जब तक चौथी दुनिया का यह अंक आपके हाथ में पहुंचेगा, मायावती का हैप्पी बर्थ डे मनाया जा चुका होगा और तब तक उत्तर प्रदेश में रिकार्ड तोड़ सर्दी सैकड़ों लोगों का जीवन भी लील चुकी होगी. ऊंचे महलों में बड़ों का जश्न और फुटपाथ पर मातम. मौत का आंकड़ा अब तक साढ़े तीन सौ की संख्या पार कर चुका है. यह सिलसिला दिसंबर के दूसरे पखवाड़े से शुरू हो गया था. दूर क्यों जाएं, राजधानी लखनऊ की बात करें और उससे अंदाज़ा लगाएं कि सूबे के दूसरे बड़े शहरों में फुटपाथ की ज़िंदगी जी रहे लोगों को सर्दी का निवाला बनने से बचाने के लिए सर्वजन सुखाय, बहुजन हिताय का नारा लगाने वाली राज्य सरकार कितनी और किस तरह मुस्तैद रही होगी. जैसे यह सालाना रिवाज़ बन गया है कि ठंड कहर बरपा करती है, शोर मचता है और तब कहीं जाकर बेघरों के लिए अस्थायी रैन बसेरों और अलाव का बंदोबस्त किए जाने का आदेश जारी होता है. और जिस तरह उस पर अमल होता है, वह महज़ रस्म अदायगी होता है, लूट का एक और मौक़ा हो जाता है. इस बार भी यही हुआ. दिसंबर आते-आते सर्दी का मौसम ग़रीबों और ख़ासकर बेघरों को डराने-धमकाने लगा था, लेकिन रैन बसेरों और अलाव का इंतज़ाम किए जाने का ज़िला प्रशासन का आदेश साल के आख़िरी दिन जारी हो सका. ग़ौर कीजिए कि लखनऊ में इस सर्दी का वह सबसे ठंडा दिन था, जब रात का तापमान लुढ़क कर 1.5 डिग्री सेल्सियस हो गया था. यह बेघरों के लिए नए साल की ज़ालिमाना शुरुआत थी.
पतली चादर से बनाई गई चाहरदीवारी की यह सुविधा भी तो बस लिफ़ाफ़ा होती है, जो बदन चीरती ठंड से मामूली बचाव भी नहीं कर पाती. रही बात अलाव की तो लकड़ियां भी कम और वह भी गीली. कुल मिलाकर हालत यह रही कि रैन बसेरे अमूमन वीरान बने रहे और वहां आवारा कुत्तों और छुट्टा जानवरों ने डेरा डाल दिया.
सरकार बहादुरों की मेहरबानी से आलम यह है कि जनहित में जारी किए गए तमाम आदेश या तो काग़ज़ी दौड़भाग में उलझ कर ठहर जाते हैं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. दिसंबर 2009 में देश की राजधानी में हुई बेघरों की मौत की ख़बरों के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया था कि लोगों को मौत से बचाने के लिए फ़ौरन ज़रूरी क़दम उठाए जाएं. इस आदेश पर बस कहने भर को अमल हुआ. 2010 शुरू हुआ कि पीयूसीएल ने देश की सबसे बड़ी अदालत में गुहार लगाई. इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने 27 जनवरी को दिल्ली सरकार समेत सभी राज्य सरकारों को दिशानिर्देश जारी किया कि दिसंबर 2010 तक स्थायी रैन बसेरे बना लिए जाएं, जिनमें पीने के साफ़ पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सस्ते दरों पर राशन एवं सुरक्षा आदि की भी व्यवस्था हो. उत्तर प्रदेश सरकार ने मई 2010 में अदालत में अपना जवाब दाख़िल किया कि सूबे के पांच बड़े शहरों मेरठ, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा और बनारस में आठ स्थायी रैन बसेरे चल रहे हैं, लेकिन यह नहीं दर्ज़ किया गया कि वे किस जगह पर हैं और किस हाल में हैं. मसलन इलाहाबाद में संगम के किनारे बाक़ायदा रैन बसेरा है, लेकिन उस पर हमेशा साधुओं का क़ब्ज़ा बना रहता है. बताया गया कि तीन महानगरों में एक-एक स्थायी रैन बसेरा बनाए जाने का फैसला हो चुका है. ज़मीन और धन की व्यवस्था होते ही उसे पूरा कर दिया जाएगा. लेकिन जिन्हें स्थायी रैन बसेरों के तौर पर पेश किया गया, वे तो असल में सामुदायिक केंद्र हैं और सभी जानते हैं कि उनका उपयोग सामुदायिक गतिविधियों के लिए नहीं, भाड़े पर उठाने के लिए किया जाता है. लखनऊ में नगर निगम के कम से कम 20 स्थायी रैन बसेरे हैं, लेकिन उनका ज़िक्र सरकारी जवाब से नदारद है.
हो भी तो कैसे. एक को छोड़ कर बाक़ी रैन बसेरे या तो शादी और माल बेचने की प्रदर्शनियों के लिए बुक हो जाते हैं या फ़िर उन पर अवैध क़ब्ज़े हैं. हद तो यह कि बीच शहर में बना एक रैन बसेरा अब रैन बसेरा कांप्लेक्स के नाम से जाना जाता है और फ़िलहाल दुकानों-गोदामों के काम आता है. दूसरा रैन बसेरा बड़े लोगों के रिहायशी इलाक़े के बीच है और उसके बड़े हिस्से को सामुदायिक केंद्र का नाम दिया जा चुका है. इस बेहतरीन परिसर के बाहर लगा आवश्यक सूचना का बोर्ड ही ख़ुलासा करता है कि यह जगह बेघरों की कोई पनाहगाह नहीं है. यह सूचना रैन बसेरे के सम्मानित ग्राहकों के लिए है, उसके लाभार्थियों के लिए नहीं. वैसे शादी-ब्याह के इस मौसम में यह रैन बसेरा मार्च तक बुक है. तारीफ़ की जानी चाहिए कि जब सरकारी अमला सो रहा था, विज्ञान फाउंडेशन नामक सामाजिक संगठन जाग रहा था. 23 दिसंबर से उसके कार्यकर्ता टोलियों में बंटकर कड़ाके की सर्दी में देर रात तक शहर की गश्त पर निकले. 14 जनवरी तक चले इस अभियान में कोई 18 हज़ार बेघरों की गिनती निकली और उनके छह सौ बड़े ठिकाने मिले, जहां उनकी रात ओस बरसाते आसमान के नीचे या बंद दुकानों के बाहर खुले गलियारों में गुज़रती है. कोई 31 लाख की आबादी वाले शहर में इकलौता रैन बसेरा पूरे साल चालू रहता है. इसलिए कि उसका संचालन विज्ञान फाउंडेशन के हाथ में है.
जनवरी शुरू हुई, तब ज़िला प्रशासन ने अलाव समेत कोई 30 अस्थायी रैन बसेरों का इंतज़ाम किया. इनमें से आठ रैन बसेरों की चलाने की ज़िम्मेदारी संगठन ने ली और साथ ही बाक़ी रैन बसेरों का जायज़ा भी लिया. पता चला कि रैन बसेरों के इर्द-गिर्द बसेरा डालने वालों को इसकी ख़बर नहीं और अगर ख़बर है भी तो वे उसका इस्तेमाल करने से कतराते हैं. अव्वल तो उन्हें यक़ीन नहीं होता कि यह सुविधा वाक़ई उनके लिए है. दूसरी बात यह कि चार दिन की चांदनी के चक्कर में वे मुश्किल से बनाई गई अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहते. उस पर किसी दूसरे बेघर के काबिज़ हो जाने का ख़तरा बना रहता है. उन्हें अपने से ज़्यादा अपने रिक्शे या ठेलिया की हिफ़ाज़त की चिंता भी होती है. और चार दिन की चांदनी भी कैसी? पतली चादर से बनाई गई चाहरदीवारी की यह सुविधा भी तो बस लिफ़ाफ़ा होती है, जो बदन चीरती ठंड से मामूली बचाव भी नहीं कर पाती. रही बात अलाव की तो लकड़ियां भी कम और वह भी गीली. कुल मिलाकर हालत यह रही कि रैन बसेरे अमूमन वीरान बने रहे और वहां आवारा कुत्तों और छुट्टा जानवरों ने डेरा डाल दिया. इसके ठीक उलट सीमित संसाधनों में विज्ञान फाउंडेशन द्वारा संचालित रैन बसेरे बेघरों से भरे रहे. तिरपाल के तंबू लगे, मोटी दरियों और कंबलों के अलावा पर्याप्त मात्रा में सूखी लकड़ियों का नियमित बंदोबस्त हुआ. हर रैन बसेरे पर उसका केयर टेकर तैनात रहा. इसके अलावा बेहद ज़रूरतमंदों के बीच घर-घर से जुटाए गए गर्म कपड़े भी बांटे गए.
इस मुहिम की कमान संजय विजयवर्गीय ने संभाली, जो खेती की बिगड़ती सेहत से लेकर भूख, ग़रीबी और पलायन जैसे सवालों की रोशनी में सरकारी नीतियों की चीरफाड़ करने के लिए जाने जाते हैं. वह कहते हैं कि अस्थायी रैन बसेरे बेघरों की समस्या का हल नहीं हो सकते. 95 फ़ीसदी बेघर मेहनतकश हैं, फ़क़ीर या निराश्रित नहीं. वे अपनी मेहनत का सौदा करते हैं, गरिमा का नहीं. सोचना चाहिए कि उन्हें सिर पर छत की ज़रूरत केवल सर्दियों में ही नहीं, गर्मी और बरसात में भी होती है. बेघरी से उन्हें सही मायने में तभी निज़ात मिल सकती है, जब ज़रूरी सहूलियतों के साथ स्थायी रैन बसेरे उनके सामने हों और पूरे साल के लिए हों. ऐसा न होना गरिमा के साथ उनके जीने के अधिकार की गारंटी के साथ बेहूदा मज़ाक़ है, कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के साथ खुली धोखाधड़ी है. विज्ञान फाउंडेशन की इस मुहिम में एक हफ़्ते के लिए मैं भी हमसफ़र रहा. इस दौरान जो देखा और समझा, उसके हवाले से यही सवाल उभरा कि भाईचारे की तहज़ीब और इंसानी रवायतों की उम्दा मिसाल रहा यह शहर क्या सचमुच इतना ज़ालिम भी हो सकता है. महसूस किया कि क़ुदरत की बेरहम ठंडी मार जिन मुफ़लिसों की आंख से नींद चुरा लेती है, उनके लिए ऐसी रात काटना किस तरह कयामत से गुज़रना होता है. पूरी रात करवटें बदलते रहने और बदन सिकोड़ कर ठंड को चकमा देने की फिज़ूल कवायद के नाम हो जाती है. गहराते कोहरे के दौरान कैमरे में क़ैद किए गए इस मंज़र की तसवीरें जैसे पूछती हैं कि यह गठरी है या कोई लेटा है.
यह इस दौर की उलटबांसी है कि शहरी बेघर शहरों के लिए जितने ज़रूरी हैं, उतने ही बड़े बोझ भी. जिस रफ़्तार से शहर फैल रहे हैं, उसी अनुपात में लाज़िमी तौर पर शहरी बेघरों की फ़ौज़ में भी इज़ाफ़ा होता जा रहा है. जिस शहर को गढ़ने-संवारने में उनका पसीना लगता है, उसी शहर में उनके साथ बेगानों जैसा सलूक होता है. शहर के दिलकश नज़ारों के बीच वे बदनुमा दाग़ मान लिए जाते हैं. इसमें बहस की गुंजाइश नहीं कि शहरी बेघर अपनी मर्ज़ी से शहरों का रुख़ नहीं करते. भूख, अभाव और ग़रीबी की मार उन्हें गांवों से उठाकर शहर ले आती है और उन्हें ग़रीबों की सबसे निचली कतार में खड़ा कर देती है. अलाव की आंच से अपने बदन को गर्म करते कई बेघरों से मैंने बात की. सबकी कहानी लगभग एक जैसी है. उनमें से ज़्यादातर भूमिहीन हैं. ज़मीन है तो उपज से पूरे परिवार का पेट भरना मुश्किल होता है. खेती घाटे के सौदे में बदलती जा रही है. ऊपर से मशीनों पर बढ़ती निर्भरता खेतिहर मज़दूरों को हाशिए पर पहुंचाने का काम कर रही है. मनरेगा काम के अधिकार का सरकारी झुनझुना है और वह भी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के हवाले है. कइयों के पास जॉब कार्ड नहीं, जॉब कार्ड है तो काम नहीं और काम है तो उसका सही समय पर भुगतान नहीं. परिवार के पास खाने का जुगाड़ नहीं तो भी बीपीएल या अंत्योदय कार्ड नहीं. परिवार को जैसे-तैसे जिंदा रखना है, इसलिए 60-70 साल के बूढ़े भी काम की तलाश में भटकते हैं और मज़दूरों की मंडी में सस्ते में बिकते हैं. मज़दूरी का दाम मज़दूर की उम्र और सेहत से भी तय होता है. यहां भी काम कम है और उम्मीदवार ज़्यादा. माह में बमुश्किल 20 दिन काम मिल पाता है. लखनऊ कभी बागों का शहर हुआ करता था. आज पार्कों, मूर्तियों और स्मारकों के नाम हो चुका है और जिस पर करोड़ों करोड़ रुपये बहा देने में सामाजिक न्याय का ढोल पीटने वाली सरकार को तनिक शर्म नहीं आई. हज़रतगंज का इलाक़ा शहर का दिल है. देखते-देखते उसकी सूरत बदल दी गई. फ़िज़ूलख़र्ची के खाते में बड़े शान के साथ विक्टोरियन लैंपपोस्ट भी शामिल कर दिए गए और जो इतने कमज़ोर निकले कि उनमें से एक किसी गाड़ी के छू भर जाने से ऐसे धड़ाम हुआ कि किसी बदक़िस्मत ग़रीब की मौत का वारंट बन गया. मशहूर मर्सियागो मीर अनीस साहब ख़ालिस लखनवी थे. लेकिन न जाने किस दु:ख और सदमे में डूबकर उन्होंने यह शेर भी कहा कि कूफे से नज़र आते हैं किसी शहर के आदाब/डरता हूं कि वो कहीं लखनऊ न हो. (कहा जाता है कि कूफे में पैगंबर मोहम्मद साहब के ख़िलाफ़ साज़िश रची गई थी और जिसने कर्बला को शहादतों का मैदान बना डाला) लगा कि गोया यह गुमनाम शेर आम फ़हम हो गया और चीख़ने लगा. काश कि इस शेर की चीख़ दूर तलक पहुंचे और गदर का शोर बन जाए, हुक्मरानों को गहरी नींद से जगाने का सबब बन जाए. बयान बहादुरों को तगड़ा झटका दे जाए. इतिहास का नया अध्याय खोल जाए.
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