उक्रांद अध्यक्ष पंवार पर निशंक सरकार की पहली गाज गिरी

कल तक सूबे की भारतीय जनता पार्टी से गलबहिया कर सरकार होने का मजा लूटने वाले उत्तराखंड के एक मात्र क्षेत्रिय दल उत्तराखंड क्रांति दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार पर सूबे की निशंक सरकार से समर्थन वापसी की पहली गाज दून के अफसरों ने ही गिरा दी. अपने कार्यकर्ताओं के दबाव का बहाना बना कर पंवार ने सूबे की निशंक सरकार से एक पखवारा पहले ही समर्थन वापस ले लिया था. इस समर्थन वापसी की चिट्ठी राज्यपाल को सौंपने के बाद ही उक्रांद का अंदरूनी कलह सतह पर आ गया था.

इस कार्यवाही को अमली जामा पहनाने वाले राजस्व विभाग के अफसरों ने पंवार की बेटी के नाम रजिस्ट्री से प्राप्त की गई. ज़मीन को सूबे के मुखिया को खुश करने के लिए ग्राम सभा को तो वापस कर दी, इस भूमि को धोखधड़ी कर के बिक्रय करने वालों के विरूद्ध अब तक कोई क्रिमिनल एक्ट के तहत कार्यवाही न हो पाना सरकार कीनीयत साफ करता है.

उक्रांद के कोटे से मंत्री दिवाकर भट्‌ट ने अपने दल के अनुशासन को धता बता कर सरकार से हटने से मना कर दिया था. इस घटना के बाद सूबे के मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने पवार को बुलाकर समझाने के साथ उन्हे आइना भी दिखाया था. सूबे की सरकार चुनाव के बाद उक्रांद के सहयोग से ही सत्ता में आई थी. निशंक ने मुख्यमंत्री बनते ही अपने राजनैतिक कौशल से अपनी सरकार को उक्रांद की बैसाखी से निजात दिलाते हुए उक्रांद का समर्थन जारी रखा था. उत्तराखंड में 2012 में विधानसभा चुनाव होना है. उक्रांद के सभी नेता तीन वर्ष से अधिक समय तक सरकार का मजा लूटते रहे. स्थानीय बोली और राजधानी का बहाना बना कर उक्रांद अध्यक्ष ने एकाएक सरकार से अपने समर्थन वापसी का जो नाटक रचा इससे मुख्यमंत्री की राजनैतिक कौशल के चलते क्षेत्रिय दल में दो फांक की स्थिति बनी. उक्रांद के दिग्गज नेता भट्‌ट ने सत्ता से अपना मोह न भंग कर के जिस तरह निशंक मोह का उदाहरण प्रस्तुत किया उससे पवार परिवार पर आफत आ गई. निशंक सरकार ने उन्हीं के कोटे से राजस्व मंत्री भट्‌ट के विभाग के अफसरों को आगे करके जिस तरह पवार की बेटी के नाम खरीदी गई चार बीघा ज़मीन जो मियावाला में स्थित थी, इसे असामी पट्‌टे की ज़मीन बता कर प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में क़ब्ज़ा कर पवार को बेदखल कर दिया. पवार परिवार का कथन है कि पहले यह ज़मीन शत्रुघ्न, जगदेव, मंगल आदि से क्रय किया था. इस ज़मीन की नवैयत प्रशासन बताता है कि असामी पट्‌टे की थी और इस पर कार्यवाही कर ग्रामसभा को वापस कर दी गई थी. पवार के रजिस्ट्री को रजिस्ट्रार तकनीकी तौर पर सही मानते हैं, फिर तथ्यों को छिपाने की बात कहते हैं. इस सरकारी कार्यवाही ने जिस तरह के सवाल पैदा कर दिए हैं कि सरकार भी बगले झांकती नज़र आ रही है. इस कार्यवाही को अमली जामा पहनाने वाले राजस्व विभाग के अफसरों ने पवार के बेटी के नाम रजिस्ट्री से प्राप्त की गई ज़मीन को सूबे के मुखिया को खुश करने के लिए ग्राम सभा को तो वापस कर दी. इस भूमि को धोखाधड़ी कर के बिक्रय करने वालों के विरुद्ध अब तक कोई क्रिमिनल एक्ट के तहत कार्यवाही न हो पाना सरकार की नीयत बताता है. राज्य में कितने लोगों को आसामी पट्‌टे दिए गए हैं, कितनों ने ग्रामसभा की ज़मीन का सरकार की मंशा के विपरीत कार्यवाही की, इस तरह के कई सवाल यक्ष प्रश्न की तरह अनुत्तरित है.

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