साई बाबा का ब्रह्मज्ञान


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श्री साई की लीला पुस्तिका श्री साई सच्चरित्र में एक ही भक्त ऐसा है, जो बाबा से भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए नहीं कहता. वह बाबा से इस मिथ्या जगत के किसी लोभ को नहीं मांगता, बल्कि वह बाबा से ब्रह्मज्ञान मांगता है. वास्तव में लीला पुरुषोत्तम श्री साई का आशय भी यही था कि इस लीला से सबको मोह त्याग करने की प्रेरणा मिले. आइए सबसे पहले हम इस लीला को श्री हेमाडपंत जी द्वारा स्मरण करते हैं:

बाबा स्वयं समर्थ थे और यदि वह इन महाशय से दक्षिणा चाहते तो साधिकार मांग सकते थे. बाबा ने किसी से भी दक्षिणा इसलिए नहीं ली कि उनके पास बहुत धन है. बाबा ने दक्षिणा इसलिए मांगी, क्योंकि वह सब कुछ उनका ही तो है. फिर इन महाशय के स्वयं धन अर्पित करने की प्रतीक्षा क्यों?

एक धनी व्यक्ति (दुर्भाग्य से मूल ग्रंथ में उसका नाम और परिचय नहीं दिया गया है) अपने जीवन में सब प्रकार से संपन्न था. उसके पास अतुल संपत्ति, घोड़े, भूमि और अनेक दास एवं दासियां थीं. जब बाबा की कीर्ति उसके कानों तक पहुंची तो उसने अपने एक मित्र से कहा कि मेरे लिए अब किसी वस्तु की अभिलाषा शेष नहीं रह गई है, इसलिए अब शिरडी जाकर बाबा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए और यदि किसी प्रकार उसकी प्राप्ति हो गई तो फिर मुझसे अधिक सुखी और कौन हो सकता है? उसके मित्र ने उसे समझाया कि ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति सहज नहीं है. विशेषकर तुम जैसे मोहग्रस्त को, जो सदैव स्त्री, संतान और द्रव्योपार्जन में ही फंसा रहता है. तुम्हारी ब्रह्मज्ञान की आकांक्षा की पूर्ति कौन करेगा, जो भूलकर भी कभी एक फूटी कौड़ी का दान नहीं देता? अपने मित्र के परामर्श की उपेक्षा कर वह आने-जाने के लिए एक तांगा लेकर शिरडी आया और सीधे मस्जिद पहुंचा. वह साई बाबा के दर्शन कर उनके चरणों में जा गिरा और प्रार्थना की कि आप यहां आने वाले समस्त लोगों को अल्प समय में ही ब्रह्मदर्शन करा देते हैं, केवल यही सुनकर मैं बहुत दूर से इतना मार्ग चलकर आया हूं. मैं इस यात्रा से थक गया हूं. यदि कहीं मुझे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाए तो मैं यह कष्ट उठाना सफल और सार्थक समझूंगा.

बाबा बोले, मेरे प्रिय मित्र, इतने अधीर न हो. मैं तुम्हें शीघ्र ही ब्रह्म का दर्शन करा दूंगा. मेरे सब व्यवहार नकद हैं और मैं उधार कभी नहीं करता. इसी कारण अनेक लोग धन, स्वास्थ्य, शक्ति, मान, पद, आरोग्य एवं अन्य पदार्थों की इच्छापूर्ति हेतु मेरे पास आते हैं. ऐसा तो कोई विरला ही आता है, जो ब्रह्मज्ञान का पिपासु हो. भौतिक पदार्थों की अभिलाषा से यहां आने वाले लोगों का कोई अभाव नहीं, परंतु आध्यात्मिक जिज्ञासुओं का आगमन बहुत ही दुर्लभ है. मैं सोचता हूं कि यह क्षण मेरे लिए बहुत ही धन्य एवं शुभ है, जब आप जैसे महानुभाव यहां पधार कर मुझे ब्रह्मज्ञान देने के लिए जोर दे रहे हैं. मैं सहर्ष आपको ब्रह्मदर्शन करा दूंगा. यह कहकर बाबा ने उसे ब्रह्मदर्शन कराने हेतु अपने पास बैठा लिया और इधर-उधर की चर्चाओं में लगा दिया, जिससे कुछ समय के लिए वह अपना प्रश्न भूल गया. इसी बीच बाबा ने एक बालक को बुलाकर नंदू मारवाड़ी के यहां से पांच रुपये उधार लाने को भेजा. लड़के ने वापस आकर बताया कि नंदू का तो कोई पता नहीं है और उसके घर पर ताला पड़ा है. फिर बाबा ने उसे दूसरे व्यापारी के यहां भेजा. इस बार भी लड़का रुपये लाने में असफल रहा. इस प्रयोग को दो-तीन बार दोहराने पर भी उसका परिणाम पूर्ववत ही निकला.

हमें ज्ञात है कि बाबा स्वयं सगुण ब्रह्म के अवतार थे. यहां प्रश्न हो सकता है कि पांच रुपये जैसी तुच्छ राशि की यथार्थ में उन्हें आवश्यकता ही क्या थी और उस ऋण को प्राप्त करने के लिए इतना कठिन परिश्रम क्यों किया गया? उन्हें तो इसकी बिल्कुल आवश्यकता ही नहीं थी. वह तो पूर्ण रीति से जानते होंगे कि नंदू जी घर पर नहीं हैं. यह नाटक तो उन्होंने केवल अन्वेषक के परीक्षार्थ ही रचा था. ब्रह्मजिज्ञासु के पास नोटों की अनेक गड्डियां थीं और यदि वह सचमुच ब्रह्मज्ञान का आकांक्षी होता तो इतने समय तक शांत न बैठता. जब बाबा व्यग्रतापूर्वक पांच रुपये उधार लाने के लिए बालक को यहां-वहां दौड़ा रहे थे तो वह दर्शक बना बैठा न रहता. वह जानता था कि बाबा अपने वचन पूर्ण करके ऋण अवश्य चुकाएंगे. यद्यपि बाबा द्वारा इच्छित राशि बहुत अल्प थी, फिर भी वह स्वयं संकल्प करने में असमर्थ रहा और पांच रुपये उधार देने तक का साहस नहीं कर सका. पाठक थोड़ा विचार करें कि यदि बाबा से सचमुच प्रेम करने वाला अन्य कोई व्यक्ति होता तो वह तुरंत ही पांच रुपये दे देता, परंतु उस आदमी की दशा तो बिल्कुल विपरीत थी. उसने न रुपये दिए और न शांत ही बैठा, बल्कि वापस लौटने की तैयारी करने लगा और अधीर होकर बाबा से बोला, अरे बाबा, कृपया मुझे शीघ्र ब्रह्मज्ञान दो. बाबा ने उत्तर दिया, मेरे प्यारे मित्र, क्या इस नाटक से तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आया? मैं तुम्हें ब्रह्मदर्शन कराने का ही तो प्रयत्न कर रहा था. संक्षेप में तात्पर्य यह है कि ब्रह्म का दर्शन करने के लिए पांच वस्तुओं का त्याग करना पड़ता है:- (1) पांच प्राण

(2) पांच इंद्रियां (3) मन (4) बुद्धि (5) अहंकार. यह हुआ ब्रह्मज्ञान. आत्मानुभूति का मार्ग भी उसी प्रकार है, जिस प्रकार तलवार की धार पर चलना. श्री साई की कथा अनंत है, साई नाम अनमोल. जनम सफल हो जाएगा, साई-साई बोल. बाबा की लीलाएं जितनी मनमोहक हैं, उनका रहस्य और तात्पर्य उससे भी अधिक गूढ़ है. वास्तव में बाबा की इस लीला का उद्देश्य भक्तों के मोहग्रस्त मन को माया के पाश से मुक्त कराना और सही मार्ग दिखाना था. अब हम उन सज्जन की बात करते हैं, जो ब्रह्मज्ञान के लिए व्यग्र थे. मेरे अबोध मन में जो जिज्ञासा या विचार हैं, उन्हें मैं यहां आप सभी साई भक्तों के चरणों में अर्पित कर रहा हूं. यदि मेरे विचारों से आप सहमत नहीं तो मुझे मार्गदर्शन दीजिए और यदि सहमत हैं तो आशीर्वाद. वास्तव में बाबा की इन सज्जन पर बहुत कृपा रही होगी, जो बाबा ने अपनी एक विलक्षण लीला में उन्हें सांकेतिक रूप से प्रयोग किया. श्री साई के पास ब्रह्मज्ञान के लिए एक ही व्यक्ति आया और बाबा ने उसे भी ब्रह्मज्ञान देने के स्थान पर उसका उपहास किया, ऐसा सोचना भी मूर्खता जैसी स्थिति है. मेरा साई जो सबके लिए मां और बाप के समान है, वह ब्रह्मज्ञान मांगने वाले का उपहास नहीं कर सकता. श्री साई सच्चरित्र इस कथन को सत्य सिद्ध करता है कि बूटी साहेब, शमा गुरुजी, नाना साहेब चांदोरकर या स्वयं दासगणु महाराज जैसे सतत साई अनुयायियों ने भी बाबा से कभी ब्रह्मज्ञान नहीं मांगा. मेरे विचार में इन सज्जन का नाम ग्रंन्थ में इसलिए नहीं है, क्योंकि इनका नाम लिखने से इनके व्यापार या परिवार से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए ऐसी ही धारणा बन जाती. इसलिए बाबा की अंतःप्रेरणा से मूल ग्रंथ में इनका नाम नहीं है. एक बात यह कि जिस साई के सामने प्रबुद्ध और धनाढ्य व्यक्तियों के विचार और व्यवहार भी शांत हो जाते थे, उनके सामने यह महाशय किस प्रकार अपने धन का प्रदर्शन कर सकते थे?

बाबा स्वयं समर्थ थे और यदि वह इन महाशय से दक्षिणा चाहते तो साधिकार मांग सकते थे. बाबा ने किसी से भी दक्षिणा इसलिए नहीं ली कि उसके पास बहुत धन है. बाबा ने दक्षिणा इसलिए मांगी, क्योंकि वह सब कुछ उनका ही तो है. फिर इन महाशय के स्वयं धन अर्पित करने की प्रतीक्षा क्यों? विचार कीजिए कि यदि आप उन सज्जन के स्थान पर हैं और बाबा से कहते हैं कि बाबा, मुझसे पांच रुपये ले लो तो क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि बाबा कहते, तू मुझे धन देगा? तेरे पास है इतना की, तू साई को दे सके? ऐसे में स्थिति और भी ख़राब होती. दूसरी बात यह है कि धनवान व्यक्ति वास्तव में सहज नहीं होते. धन की माया किसी को भी असहज और अनावश्यक रूप से विचारशील बना देती है. इन सज्जन को तो शायद यह लगा ही नहीं होगा कि बाबा उस बालक को इसलिए दौड़ा रहे हैं कि इन्हें शिक्षा मिले. यह तो यही विचार कर रहे होंगे कि बाबा जल्द से जल्द इन्हें ब्रह्मज्ञान दें. इनके लिए ब्रह्मज्ञान पाना किसी अन्य वस्तु को पाने जैसा ही रहा होगा. सांसारिक व्यापार को चलाने वाला आध्यात्मिक व्यवहार को नहीं समझता होगा, ऐसा हम समझ सकते हैं. आख़िरी बात यह कि शायद यह महाशय ब्रह्मज्ञान और गुरुमंत्र में भेद ही न कर पाए हों. गुरुमंत्र तो गुरु एक साधारण और अत्यंत आत्मीय परिस्थिति में कभी भी दे सकता है. कैसे श्रीमती कानिटकर जो बहुत छोटी उम्र में बाबा के दर्शन करने अपने परिवार के साथ गई थीं. बाबा ने उनके पैरों पर हाथ फेरकर कहा था, जा राममय हो जा. कहते हैं, 80 वर्ष की अवस्था में भी वह अपने पैरों से भलीभांति चल सकती थीं. जिस प्रकार सहजता से श्रीमती रमाबाई कानिटकर को रामनाम जप का गुरुमंत्र मिला था, उसी प्रकार राधाबाई देशमुख को बाबा ने कोई गुरुमंत्र नहीं दिया.


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