महंगाई नव उदारवाद की देन है

भारत पहली बार महंगाई की मार नहीं झेल रहा है. चाहे वह नेहरू का जमाना रहा हो या इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का शासन, सबने महंगाई से मुक़ाबला किया. महंगाई बढ़ते ही सरकार कहती कि दो दिनों के अंदर महंगाई पर लगाम लगेगी तो दो दिनों के बाद स्थिति बदल भी जाती थी. आज सरकार वादा दर वादा कर रही है, लेकिन सामानों की कीमतें कम नहीं हो रही हैं. महंगाई की वजह बरसात नहीं, कम पैदावार नहीं, बल्कि जमाखोरी और कालाबाज़ारी है. फिर क्या वजह है कि सरकार महंगाई पर लगाम लगाने में नाकाम हो गई है. इसका मतलब तो यही निकलता है कि राज्य की नीतियों पर पूंजीपतियों का क़ब्ज़ा हो गया है या फिर सरकार बाज़ार में हस्तक्षेप करना ही नहीं चाहती. विश्व की अर्थव्यवस्था में 1920-1930 की मंदी को ग्रेट डिप्रेशन के नाम से जाना जाता है. उस समय की हालत भी आज की तरह थी. जनता के कल्याण पर होने वाले सरकारी खर्च को कम करना ही इस स्थिति से निकलने का कारगर तरीक़ा माना गया, लेकिन इससे स्थिति और भी खराब हो गई. पूंजीवाद घटते व्यापार और उत्पादन में कमी का शिकार हो गया, जिसका सबसे बुरा असर ग़रीबों और बेरोज़गारों पर पड़ा.

उदारवाद के नाम पर निजी कंपनियों का एकाधिकार स्थापित हो रहा है. महंगाई की वजह भी यही है कि निजी कंपनियां कृषि क्षेत्र में अपने पैर पसार रही हैं. सामान महंगे ज़रूर बिक रहे हैं, लेकिन इसका फायदा न तो किसानों को हो रहा है और न उन्हें, जो ठेले पर सब्जियां बेच रहे हैं. मज़ेदार बात यह है कि मंडी में बैठे छोटे-मोटे व्यापारियों को भी नुक़सान हो रहा है.

उस व़क्त भारत में स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था. वैश्विक मंदी और उससे पैदा हुए हालात को देखते हुए गांधी, नेहरू और अंबेडकर ने भारत को एक वेलफेयर स्टेट बनाने का फैसला लिया. हमारे नेता पूंजीवाद और उदारवाद से पैदा होने वाले खतरे से वाक़ि़फ थे. इसलिए उन्होंने यह तय किया था कि सरकार ग़रीबों और पिछड़ों के विकास के लिए योजनाएं बनाएगी. हर परिवार को अवसर प्रदान करेगी. यही नीति 1990 तक भारत में लागू रही, लेकिन 1991 के बाद से देश को निजीकरण, बाज़ारवाद, नव उदारवाद और वैश्वीकरण की आग में झोंक दिया गया, जिसका असर महंगाई बेरोज़गारी, ग़रीबी और किसानों की आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है. उदारवाद का मतलब है कि सरकार बाज़ार के प्रति उदार हो जाए. मतलब यह कि बाज़ार के किसी भी मसले में सरकार कुछ न करे. यूरोप में इसकी शुरुआत हुई, लेकिन पूंजीवाद ने जब अपना असली चेहरा दिखाया तो वहां भी व्यवस्था में परिवर्तन आया. यह ज़रूरत महसूस होने लगी कि अगर बाज़ार को बेलगाम कर दिया गया तो ग़रीबों के सामने मरने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा. इसी वजह से यूरोप में कल्याणकारी राज्य यानी वेलफेयर स्टेट का उदय हुआ. कल्याणकारी राज्य का मतलब यह है कि समाज में जो पिछड़े हैं, ग़रीब हैं, उनके विकास के लिए सरकार खर्च करे. बाज़ार पर नियंत्रण रखे, ताकि महंगाई या आर्थिक मुसीबतों से सरकार जनता को निजात दिला सके. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से विश्व की अर्थव्यवस्था का नया स्वरूप सामने आया है. इसमें जो नियम-क़ानून और संस्थाएं बनीं, उनसे यूरोप के देशों को फायदा हुआ. एक बार फिर पूंजीवाद की पकड़ मज़बूत हुई तो सरकार उदारवाद के रास्ते पर चल पड़ी. यही नव उदारवाद का दौर है.

जवाहर लाल नेहरू कल्याणकारी राज्य के हिमायती थे. उन्होंने सरकार के ज़रिए समाज के विकास का ताना-बाना बुना था, ताकि छोटे-छोटे उत्पादकों को विश्व बाज़ार की मार से बचाया जा सके. देश में औद्योगीकरण निजी क्षेत्र को न देकर सरकार ने उसकी ज़िम्मेदारी खुद ली. पंचवर्षीय योजना के ज़रिए आर्थिक एवं सामाजिक विकास की नींव रखी गई. यह लोगों की खुशहाली के लिए एक सकारात्मक कदम था. भारत को इसमें पूरी सफलता नहीं मिली. ग़रीबी नहीं घटी, लेकिन बढ़ी भी नहीं. 1991 में जो आर्थिक नीति अपनाई गई, वह आर्थिक एवं सामाजिक विकास में सरकार की घटती ज़िम्मेदारियों, निजीकरण और वैश्वीकरण की पक्षधर है. इसका सबसे पहला असर सरकार के रवैये पर दिखता है. 1947 से 1990 तक सरकार बाज़ार और जनता के विकास के कार्यों को अपने हाथ में रखती थी, लेकिन 1991 से सरकार ने इस दायित्व से अपना हाथ खींचना शुरू कर दिया. इंडस्ट्री के निजीकरण का दौर आया, पहले सरकारी कंपनियों की नीलामी शुरू हो गई. विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ की नीतियों को देश में लागू किया जाने लगा. सरकार धीरे-धीरे जनता और समाज के  कल्याण और विकास की ज़िम्मेदारी से हाथ खींच रही है. यूरोप के नव उदारवाद का तर्क भारत पर लागू करना भयंकर भूल साबित होने वाला है. यूरोप के देश विकसित हैं. वहां की सरकार को विकास के लिए योजना बनाने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि जो कुछ है, उसे सुचारू रूप से चलाने की ज़िम्मेदारी है. भारत ग़रीब देश है. यहां बेरोज़गारी और भुखमरी है. किसानों और मज़दूरों की स्थिति दयनीय है. ऐसे में सरकार द्वारा खुद को देश के पिछड़ों एवं ग़रीबों के कल्याण, विकास और उनके भविष्य से अलग करना घातक होगा.

इसके ठीक उलट, सरकार की नीतियां पूंजीपतियों और उद्योगपतियों की सहूलियत के लिए तैयार की जा रही हैं. सच्चाई यह है कि पूंजीवाद ने देश की अर्थव्यवस्था को अपने शिकंजे में ले लिया है. सरकार लाचार हो गई है. हर क्षेत्र में स्वदेशी या विदेशी निवेश को विकास का आधार मान लिया गया है. सरकार सार्वभौम की जगह नियामक बनकर रह गई. बड़े-बड़े पूंजीपतियों एवं उद्योगपतियों को हर तरह की छूट दे दी गई, जिसकी वजह से उन्होंने खुदरा व्यापार में अपनी धाक जमा ली. हर तरह के सेवा क्षेत्र में सरकार ने खुद नुक़सान सहकर निजी कंपनियों को प्रोत्साहित किया. आज हालत यह है कि उदारवाद के नाम पर निजी कंपनियों का एकाधिकार स्थापित हो रहा है. महंगाई की वजह भी यही है कि निजी कंपनियां कृषि क्षेत्र में अपने पैर पसार रही हैं. सामान महंगे ज़रूर बिक रहे हैं, लेकिन इसका फायदा न तो किसानों को हो रहा है और न उन्हें, जो ठेले पर सब्जियां बेच रहे हैं. मज़ेदार बात यह है कि मंडी में बैठे छोटे-मोटे व्यापारियों को भी नुक़सान हो रहा है. तो सवाल यह है कि जब सब नुक़सान में ही हैं तो इस बढ़ी हुई कीमत से फायदा किसका हो रहा है. बड़े-बड़े उद्योगपतियों का, देशी-विदेशी निजी कंपनियों का, जिनके  गोदामों पर छापे मारने की ताक़त सरकार में नहीं है. यही वजह है, जब सुप्रीमकोर्ट यह कहता है कि जो अनाज गोदामों में सड़ रहा है, उसे ग़रीबों में बांट दिया जाए तो सरकार कहती कि हम बाज़ार में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. सरकार के रवैये से यह सा़फ ज़ाहिर होता है कि उदारवाद के नाम पर वह निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा रही है. अगर अनाज को बांट दिया गया तो बाज़ार में उसकी कीमत कम हो जाएगी और सुपर जमाखोरों को नुक़सान हो जाएगा.

भारत की नव उदारवादी व्यवस्था के चार आयाम भयभीत कर देने वाले हैं. सबसे पहले, अर्थव्यवस्था असंतुलित हो गई. खेती का विकास नहीं के बराबर हुआ. देखा गया कि 1990 से प्रति व्यक्ति उत्पादन घटा. आज़ादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ था. सेवा क्षेत्र निरंतर बढ़ते हुए 55 फीसदी तक पहुंच गया. इसमें स़िर्फ आधा ही संगठित क्षेत्र में था, बाकी असंगठित क्षेत्र में. इससे पता चलता है कि ग़रीबी बढ़ रही थी. दूसरा आयाम यह कि चीन से हटकर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बहुत अधिक होना. यह इस बात का संकेत माना गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत मज़बूत है. लेकिन, यह मुद्रा भंडार निर्यात से कमाए हुए या प्रवासियों द्वारा भेजे गए पैसों की वजह से नहीं बना था. यह एफडीआई और बाहरी लोन की वजह से बना था.

तीसरी बात, अलग-अलग क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के लिए खोलना. खुदरा व्यापार को भी मुक्त बाज़ार के हाथों लुटने के लिए छोड़ दिया गया. ऐसा ही कुछ हुआ, कोल्ड स्टोरेज के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर को प्रवेश की अनुमति देकर. और, बाज़ार के ऐसे निवेशकों को क़र्ज़ खेती के लिए दिए गए क़र्ज़ में ही माना गया. मतलब, जो पैसा ग़रीब किसानों के लिए चला, वह अमीर जमाखोरों के हिस्से में चला गया. अंतिम बात, नव उदारवाद ने भारत में भ्रष्टाचार को नई ऊंचाई दी है. चाहे टू-जी स्पेक्ट्रम का मामला हो या खनिज भंडारों की लूट हो या फिर राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर जनता के पैसों की लूट की छूट देकर. यह राज्य का बदलता स्वरूप है, जिसमें राज्य अपने सारे कर्तव्यों को छोड़ता जा रहा है. सरकार ने नव उदारवाद को अपना दर्शन बना लिया है. डब्लूटीओ, विश्व बैंक, अमेरिका, फ्रांस और इंग्लैंड जैसे पश्चिमी देशों की वाहवाही लूटने के लिए सरकार ने भारत की जनता को नव उदारवाद के मुंह में धकेल दिया है. सरकार ने बाज़ार को अपने हिसाब से चलने की आज़ादी दे रखी है. यही वजह है कि वह अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं कर रही है. महंगाई पर लगाम लगाने के लिए कोई क़दम नहीं उठा रही है. महंगाई आसमान छू रही है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.