सांप्रदायिकता विरोधी गर्जनाः केवल बातों से काम नहीं चलेगा

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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विशेष कांग्रेस अधिवेशन को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सांप्रदायिक ताक़तों पर कटु हमला किया. उन्होंने कहा कि वे सभी संगठन, विचारधाराएं एवं व्यक्ति, जो हमारे इतिहास को तोड़ते-मरोड़ते हैं, धार्मिक पूर्वाग्रहों को हवा देते हैं और धर्म के नाम पर आमजनों को हिंसा करने के लिए उकसाते हैं, देश के लिए विनाशकारी हैं. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस ने हमेशा हर प्रकार की सांप्रदायिकता से लोहा लिया है, चाहे उसका स्रोत कोई भी संगठन रहा हो. बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदायों की सांप्रदायिकता में कोई फर्क़ नहीं है और देश के लिए दोनों ही बराबर ख़तरनाक हैं. यद्यपि यह वक्तव्य स्वागत योग्य है, परंतु अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक वर्गों की सांप्रदायिकता के बीच कोई विभेद न करने का सोनिया गांधी का दृष्टिकोण उचित नहीं जान पड़ता.

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को एक ही पलड़े पर तौलना कांग्रेस की उन धर्मनिरपेक्ष नीतियों के विरुद्ध है, जिनकी नींव पंडित नेहरू ने रखी थी. हमारे देश में सांप्रदायिक राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा दोनों के पीछे बहुसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिकता है.

सबसे पहले कांग्रेस अध्यक्ष को उनके पति के नाना एवं आधुनिक भारत के निर्माता पंडित जवाहर लाल नेहरू के विचार याद दिलाना आवश्यक है. पंडित नेहरू ने कहा था कि यद्यपि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, दोनों ही वर्गों की सांप्रदायिकता बुरी है, तथापि बहुसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिकता देश के लिए कहीं अधिक घातक है, क्योंकि वह राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़े रहती है. अल्पसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिकता अधिक से अधिक विघटनकारी प्रवृत्तियों को जन्म दे सकती है. वह बहुसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिकता को भड़काती भी है और उसे वे बहाने देती है, जिनके सहारे उस वर्ग विशेष के सांप्रदायिक तत्व अपनी गतिविधियां बढ़ाते जाते हैं. लेकिन यह मानना अनुचित होगा कि अगर अल्पसंख्यक वर्ग न भड़काए तो बहुसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिक ताक़तें निष्क्रिय रहेंगी. वे तब भी वही करेंगी, जो भड़काए जाने पर करती हैं.

अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को एक ही पलड़े पर तौलना कांग्रेस की उन धर्मनिरपेक्ष नीतियों के विरुद्ध है, जिनकी नींव पंडित नेहरू ने रखी थी. हमारे देश में सांप्रदायिक राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा दोनों के पीछे बहुसंख्यक वर्ग की सांप्रदायिकता है. बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का प्रभाव क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, उसने समाज के सोचने के तरीक़े को बदल दिया है, उसने देश का ध्यान आम लोगों की मूल आवश्यकताओं से हटाकर राम मंदिर जैसे अनावश्यक मुद्दों पर केंद्रित कर दिया है. शाहबानो मामले को अल्पसंख्यक सांप्रदायिक ताक़तों ने बहुत उछाला था और इससे निश्चित रूप से देश को हानि हुई थी, परंतु यह हानि राम मंदिर आंदोलन के कारण देश को हुए नुक़सान के सामने कुछ भी नहीं थी. राम मंदिर आंदोलन ने पहले समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित किया, फिर बाबरी मस्जिद को ढहाया और उसके बाद देश भर में मुसलमानों के ख़िला़फ भयावह हिंसा की. अलबत्ता दोनों प्रकार की सांप्रदायिकता में कुछ समानताएं भी हैं. दोनों ही सामंती और मध्यम वर्ग के हितों की पैरोकार हैं. ये वे वर्ग हैं, जो अपने विशेषाधिकार और समाज में अपनी उच्च स्थिति को बनाए रखना चाहते हैं.

सोनिया गांधी का यह दावा कि कांग्रेस कभी सांप्रदायिकता से लोहा लेने से पीछे नहीं हटी, भी एक अर्धसत्य है. कई मौक़ों पर कांग्रेस ने सांप्रदायिकता का नंगानाच नज़रअंदाज़ किया. चाहे सिख विरोधी दंगे हों या बाबरी ध्वंस, कांग्रेस या तो दूसरी तऱफ देखती रही या दोपहर की झपकी का मज़ा लेती रही. यही कारण है कि कुछ आलोचक कांग्रेस पर सांप्रदायिक दल होने का आरोप लगाते हैं और कई लोगों का तो यहां तक कहना है कि इस मामले में कांग्रेस भाजपा से भी अधिक दोषी है. जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में रही, वे भी सांप्रदायिक दंगों से मुक्त नहीं रहे. यद्यपि यह मान्यता सही नहीं है, तथापि इससे यह अवश्य ध्वनित होता है कि दंगा पीड़ित कितने अधिक कुंठित हो गए हैं और यह भी कि वे मानते हैं कि कांग्रेस अगर चाहती तो वह सांप्रदायिक हिंसा पर नियंत्रण कर सकती थी. अगर कांग्रेस सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए सार्थक हस्तक्षेप नहीं करती रही है तो इसका एक कारण तो यह है कि सत्ता के लोभ में कई सांप्रदायिक तत्वों ने कांग्रेस में घुसपैठ कर ली है. उनकी धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में कोई आस्था नहीं है. दूसरे, जैसा कि दिग्विजय सिंह ने कहा है कि सांप्रदायिक तत्वों ने पुलिस, नौकरशाही, सेना एवं न्यायपालिका सहित राज्य के सभी तंत्रों में पैठ बना ली है.

हम सबको यह अवश्य स्वीकार करना होगा कि धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर कांग्रेस उतनी चौकस और प्रतिबद्ध नहीं रही, जितना उसे रहना चाहिए था. कांग्रेस ने चुनावों में लाभ पाने के लिए अनेक बार सिद्धांतों को तिलांजलि दी. अयोध्या निर्णय पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर इस तथ्य को रेखांकित किया है कि वह अवसरवादी नीतियां अपनाने में सिद्धहस्त है. अयोध्या निर्णय भारतीय संविधान के ख़िला़फ है और उन प्रजातांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के भी, जो गांधी जी और नेहरू के नेतृत्व के दिनों में कांग्रेस के पथप्रदर्शक थे. इसके बावजूद कांग्रेस ने इस निर्णय के बारे में एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा. कांग्रेस अध्यक्ष के वक्तव्य का हम जोरदार स्वागत करते, यदि उनकी कथनी के अनुरूप कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मैदानी स्तर पर प्रदर्शित करती. अगर कांग्रेस सचमुच धर्मनिरपेक्ष है तो उसे अयोध्या निर्णय को धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर कसना चाहिए और अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए. सच्चर समिति एवं रंगनाथ मिश्र आयोग की रपटों को ठंडे बस्ते में डालकर कांग्रेस यह दावा नहीं कर सकती कि वह धर्मनिरपेक्ष है. हंसना और गाल फुलाना एक साथ नहीं हो सकता. क्या कांग्रेस इतिहास के सांप्रदायिकीकरण के विरुद्ध आवाज़ उठाएगी? क्या कांग्रेस अल्पसंख्यकों के विरुद्ध किए जा रहे दुष्प्रचार का मुक़ाबला करेगी? क्या वह ईसाइयों और मुसलमानों के ख़िला़फ उन पूर्वाग्रहों को दूर करने का प्रयास करेगी, जिन्होंने हमारे समाज में गहरी जड़ें जमा ली हैं? क्या कांग्रेस वे सभी क़दम उठाने में सक्षम है, जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के संरक्षण और संवर्धन के लिए आवश्यक हैं? क्या कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को धर्मनिरपेक्षता और प्रजातंत्र का पाठ पढ़ाएगी?

इन दिनों कांग्रेस में ज़ोर-शोर से सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है. क्या पार्टी यह सुनिश्चित कर रही है कि नए भर्ती हो रहे कांग्रेसी कहीं सांप्रदायिकता के वायरस से ग्रस्त तो नहीं हैं? जो भी पार्टियां धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उन्हें अपने वर्तमान और नए सदस्यों को गहन प्रशिक्षण देना होगा, ताकि वे समाज में फैलाई जा रही सांप्रदायिक घृणा से लड़ सकें. अगर कांग्रेस यह सब नहीं करती है तो पार्टी अध्यक्ष का वक्तव्य केवल एक खोखला नारा बनकर रह जाएगा.

इस सिलसिले में दिग्विजय सिंह का वह बयान भी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने राज्य तंत्र में सांप्रदायिक तत्वों की बड़े पैमाने पर घुसपैठ पर चिंता व्यक्त की है. क्या ऐसी कोई रणनीति बनाई जाएगी, जिससे सभी स्तरों के अधिकारी-कर्मचारी धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहें और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों के वाहक न बनें. यह सही है कि सांप्रदायिक ताक़तों ने हर दिमाग़ में घृणा का बीज बो दिया है, परंतु प्रश्न यह है कि कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी इस समस्या से निपटने के लिए क्या कर रही है? दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा है कि सांप्रदायिक ताक़तें जर्मनी के नाजियों की तरह अल्पसंख्यकों पर निशाना साध रही हैं. बिल्कुल ठीक, परंतु महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसे रोकने के लिए क्या किया जा रहा है? यही वह चुनौती है, जिससे कांग्रेस को मुक़ाबला करना है.

(लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक हैं)

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