जानवरों के लिए सुरक्षित समझे जाने वाले उत्तराखंड के जंगलों में मानवीय द़खल से तंग जानवर आबादी की ओर रु़ख कर रहे हैं. हर दिन एक गजराज की अकाल मौत से राजाजी पार्क सहित पूरे इलाक़े में हड़कंप मचा हुआ है. उत्तरकाशी सहित टिहरी में वनाधिकारियों द्वारा टाइगर के खाल और ना़खून सहित कई अंग बरामदगी से यह बात पता चलती है कि शिकारी इन जंगलों को कब्रगाह बनाने पर तुले हैं. वनाधिकारी गाहे बगाहे कुछ बरामदगी दिखा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री ज़रूर कर लेते हैं. जंगलों में घुसकर इन वन्यजीवों के जीवन में खलल पैदा करने वालों को जब कभी बाघ-बाघिन अपना आहार बना लेती है, तो इसे इलेकट्रॉनिक मीडिया द्वारा लेडी किलर कह कर बदनाम किया जाता है. वन विभाग द्वारा ऐसी स्थिति में इस टाइगर को गोली मारने के आदेश दिए जाने को वन्य जीव प्रेमी दुर्भाग्यपूर्ण मान रहे हैं. उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद यहां के वन्य क्षेत्र से सट कर बस्ती बसाने का जो अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ है, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है.
उत्तराखंड के जंगलों में अब भी तीन सौ से अधिक गुलदार रूद्रप्रयाग चमोली, उत्तरकाशी, लैंसडौन, मसूरी, टिहरी, नरेंद्रनगर के जंगलों में होने का सरकारी आंकड़ा है. वन को इन वन्य जीवों के लिए पूरी तरह से संरक्षित करने की आवश्यकता को नकार कर सूबे की सरकार भी बे़खौफ वनों में अवैध कटान एवं मानवीय दखल को बढ़ावा दे रही है.
जंगल में मानव हस्तक्षेप भी बढ़ा है, इससे मानव व वन्यजीवों का संघर्ष भी दिनोंदिन बढ़ रहा है. उत्तराखंड की राजधानी स्थित दून चिकित्सालय इन दिनों बंदरों के काटने से घायलों से पटा पड़ा है. हर दिन लोग बंदरों के हमले से घायल होकर इलाज के लिए पहुंच रहे हैं. बंदरों के गले में रस्सी बांध कर नचाने वाला मानव इन दिनों डोईवाला, लच्छीवाला के जंगलों सहित दून से ॠषिकेश जाते समय हाथियों बंदरों गुलदारों से अपनी राह बचाता फिर रहा है. टाइगर, गुलदारों के लिए जाना जाने वाला उत्तराखंड इन दिनों इन वन्य जीवों के हमले के लिए जाना जाने लगा है. 1 जुलाई 2010 में पहले दिन ही घंघोटा, कोटारा संतूर बाजावाला में गुलदार का जो हमला हुआ, उसमें दो लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा. आठ लोग घायल हुए, 14 अक्टूबर को मोतीचूर में हाथी ने एक महिला की जान ले ली थी. 5 नवंबर को रायवाला के खाड़गांव में हाथी ने दो लोगों को अपने पांव से कुचल कर मौत के घाट उतार दिया था. 9 दिसंबर कोसातमोड़ के पास टस्कर हाथी ने एक महिला की जान ले ली थी. 21 दिसंबर को किद्दू वाला के पास एक गुलदार आवासीय कालोनी में घुस आया था, जिसे भयाक्रांत नागरिकों ने वन कर्मियों को बुलाकर पकड़वाया. 10 जनवरी 2011 को झाझरा के जंगल में गुलदार ने एक बच्ची को अपना शिकार बनाने के लिए हमला किया था. इसके एक दिन बाद ही इसी जंगल में एक गुलदार ने घास काटने गई महिला पर हमला बोला, इन दिनों अनारवाला के नागरिक गुलदार के आतंक से सूर्य ढलते ही घरों में कैद हो जाते हैं. अनारवाला की महिला ग्रामप्रधान निर्मला थापा बताती हैं कि गांव के लोगों का जीना दूभर हो गया है. सूबे का वनविभाग इन वन्यजीवों के हमले पर पूरी तरह तमाशबीन की भूमिका निभा रहा है. जनपद देहरादून की डीएफओ पूरी तरह से वन्यजीवों के पक्ष में खड़ी दिख रही है. उनका कहना है कि हमने जानवरों का घर उजाड़ा है. उसकी सजा मानव बस्तियों पर जानवरों के हमले के रूप में मिल रही है. मानव को अब भी सावधान होकर जंगल में हस्तक्षेप से बाज आना चाहिए. शीतकाल में गुलदार पूरी तरह मानव के लिए काल नज़र आ रहे हैं. वनजीव वैज्ञानिकों का मानना है कि शीतकाल ही उनके प्रजनन का काल है. इसी कारण वे बेकाबू होकर जंगल छोड़ बस्तियों की ओर भागने लगते हैं. उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में इस वर्ष अच्छी बर्फवारी हो रही है, जिसके चलते उच्च पहाड़ों को बसेरा बनाने वाले वन्य जीव भी नीचे मैदानों का रु़ख कर रहे हैं. वन्य जीव मर्मज्ञ तीन माह जनवरी तक के काल को वन्य जीवों से विशेष सावधानी बरतने की बात कहते हैं. उत्तराखंड के जंगलों में अब भी तीन सौ से अधिक गुलदार रूद्रप्रयाग चमोली, उत्तरकाशी, लैंसडौन, मसूरी, टिहरी, नरेंद्रनगर के जंगलों में होने का सरकारी आंकड़ा है. वन को इन वन्य जीवों के लिए पूरी तरह से संरक्षित करने की आवश्यकता को नकार कर सूबे की सरकार भी बे़खौफ वनों में अवैध कटान एवं मानवीय दखल को बढ़ावा दे रही है. यह राज्य की जनता के लिए हर हाल में आत्मघाती है.
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