे को खाना खिलाकर, ज़रूरतमंदों को वस्त्र देकर भी हम नववर्ष की खुशियां आपस में बांट सकते हैं. हम मेहनतकशों, किसानों के साथ बैठकर उनके दु:ख-दर्द समझने, उन्हें कम करने की एक साझा कोशिश भी कर सकते हैं. आज हमें अपनी तरक्की के रास्ते नि:संदेह पास-पड़ोस एवं देश-समाज की तरक्की से जोड़कर देखने पड़ेंगे. हमें नववर्ष में व्यक्तिगत हितों की बलि समाज-देशहित में चढ़ाने की पुन: शुरुआत करनी चाहिए. मानव सभ्यता की आधी आबादी यानी स्त्री आज कई चुनौतियों से बेजार है. वह बढ़ती पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में असहाय-असहज होती जा रही है. वह नौकरी-व्यवसाय की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ घर-गृहस्थी के दायित्व निर्वहन को विवश है. क़स्बों-ग्रामीण अंचलों में वह सीमित आय में मन मसोस कर परिवार का मान-सम्मान और चूल्हे की आग बरकरार रखने की ज़द्दोजहद में लगी रहती है. स्कूली छात्र-छात्राओं की अपनी अलग कहानी है. समुचित मार्गदर्शन, निगरानी एवं नैतिक मूल्यों के अभाव में युवा वर्ग अक्सर पार्कों, सिनेमाघरों, चौराहों एवं रेस्तरां में मटरगश्ती करता देखा जा सकता है. पैसा कमाने के फेर में फंसा इंसान परिवार को समय नहीं दे पा रहा है. उसे अपने परिवार के विखंडन एवं नैतिक पतन की तऱफ देखने की फुर्सत नहीं है. इस प्राथमिक इकाई के विखंडन का दंश संपूर्ण समाज को भुगतना पड़ रहा है. नववर्ष में परिवार की तऱफ ध्यान देना यदि प्रारंभ हो तो अवश्य ही मंगलकारी वातावरण उत्पन्न होगा.

युवा वर्ग का आज के परिवेश में क्या दायित्व बनता है, इसका इस वर्ग को न तो बोध है और न इसे बोध कराने वाला कोई मार्गदर्शक. बीते वर्ष मानवता को शर्मसार करने वाले ज़ालिमों के नाम रहे. वे ज़ालिम आज भी हमारा राशन-पानी खा रहे हैं और हमारे लोग भूखे पेट सो रहे हैं. सरकारों की अदूरदर्शिता, अकर्मण्यता के चलते देश आतंक का शिकार रहा. राजनीतिक दलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता, मानवाधिकार संगठनों की अनावश्यक चिल्ल-पों के चलते आतंक के पैरोकार मानवता और देश की सुरक्षा पर भारी रहे. याद करिए, स्वतंत्रता संग्राम में बहादुरशाह जफर को आगे करके पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत से युद्ध किया गया. मंगल पांडे, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, बलभद्र सिंह चहलारी, उदा देवी, अवंतीबाई आदि का बलिदान हमारे लिए ही था. कालांतर में बाल-पाल-लाल की तिगड़ी के साथ महात्मा गांधी, सावरकर एवं चाफेकर बंधुओं, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, अश़फाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, शचींद्र नाथ सान्याल, रानी गिडालू, प्रीतिलता वादेदार और अरुणा आसफ अली आदि की क्रांतिकारी टुकड़ियों ने अपना सर्वस्व बलिदान करके गुलामी की बेड़ियां काट डालीं. महात्मा गांधी के विशाल नेतृत्व और क्रांतिकारियों के अदम्य साहस एवं सर्वस्व बलिदान की उच्च परंपरा ने अंग्रेजों को भारत की पवित्र भूमि से भागने पर विवश कर दिया था. फिर आया 1977. आज़ाद भारत में पुन: एक बुज़ुर्ग कराहती जनता का दु:ख हरने, अपने बीमार शरीर की परवाह करे बग़ैर क्रांति की मशाल लेकर घूमने लगा. जय प्रकाश नारायण की अगुवाई में समूचे भारत में तरुणाई ने अंगड़ाई लेकर भ्रष्ट सरकारों को उखाड़ फेंका. सिंहासन खाली करो कि जनता आती है के ओजपूर्ण आह्वान ने समूचे जनमानस में उत्साह और सरकारों में भय भर दिया. दुर्भाग्यवश जेपी द्वारा छेड़ी गई व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई सत्ता परिवर्तन की लड़ाई बनकर रह गई. 1977 के आंदोलन से निकले नेताओं ने व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई छोड़कर सत्ता से चिपके रहना अंगीकार कर लिया. गांधी, लोहिया एवं जेपी की आत्मा अपने इन छद्म अनुयायी नेताओं और इनके कृत्यों को देखकर अवश्य रोती होगी. आज युवाओं को सही नेतृत्व न देने का जो अपराध बुज़ुर्ग नेता कर रहे हैं, उस पर भी काल की नज़र है. इतिहास साक्षी रहेगा कि गांधी, अंबेडकर, भगत सिंह, लोहिया एवं जय प्रकाश के देश में युवा नेतृत्व के अभाव का ज़िम्मेदार कौन है?

आज 45 वर्ष से अधिक उम्र के उन सभी लोगों, जो सामाजिक संगठन चलाते हैं, साहित्यिक मंडली के हैं, मानवाधिकार संगठन के हैं, नौकरशाह हैं, व्यापारी नेता हैं, किसान नेता हैं, पत्रकार हैं और बुद्धिजीवी हैं, को अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन वर्ष 2011 में प्रारंभ करना चाहिए. क्या इन्होंने एक भी नौजवान को देशप्रेम एवं देश की सुरक्षा के सवाल पर समझाया? क्या इन्होंने किसी किशोर को समाजसेवी या देशभक्त के रूप में तैयार किया? यदि हां तो आप वंदनीय हैं, वरना धिक्कार है आपके जीवन पर! अब प्रण करके नववर्ष 2011 में अपने इस दायित्व को पूर्ण करने की दिशा में प्रयास करें. एक सवाल यह भी है कि क्या अब ऐसा व़क्त आ गया है कि युवा वर्ग अपना नेतृत्व स्वयं करे? बुज़ुर्ग नेता तो स़िर्फ सियासी गोष्ठी करेंगे. युवा वर्ग को तो उन्होंने अपने, भाई-पुत्र-सगे संबंधियों एवं चाटुकारों के जयकारे लगवाने लायक ही समझ रखा है. अच्छा तो यह होगा कि नववर्ष 2011 में हम मानव मात्र की भलाई के बारे में कार्य करना प्रारंभ करें. एक देश-एक प्राण की भावना का स्थान स़िर्फ स्वयं हित की सोच ने ले लिया है, इस नववर्ष में इसे बदलना चाहिए. अब तो युवाओं को न तो गांधी मिलेंगे और न जय प्रकाश, उन्हें खुद सरदार भगत सिंह और अन्य अमर क्रांतिकारियों की राह पर चलकर अपना नेतृत्व स्वयं करना होगा. जनता, किसान-मज़दूरों के हक़ की लड़ाई तेज़ करनी होगी. व्यवस्था परिवर्तन के बग़ैर किसी भी समस्या का हल संभव नहीं है. आइए, 2011 में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई तेज़ की जाए, तभी नववर्ष के मंगलमय होने की संभावना है.

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