संघ, अयोध्या निर्णय व भारतीय राष्ट्रवाद

अयोध्या निर्णय की जिन आधारों पर आलोचना की जा रही है, उनमें से कुछ हैं, ज़मीन के मालिकाना हक़ संबंधी मूल मुद्दे की उपेक्षा व 23 दिसंबर, 1949 की आधी रात को मस्जिद के अंदर रामलला की मूर्तियों की स्थापना और 6 दिसंबर 1992 को संघ परिवार द्वारा मस्जिद को ढहाए जाने के घोर अवैधानिक व अनैतिक कृत्यों को नज़रअंदाज़ किया जाना. हाल में इस मुद्दे में एक नया आयाम जुड़ गया है. और यह आयाम है आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा इस निर्णय की प्रशंसा व स्वागत. भागवत ने कहा है कि इस निर्णय से भव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है, क्योंकि अदालत ने उस भूमि, जहां मस्जिद स्थित थी, का दो तिहाई हिस्सा हिंदुओं को आवंटित कर दिया है. उन्होंने यह भी फरमाया कि भूमि का विभाजन अनावश्यक था, क्योंकि विभाजन से हमेशा समस्याएं ही पैदा होती हैं, जैसा कि कश्मीर के मामले में हुआ.

मध्यकाल में निर्मित इमारतों को विदेशी शासन का प्रतीक मानना, भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा के विरुद्ध है. भारतीय राष्ट्रवादियों ने केवल ब्रिटिश शासन को विदेशी शासन माना था और उसके विरुद्ध संघर्ष किया था. इसके बावजूद, भारतीय राष्ट्रवादियों ने कभी ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित इमारतों, जिनमें राष्ट्रपति भवन, संसद भवन व नॉर्थ तथा साउथ ब्लॉक शामिल हैं, को नष्ट किए जाने की बात तक नहीं की.

उन्होंने यह मांग की कि पूरी ज़मीन हिंदुओं को सौंप दी जानी चाहिए. इससे विदेशी शासन की प्रतीक, बाबरी मस्जिद, का नामो-निशां मिट जाएगा और भारतीय राष्ट्रीयता का गौरव बढ़ेगा. राम मंदिर बनने से, भागवत के अनुसार, भारत की आत्मचेतना का उदय होगा.

संघ की भविष्य की रणनीति की ओर संकेत करते हुए भागवत ने कहा कि अब समय आ गया है कि भारत के मूल चरित्र व उसकी असली छवि को प्रतिविंबित करने वाले उन सभी प्रतीकों की पुन:स्थापना की जाए, जो विदेशी शासन के दौरान नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए थे.

भागवत का बयान, संघ की राजनीति, विचारधारा व एजेंडे के अनुरूप है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि विवादित स्थल की ज़मीन के विभाजन की तुलना कश्मीर के विभाजन से करना बेमानी व अतार्किक है. कश्मीर एक स्वतंत्र राज्य था, जिस पर पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया था. इस आक्रमण के बाद, कश्मीर भारत का हिस्सा बना लेकिन इस शर्त पर कि रक्षा, संचार, मुद्रा व विदेशी मामलों को छोड़कर, अन्य सभी क्षेत्रों में उसे पूर्ण स्वायत्ता हासिल रहेगी. जब भारतीय सेना कश्मीर पहुंची, तब तक पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर के एक-तिहाई हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था. कश्मीर का विभाजन किसी क़ानूनी प्रक्रिया से नहीं हुआ. वह तो पाकिस्तान के आक्रमण का नतीजा था. कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान का ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ा बना हुआ है. संयुक्त राष्ट्रसंघ ने कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात कई बार कही परंतु वह आज तक नहीं हो सका है.

बाबरी मस्जिद, एक वैध भारतीय क़ानून के अंतर्गत, संरक्षित ऐतिहासिक स्मारक थी. सन 1949 में 23 दिसंबर की रात को, हिंदू राष्ट्रवाद से प्रेरित, अज्ञात व्यक्तियों ने इस स्मारक में अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर, वहां रामलला की मूर्तियां रख दीं. उसके बाद, सन 1980 के दशक में, आडवाणी व उनके साथियों ने इस मुद्दे का दामन थाम लिया और 1992 में मस्जिद को ढहा दिया गया. यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में घटित सबसे बड़े अपराधों में से एक था. यह भारतीय संविधान पर हमला भी था.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में पंचायती फैसला सुना दिया. मूल प्रश्नों व मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया. संभवत:, न्यायालय भी सांप्रदायिक हिंसा व दुष्प्रचार के चलते, समाज के सांप्रदायिकीकरण से प्रभावित हो गया था. ज़रूरत इस बात की है कि इस मामले में भारतीय संविधान व क़ानूनों के प्रकाश में उचित, न्यायोचित निर्णय किया जाए. सुन्नी व़क़्फ बोर्ड, विवादित भूमि पर इतने लंबे समय से क़ाबिज़ था, कि भूमि पर उसके मालिकाना हक़ को कोई वैधानिक चुनौती नहीं दी जा सकती. पूरी ज़मीन को सुन्नी व़क़्फ बोर्ड को सौंपा जाना ही इस विवाद का न्यायपूर्ण हल होगा.

मध्यकाल में निर्मित इमारतों को विदेशी शासन का प्रतीक मानना, भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा के विरुद्ध है. भारतीय राष्ट्रवादियों ने केवल ब्रिटिश शासन को विदेशी शासन माना था और उसके विरुद्ध संघर्ष किया था. इसके बावजूद, भारतीय राष्ट्रवादियों ने कभी ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित इमारतों, जिनमें राष्ट्रपति भवन, संसद भवन व नॉर्थ तथा साउथ ब्लॉक शामिल हैं, को नष्ट किए जाने की बात तक नहीं की. संघ और उसकी विचारधारा के अन्य संगठनों ने विदेशी शासन के विरुद्ध चले लंबे संघर्ष में तनिक भी भागीदारी नहीं की. वे शायद केवल मुस्लिम बादशाहों के दौर को विदेशी राज मानते हैं, ब्रिटिश शासन को नहीं. यह सोच भी भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध है. बादशाहों और राजाओं-नवाबों के शासनकाल को राष्ट्रीयता से जोड़ना अनुचित व अवांछनीय है. राजा-चाहे वे किसी धर्म के क्यों न रहे हों-केवल सत्ता और संपत्ति के उपासक थे. वे न तो जनता के प्रतिनिधि थे और न ही अपने धर्मों के. चूंकि संघ की विचारधारा का उदय ही हिंदू राजाओं, जमींदारों व पुरोहितों के अस्त होते वर्गों से हुआ था, इसलिए आश्चर्य नहीं कि संघ, राजाओं के शासनकाल को राष्ट्रवाद से जोड़ता है. ठीक यही दृष्टिकोण मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों का है. वे भी मुस्लिम बादशाहों के राज को राष्ट्रवाद का प्रतीक मानते हैं. सांप्रदायिक विचारधारा के पोषक, जानबूझकर, राजशाही व आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के बीच अंतर नहीं करते. उनकी यह मान्यता है कि विभिन्न धार्मिक समुदाय, हमेशा से एक-दूसरे के शत्रु हैं और आपस में युद्धरत रहे हैं.

हिंदू राजा भी हिंदू किसानों का शोषण करते थे. और यदि मुस्लिम राजा, हिंदू कृषकों का ख़ून चूसते थे तो उसका कारण यह नहीं था कि किसान हिंदू थे. मुस्लिम बादशाहों का मुस्लिम कृषकों के साथ भी यही व्यवहार रहता था. कुछ अपवादों को छोड़कर, राजाओं-बादशाहों ने कभी किसी धर्म की ध्वजा नहीं उठाई. बेशक, शुरुआती दौर में कुछ मुस्लिम आक्रांताओं ने लूटपाट मचाई लेकिन एक बार हिंदू राजाओं के साथ संधियां आदि करके, भारत में उनका राज जम गया. उसके बाद उन्होंने भारत से संपत्ति लूट कर देश के बाहर ले जाना बंद कर दिया. इसके विपरीत, ब्रिटिश शासन का तो मूल उद्देश्य ही भारत के प्राकृतिक संसाधनों को लूटकर ब्रिटेन को धनी बनाना था.

संघ व अन्य सांप्रदायिक तत्व, ब्रिटिश शासन के  शोषक चरित्र को नज़रअंदाज़ कर, मुस्लिम शासकों के अत्याचारों का राग अलापते रहते हैं. यह राग उनके धार्मिक राष्ट्रवाद के एजेंडे के अनुरूप है. उस राष्ट्रवाद के, जो स्वाधीनता संग्राम के स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों के विरुद्ध है.

इसके विपरीत, आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद, इतिहास को धर्म के चश्मे से नहीं देखता. इसका मुख्य लक्ष्य, संविधान में निहित मूल्यों के अनुरूप, भविष्य के भारत को समृद्ध, शक्तिशाली व सबके साथ न्याय करने वाला देश बनाना है. इसी कारण, पंडित नेहरू, उद्योगों, बांधों और उच्च शिक्षण संस्थाओं को आधुनिक भारत के नए मंदिर कहा करते थे. इसके उलट संघ की रुचि केवल प्राचीन भारत के पुरातन मंदिरों में है. उसकी रुचि, भारतीय इतिहास के उस दौर में है, जिसमें हिंदू राजा, मनुस्मृति के सिद्धांतों के अनुरूप शासन करते थे, जब जन्म-आधारित ऊंच-नीच का बोलबाला था.

अंग्रेज शासकों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत, भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन किया, राजाओं को हिंदू व मुस्लिम के रूप में प्रस्तुत किया और भारतीयों के बीच विभाजन के बीज बोए. एक ओर हिंदू महासभा-आरएसएस व दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने इस खेल में अंगे्रजों का साथ दिया. उन्होंने इतिहास के ब्रिटिश संस्करण को सहर्ष स्वीकार कर लिया व एक-दूसरे के धार्मिक समुदायों को बदनाम करने व उनके विरुद्ध घृणा फैलाने के लिए हर संभव प्रयास किए. दूसरे से घृणा करो,  के इसी अभियान ने, भारत के विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की नींव डाली. भारत का विभाजन, फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश नीति की सफलता का प्रतीक था और इस सफलता में सांप्रदायिक संगठनों का महत्वपूर्ण योगदान था. आज, भारत में विघटनकारी राजनीति को एक बार फिर हवा दी जा रही है, ताकि रोटी, कपड़ा और मकान के मूलभूत मुद्दों को हाशिए पर पटका जा सके और आम आदमी के सम्मान व गरिमा से जीवन बिताने के अधिकार का दमन किया जा सके.

पुरातन प्रतीकों की पुन:स्थापना करने का संघ प्रमुख का आह्वान ख़तरों का घर है. सवाल यह है कि हम कितने पीछे जाएंगे? हम कितने सौ या कितने हज़ार साल पुराने प्रतीकों को पुन:स्थापित करेंगे? कुछ लोग उस युग में वापस जाना चाहेंगे, जब हिंदुओं द्वारा बौद्ध विहारों को नष्ट किया जा रहा था. क्या हम उस दौर में वापस जाएंगे, जब आर्य भारत में आए और उन्होंने स्थानीय निवासियों व आदिवासियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया?

हम भारतवासियों ने 15 अगस्त 1947 को एक नए युग की शुरुआत माना था. हमने तय किया था कि इस दिन से हम कल की बातें छोड़ कर, नए दौर में मिलकर नई कहानी लिखेंगे.

आरएसएस, उसकी विचारधारा और उसकी मांगें व आह्वान, भारतीय राष्ट्रवाद से कतई मेल नहीं खाते. अगर हमें उस भारत को संरक्षित रखना है, जिसका जन्म हमारे स्वाधीनता आंदोलन की कोख से हुआ था और जिसे हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने गढ़ा था, तो हमें संघ की व उसके जैसी विचाराधाराओं का प्राणप्रण से विरोध करना होगा.

अयोध्या निर्णय को भारतीय क़ानून की कसौटी पर कसा जाना आवश्यक है. आरएसएस का लोगों को बांटने का एजेंडा, किसी विवाद को सुलझाने, किसी समस्या का हल निकालने का आधार नहीं हो सकता. जो लोग सांप्रदायिक सौहार्द के पक्षधर हैं, जो भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं, जो मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं, उन सब लोगों का यह पावन कर्तव्य है कि वे आगे आएं और भारतीय राष्ट्रवाद की सही अवधारणा के बारे में जनजागृति फैलाएं, धार्मिक समुदायों के बीच सेतु बनें और मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए देश को औद्योगिकरण और शिक्षा के प्रसार के रास्ते प्रगति पथ पर आगे बढ़ाने का यत्न करें. मंदिरों और मस्जिदों को, वे जैसी और जहां हैं, वैसी व वहीं छोड़ दिया जाना चाहिए.

(लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे, और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं.)

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One thought on “संघ, अयोध्या निर्णय व भारतीय राष्ट्रवाद

  • January 8, 2011 at 7:47 AM
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    सन 1949 में 23 दिसंबर की रात को, हिंदू राष्ट्रवाद से प्रेरित, अज्ञात व्यक्तियों ने बाबरी मस्जिद ढांचे में प्रवेश कर, वहां रामलला की मूर्तियां रख दीं.

    सन 1980 के दशक में, आडवाणी व उनके साथियों ने इस मुद्दे का दामन थाम लिया

    1992 में ढांचे को ढहा दिया गया.

    क्या मंदिर को जैसा और जहां हैं, वैसा व वहीं छोड़ दिया जाना चाहिए ?

    आज के परिवेश में क्या इस मामले में सभी कुछ सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ देने से काम चलेगा और इस तरह हिन्दू-मुस्लिम विवाद रहते भारत आगे बढ़ पायेगा ?

    – अनिल सहगल –

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