पंचायत चुनावः निवेश के अड्डे बने चुनाव

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झारखंड में 32 वर्षों से लंबित पंचायत चुनाव अंतत: संपन्न हो गए. अब केंद्र सरकार से पंचायतों को मिलने वाली राशि मिलने का रास्ता सा़फ हो गया. चुनाव न होने के कारण झारखंड इससे वंचित रह रहा था. ग्रामीण इलाकों  के लोग अब खुद योजनाएं बनाएंगे और उन्हें अमली जामा पहनाएंगे. विकास के संबंध में कुछ इसी तरह के कयास झारखंड राज्य के गठन के व़क्त भी लगाए जा रहे थे. लेकिन हुआ यह कि राजनेताओं, नौकरशाहों और बिचौलियों की तिकड़ी ने आर्थिक लूट की ऐसी संस्कृति विकसित की जिससे आम जनता तक अलग राज्य का कोई लाभ नहीं पहुंच पाया. राजनेताओं ने चुनावों को निवेश का ज़रिया बना डाला और जीतने के बाद उससे मुना़फा उठाना अपना अधिकार समझने लगे. एक-एक चुनाव क्षेत्र में करोड़ों रुपये पानी की तरह फूंके जाने लगे और हर चुनाव के बाद घोटालों का बाज़ार गर्म होता गया. यह सिलसिला थमा नहीं बल्कि और विकराल रूप धारण करता गया.

लोगों को लग रहा था कि राज्य का गठन होते ही विकास की गंगा फूट निकलेगी. राज्य का कायाकल्प हो जाएगा. लेकिन राज्य गठन के एक दशक के बाद आमजन की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर चुका है. सत्ता में बैठे लोग और उनके चहेते मालामाल होते गए. जनता कंगाल होती गई. घोटालों का अंबार लग गया.

पंचायत चुनाव में भी इसी संस्कृति का ग्रासरूटीकरण होने की चर्चा है. मिली जानकारी के मुताबिक़ पंचायत चुनाव में भी धन-बल का पूरा इस्तेमाल किया गया है. इसमें कई राजनेताओं के परिजन और क़रीबी लोग चुनकर आए हैं. औद्योगिक इलाकों की पंचायतों में तो कई उम्मीदवारों ने लाखों रुपये फूंक डाले हैं. ज़ाहिर तौर पर यह निवेश समाज सेवा के लिये नहीं बल्कि पंचायतों को मिलने वाली संभावित राशि को ध्यान में रखकर किया गया है. यह स्थिति मुखिया, पंचायत सदस्य और वार्ड सदस्य के चुनाव की है. अभी प्रमुख, उप प्रमुख और ज़िला परिषद के चेयरमैन के चुनाव में तो यह खेल और बढेगा. पैसों और बाहुबल के ज़रिये चुनाव जीतने वाले जनप्रतिनिधियों से विकास की उम्मीद लगाना सूरज को दीपक दिखाने जैसा है. चुनाव में बेतहाशा खर्च ही लोकतंत्र में विकृति को जन्म देने वाला मुख्य कारक होता है. चुनाव आयोग लाख कोशिशों के बाद भी इसपर लगाम नहीं कस पा रहा है. अब इतना तय है कि पंचायतों को मिलने वाली राशि का वही हश्र होगा जो विधायक या सांसद मद की राशि का होता है. मुखिया जी अपने चहेतों को ज़्यादा से ज़्यादा ठेके देकर अपना कमीशन सुनिश्चित कराना चाहेंगे. योजनाओं के चयन में भी पंचायत के दबंग लोगों की मर्जी चलेगी. वे अपने निवास के आसपास ही विकास कार्यों को पूरा करने की जुगत भिड़ाएंगे. ग़रीब और कमज़ोर वर्ग के लोगों की सुनवाई की गुंजाइश कम ही रहेगी. जिन इलाक़ों में महिला उम्मीदवार जीतकर आई हैं, वहां उनके पति गांव की सत्ता संभालेंगे. बिहार में महिलाओं के लिये आरक्षित पंचायतों की कमान उनके पति ही संभालते हैं, इन्हें मुखियापति कहा जाता है. शिड्यूल एरिया के अंतर्गत आने वाले जनजातीय लोगों के लिए आरक्षित, जिन पंचायतों में जनजातीय परिवार गिने-चुने हैं, वहां पूरे समाज पर वी हावी नहीं हो सकेंगे. उन्हें अन्य जातियों के दबाव में काम करना पड़ेगा. वे चुनाव भी अन्य जातियों के सहयोग से जीते हैं. उधर प्रमुख, इप प्रमुख और जिला परिषद के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के चुनावों के दौरान राजनैतिक दलों ने अपनी सक्रियता तेज़ कर दी है. इसी बहाने पंचायत चुनाव में चुने गये प्रतिनिधियों पर भी उन्होंने डोरे डालने शुरू कर दिए हैं. उन्हें पता है कि अगले विधान सभा या लोकसभा चुनाव में उन्हें ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं का समर्थन दिलाने में इन्हीं की मुख्य भूमिका होगी. हालांकि यह दूरदर्शिता झारखंड नामधारी पार्टियों में कम ही देखी जा रही है. राष्ट्रीय पार्टियां इस दिशा में ज़्यादा सजग नज़र आ रही हैं.

कुल मिलाकर राज्य गठन के पहले जैसी स्थिति ही दिखाई दे रही है. उस व़क्त भी लोगों को लग रहा था कि राज्य का गठन होते ही विकास की गंगा फूट निकलेगी. राज्य का कायाकल्प हो जाएगा. लेकिन राज्य गठन के एक दशक के बाद आमजन की उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर चुका है. सत्ता में बैठे लोग और उनके चहेते मालामाल होते गए. जनता कंगाल होती गई. घोटालों का अंबार लग गया. कहीं यही हश्र पंचायतों का न हो. दरअसल गावों में सरकार तो पहुंची है, लेकिन वह किसकी है और किसके लिये काम करेगी, यह देखना ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

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