लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरटी को राजधानी के नागरिक लूटो डाका डालो अथॉरटी के नाम से पुकारते हैं. इस नाम पर ऐतराज हो सकता है, पर सच से रूबरू होते ही हर कोई मानने को तैयार हो जाता है कि यह नाम सटीक है. एलडीए के सामने अब कई चुनौतियां हैं. इनमें अमीनाबाद में निर्मित पार्किंग में दुकानों से लेकर एलडीए अफसरों द्वारा दबाई गई दस लाख बीघा ज़मीन खाली करने के साथ डॉलीबाग में बहुखंडी बिल्डिंग के सामने की विवादित ज़मीन का मामला भी शामिल है. छूटी ज़मीनों को अधिग्रहीत करना, विकल्प एवं विनीत खंड में भूमि आवंटन घोटाला, सस्ती दर की भूमि पर विद्यालय निर्माण के बाद ग़रीब बच्चों को सुविधा न देना जैसे मामले भी एलडीए को परेशान कर रहे हैं. वहीं तालाबों, सड़क के नीचे बनी दुकानों के ध्वस्तीकरण के कारण लखनऊ शहर का जनजीवन प्रभावित हो रहा है. नादान महल रोड, मौलवीगंज, आलमबाग, नेहरू क्रॉस, हीवेट रोड, स्टेशन रोड, गोल दरवाज़ा चौक, नाका हिंडोला एवं हरदोई रोड पर सड़क के नीचे अथवा बेसमेंट में दुकानें बन गई हैं. पार्किंग की कोई व्यवस्था न होने के कारण आए दिन लोगों को जाम का शिकार होना पड़ता है. स्टेशन रोड स्थित प्राधिकरण की विकासदीप नामक इमारत में अवैध क़ब्ज़े हैं. लोग यहां खाली पड़ी दुकानों को गोदाम के रूप में वर्षों से इस्तेमाल कर रहे हैं. पूर्व उपाध्यक्ष मुकेश कुमार मेश्राम तो यहां के घोटाले देखकर कहने को विवश हो गए कि 300 से अधिक एलडीए कर्मियों पर कार्यवाही के लिए विजिलेंस की मदद लेनी पड़ेगी, लेकिन वह खुद ही एलडीए से हटने को मजबूर हो गए. उन्होंने आय से अधिक संपत्ति और तमाम अन्य आरोपों में 12 कर्मचारियों को निलंबित करने के बाद 25 संदिग्ध कर्मचारियों की सूची बनवाई थी.
ओएसडी राहुल सिंह का कहना है कि आवंटन निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई है. जल्द निर्माण न कराने वाले स्कूल भूखंडों का आवंटन निरस्त कर दिया जाएगा. वहीं ध्वस्तीकरण की नोटिस के विरोध में रजनी खंड-आठ के आश्रयहीन मकानों में रहने वालों ने एलडीए दफ्तर पर प्रदर्शन किया. उनका आरोप था कि एलडीए ने कई साल पूर्व आवास आवंटित किए थे, जो का़फी जर्जर थे.
वर्षों से एक ही कुर्सी पर काबिज़ अफसरों-बाबुओं ने तक़रीबन दो अरब रुपए की संपत्तियां दबा लीं. जांच में नर्सिंग होम, पेट्रोल पंप सहित अन्य व्यवसायिक उपयोग के एक लाख वर्गमीटर क्षेत्रफल के सौ भूखंडों का पता चला था, जिनके आवंटन के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए. मुकेश मेश्राम ने विशेष कार्याधिकारी राहुल सिंह को ऐसी संपत्तियों का पता लगाने का जिम्मा सौंपा था, जिनके आवंटन के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए. राहुल सिंह ने सभी व्यवसायिक संपत्तियों का परीक्षण किया. 261 व्यवसायिक संपत्तियां ऐसी मिलीं, जिनका कोई लेखा जोखा नहीं था. 161 संपत्तियों के आवंटन से जुड़ी पत्रावली तो मिल गई, लेकिन एक लाख वर्गमीटर क्षेत्रफल की सौ व्यवसायिक संपत्तियों का पता नहीं चला. इनमें ज़्यादातर गोमती नगर विस्तार और कानपुर रोड योजना की हैं. एलडीए की दरियादिली कानपुर रोड सेक्टर एम-1 में अंसल द्वारा बनाए जा रहे ईडब्ल्यूएस मकानों में देखी जा सकती है. 1987 में एलडीए के तत्कालीन सचिव शैलेश कृष्ण और अंसल हाउसिंग एंड कंस्ट्रक्शन लिमिटेड के बीच कानपुर रोड सेक्टर एम-1 में क़रीब 2300 से ऊपर ईडब्ल्यूएस मकान बनाने का अनुबंध हुआ था, जिसके मुताबिक़, एलडीए को प्रति मकान 15 हज़ार रुपए अंसल को अदा करने थे. अनुबंध में सा़फ तौर पर लिखा था कि मकानों का निर्माण तीन वर्ष में पूरा करना है, एलडीए ने अंसल को प्रति मकान 45 से 72 हज़ार रुपए तक भुगतान कर दिया. एलडीए ने कबूल किया कि अंसल को 1537 भवनों के निर्माण के बदले 5 करोड़ 94 लाख 50 हज़ार रुपए का भुगतान किया गया है, जबकि यह भुगतान महज़ 2 करोड़ 30 लाख 55 हज़ार रुपए होना चाहिए था. आशियाना में अंसल हाउसिंग ने अनुबंध के खिला़फ क़रीब 58 एकड़ ज़मीन ग़लत तरीक़े से बेची थी. तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष हरभजन सिंह ने टापो ग्राफिक सर्वे कराकर अंसल पर 78 करोड़ से अधिक का जुर्माना ठोंका था. अफसरों ने अंसल के दबाव में मामला दबा दिया. जुर्माना अदा न करने पर अंसल के खिला़फ एफआईआर दर्ज़ कराई जानी थी, अब कोई बताने को तैयार नहीं कि एफआईआर दर्ज़ हुई या नहीं? प्राधिकरण के नजूल विभाग का घोटालों से पुराना रिश्ता है. बेशक़ीमती नजूल ज़मीनों को साठगांठ कर बेचने वाले नजूल विभाग में तैनात अधिकारियों-कर्मचारियों की हैसियत करोड़ों में है. लीज डीड एवं रेंट के नाम पर बड़े खेल हो रहे हैं. नजूल भूमि एवं इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की संपत्तियों में बड़े घोटालों को सुनियोजित रूप से अंजाम दिया जा रहा है. राजधानी में इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की तमाम संपत्तियां हैं, जिनके फ्री होल्ड कराने में कई कर्मचारी उस्ताद हैं. विभाग में तैनात बाबुओं की सेटिंग शासन में ऊपर तक है. बरसों से एक ही सीट पर रहने के बाद भी उनका तबादला नहीं होता है. इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के तहत राजधानी में कई बड़े बंगले हैं, जिन्हें नेताओं को बेच दिया गया है या फिर लीज बढ़ा दी गर्ई है. रियायती दरों पर स्कूल भूखंड लेकर निर्माण न कराने वालों का आवंटन निरस्त करने की कार्यवाही आज तक नहीं हुई. ऐसे क़रीब 45 स्कूल हैं, जिन्होंने निर्माण नहीं कराया. कई ने तो भूखंडों को करोड़ों में बेचकर एलडीए को चूना लगा दिया. एलडीए की योजनाओं में करीब 135 स्कूल हैं.
ओएसडी राहुल सिंह का कहना है कि आवंटन निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई है. जल्द निर्माण न कराने वाले स्कूल भूखंडों का आवंटन निरस्त कर दिया जाएगा. वहीं ध्वस्तीकरण की नोटिस के विरोध में रजनी खंड-आठ के आश्रयहीन मकानों में रहने वालों ने एलडीए दफ्तर पर प्रदर्शन किया. उनका आरोप था कि एलडीए ने कई साल पूर्व आवास आवंटित किए थे, जो का़फी जर्जर थे. आवासों को आवंटियों ने ही ठीक कराया था. एलडीए अवैध निर्माण मानकर तोड़ने की चेतावनी दे रहा है. 23 अक्टूबर, 2003 को न्यायमूर्तिद्वय मार्कंडेय काटजू एवं के एस राखरा ने निशातगंज रेजीडेंट वेलफेयर सोसायटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी कांप्लेक्सों में पार्किंग बहाल करने का आदेश दिया. यह आदेश एलडीए अफसरों पर कोई असर नहीं डाल सका. आदेश की अवहेलना पर अदालत ने नाराज़गी जताई और 20 जनवरी, 2004 को फिर आदेश जारी किया कि पार्किंग से संबंधित जिन भूमिगत स्थलों का व्यवसायिक उपयोग तुरंत रोका किया जाए, लेकिन अभियंताओं ने अवैध निर्माण तोड़ने में कोई रुचि नहीं दिखाई. कांप्लेक्सों में अवैध निर्माण किसी एक क्षेत्र की बात नहीं है, बल्कि पूरे शहर में नज़र आ जाएगी. बिल्डर अधिक मुना़फे के चक्कर में मानचित्र में निर्धारित पार्किंग स्थलों पर भी दुकान एवं कार्यालय का निर्माण करके बेच देते हैं. इन दिनों नाका क्षेत्र में कांप्लेक्स बन रहे हैं, वहां भी पार्किंग सड़क पर होगी. आशियाना में किला मोहम्मदी नगर के खसरा संख्या 1000 के 986.62 वर्गमीटर भूमि श्मशान में दर्ज़ है. एलडीए ने इस ज़मीन का भी सौदा कर दिया था. इसी तरह एलडीए ने इजरियांव में बतौर तालाब दर्ज़ खसरा नंबर 263 की भूमि बेंच डाली.
विकल्प खंड फर्ज़ी आवंटन घोटाले में फंसे कर्मचारियों ने तीन अन्य मामलों से भी पर्दा उठा दिया. इन तीनों भूखंडों का आवंटन भी विकल्प खंड में हुआ था. साधना सिटी होम्स प्राइवेट लिमिटेड के खसरा नंबर 1794-स और 2133-का के संदर्भ में कहना है कि विपुल खंड गोमती नगर के प्लाट नंबर 2/90 एवं 2/108 के बीच जो खाली भूमि और बाउंड्री है, वह इस कंपनी की है, जिसका फर्ज़ी आवंटन आलोक टंडन के नाम कर दिया गया. डॉ. विजय अग्रवाल द्वारा इस मामले में जानकारी मांगने पर भी प्राधिकरण कोई जवाब नहीं दे पाया. इसी तरह रजनी खंड-8 के आश्रयहीन योजना में घोटालों का लंबा खेल खेला गया. जो पात्र नहीं थे, वे पात्र बन गए. अगर जांच हो तो इनमें आधे से अधिक लोग प्राधिकरण कर्मचारियों के परिवारीजन निकलेंगे. लखनऊ महायोजना-2021 को लेकर भी उंगलियां उठने लगी हैं. महायोजना बनाने वालों की लापरवाही का खामियाजा राजधानी वासियों को भुगतना पड़ रहा है. उन्हें तरह-तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है. किसी के मकान को हरित पट्टी एवं खुला स्थान घोषित कर दिया गया तो किसी सड़क को अभिलेखों में अधिक चौड़ा दिखा दिया गया. जगत नारायण रोड स्थित सैय्यद नैयर अहमद के मकान संख्या 175 (पुराना नंबर 70) और आसपास के 14.40 हेक्टेयर क्षेत्र को महायोजना में पार्क एवं हरित पट्टी घोषित कर दिया गया. एलडीए से जब कोई राहत नहीं मिली तो पीड़ित लोग अदालत की शरण में गए. अदालत के आदेश के बाद एलडीए बोर्ड ने उक्त ज़मीन को हरित पट्टी से आवासीय क्षेत्र में परिवर्तित करने के लिए मंजूरी दी.
भूखंड आवंटन के दोषी
एलडीए के अनुभाग अधिकारी राजेंद्र प्रसाद, अनिल कुमार कनौजिया, प्रवर वर्ग सहायक वीरेंद्र कुमार सिंह एवं लिपिक संजीव श्रीवास्तव को भूखंड आवंटन मामले में दोषी पाया गया. कनौजिया पूर्व से ही एक मामले में निलंबित चल रहे हैं, जबकि कुछ दिनों पूर्व निलंबन से बहाल हुए राजेंद्र प्रसाद को फिर से निलंबित कर दिया गया. प्रवर वर्ग सहायक वीरेंद्र कुमार सिंह को भी निलंबित किया गया है, जबकि संजीव श्रीवास्तव को चार्जशीट दी गई है. विकल्प खंड में 200 वर्गमीटर के उक्त भूखंड पूनम सिंह (3/372), आशा प्रजापति (3/109), संदीप कुमार सिंह (3/112), केदार नाथ त्रिपाठी (3/113), राहुल मसीह (3/275) एवं सरोज अग्रवाल (3/539) को आवंटित किए गए थे. उक्त आवंटन चार मार्च, 2005 को किए गए थे, जिसमें छह मार्च, 2005 को अपर सचिव एस डी दोहरे (अब सेवानिवृत्त) के हस्ताक्षर से मैनुअल आवंटन पत्र जारी किए गए थे, जबकि उक्त अवधि में कंप्यूटर से आवंटन पत्र जारी किए जाते थे. जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर दोहरे ने अपने हस्ताक्षर होने से इंकार किया था. पत्रावली पर तत्कालीन उपाध्यक्ष एवं सचिव के भी हस्ताक्षर हैं, जबकि संपत्ति अधिकारी का नाम सा़फ नहीं है. एलडीए के तत्कालीन उपाध्यक्ष मेश्राम ने मामला गंभीर होने के चलते इसकी विस्तृत जांच एसआईटी से कराने के लिए शासन को पत्र लिखा था, लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद मामला ऱफा-द़फा कर दिया गया.
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