तुम जिओ हजारों सालः सुरक्षित हिमालय की मुहिम में स‍क्रिय हैं सुंदरलाल बहुगुणा

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भारत के प्रख्यात पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा इन दिनों सुरक्षित हिमालय के मुहिम में दिन-रात सक्रिय हैं, अपने पच्चासीवें जन्म दिन पर 85 वृक्षों का रोपण कर बहुगुणा जी ने दून स्थित हेस्को ग्राम परिसर में स्कूली बच्चों के मध्य दिए अपने संदेश में कहा कि हरियाली सबसे अच्छी संपन्नता है, इस अवसर पर दून की विभिन्न संस्थाओं के बच्चों ने पर्यावरण विद् बहुगुणा जी को अपनी शुभ कामना देते हुए एक स्वर से कहा तुम जिओ हज़ारों साल…

बहुगुणाजी ने कहा कि उनके जीवन का एक ही ध्येय रहा, हरियाली की रक्षा. सही अर्थों में हरियाली ही धरती के जीवन का आधार है. स्वच्छ हवा और पानी के साथ इससे हमें अपने भोजन के भी उत्पाद मिलते हैं. उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों की अर्थव्यवस्था तो पूरी तरह से वनों पर ही निर्भर है, चाहे चारा-पानी हो अथवा जड़ी-बूटियां सभी हिमालय के उपहार हैं.

इस अवसर पर बहुगुणा जी को जन्मदिन की शुभ कामना देने वालों का तांता लगा रहा. स्वतंत्र भारत में हिमालयी राज्यों के गांधी के रूप में विख्यात बहुगुणा जी का जीवन इस देश के पर्यावरण को समर्पित रहा है. 84 बसंत देखने वाले इस गांधीवादी समाजसेवी के मन में हरा-भरा एवं सुरक्षित हिमालय से युक्त भारत देखने की कसक थी, है और आगे भी बनी रहेगी. बहुगुणा जी इन दिनों हिमालय और गंगा की रक्षा को लेकर खासे चिंतित नज़र आ रहे हैं. उनकी इन दिनों निकलने वाली हर सांस इस देश की जनता से पर्यावरण को बचाने के लिए अपील कर रही है. उनकी सक्रियता और उनके आंखों की चमक बस यही संदेश दे रही है कि हम थके नहीं हैं, हम हारने वाले सेनानी नहीं हैं, हम मानवता की रक्षा के लिए हिमालय को बचाने की अपनी मुहिम को लगातार गति देंगे. इस अवसर पर सुंदरलाल बहुगुणा जी ने एक साक्षात्कार के दौरान जो क्षण व्यतीत किया वे यादगार बन गए. इस मुलाक़ात के साथ ही बहुगुणा जी ने हिमालय, गंगा को बचाने की जो आकांक्षा व्यक्त की इससे मानवता के प्रति उनका प्रेम छलक कर सतह पर आ गया. इस अवसर पर बहुगुणा ने कहा कि उनके जीवन का एक ही ध्येय रहा हरियाली की रक्षा. सही अर्थों में हरियाली ही धरती के जीवन का आधार है. स्वच्छ हवा और पानी के साथ इससे हमें अपने भोजन के भी उत्पाद मिलते हैं. उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों की अर्थव्यवस्था तो पूरी तरह से वनों पर ही निर्भर है, चाहे चारा-पानी हो अथवा जड़ी-बूटियां सभी हिमालय के उपकार है.

इस अवसर पर बात करते हुए मानवीय बेरुखी से हिमालय पर बढ़ रही आफत से उनका मन भर आया, उन्होंने देश के बच्चों को पर्यावरण के संरक्षण का पाठ पढ़ाए जाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. हिमालय को उन्होंने भारत का प्रहरी बताने के साथ विश्व मानवता की धरोहर बताते हुए कहा कि विकास की अंधी भूख से हमें अपने पर्यावरण, गंगा एवं हिमालय को क्षति पहुंचाने से बाज़ आना चाहिए. स्थानीय गढ़वाली भाषा के ममर्ज्ञ बहुगुणा जी का हिंदी अग्रेंजी गुरूमुखी और उर्दू का ज्ञान है, उर्दू के ज्ञान के बारे में वे बताते है कि जंग-ए-आज़ादी के दौरान लाहौर में प्रवास के दौरान उन्हें उर्दू गुरूमुखी का ज्ञान हुआ. पानी बचाओं के प्रति उन दिनों उनकी चेतना जागृत हुई. इसी कारण उन्होंने अब अधिक पानी से उपजने वाले चावल से बने भात को अपने खाने से बाहर कर दिया है. वर्षों तक जंगल, लकड़ी बचाने के मुहिम के तहत लकड़ी से पका खाना छोड़ कर कई वर्षों तक पका खाना का बहिश्कार करने के बाद इन दिनों अपने प्रिय भोजन भात को छोड़ कर उन्होंने जल के महत्व एवं संरक्षण का संदेश दिया है. मानवता को समर्पित इस महामानव ने अपने अंग के नेत्र सहित कई अंगों को पहले ही दान कर दिया है. इन दिनों जल, हिमालय एवं गंगा को बचाने की उनकी चिंता ने उत्तराखंड की जनता को एक संदेश दिया है, आज भी वे एक स्मार्ट सजग प्रहरी की तरह मानवता के रक्षक की भूमिका निभाने को आतुर है, उनकी मुलाक़ात ने हमें झकझोर कर रख दिया, एक गांधी के अभी होने का एहसास हुआ.

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