बिन लादेन और असीमानंद एक ही थैली के चट्टे-बट्टे

साधारण अपराधों की तुलना में आतंकी अपराधों की जांच कहीं अधिक कठिन होती है. इनमें बम फेंकने या गोली चलाने वालों के असली नियंत्रक रहस्य के आवरण में लिपटे रहते हैं और उन तक पहुंचना आसान नहीं होता. समस्या को और बढ़ाती है जांचकर्ताओं की मानसिकता, सोच एवं पूर्वाग्रह. हमारे देश में हुए अधिकांश आतंकी हमलों के लिए जेहादी आतंकवाद को दोषी ठहराया जाता रहा है और पुलिस एवं जांच एजेंसियां यह मानकर चलती रही हैं कि स़िर्फ और स़िर्फ जेहादी मुसलमान ही आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार हैं. हर आतंकी हमले का दोष सीमा पार के किसी न किसी मुस्लिम संगठन पर मढ़ दिया जाता था. सीमा पार आतंकवाद जांचकर्ताओं का प्रिय शब्द बन गया था. कथित सीमा पार आतंकियों के स्थानीय संपर्क सूत्र होने के आरोप में मुसलमान युवकों को पकड़ा जाता, उन्हें शारीरिक यंत्रणा देकर उनसे जबरन इक़बालिया बयान दिलवाए जाते और हर मामला सुलझा लिया जाता. पिछले कई वर्षों से यह एक सिलसिला सा बन गया था.

संघ को प्रतिबंधित करने की मांग बेमानी है. पहले भी संघ पर तीन बार प्रतिबंध लग चुका है, महात्मा गांधी की हत्या के बाद, आपातकाल के दौरान और बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद. संगठनों पर प्रतिबंध लगाने से कुछ खास फायदा नहीं होता. असली इलाज है विचारधारात्मक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्तरों पर संघ से मुक़ाबला.

जब हमला मुस्लिम बहुल इलाक़ों में ऐसे समय-मौक़े पर होता था, जबकि वहां बड़ी संख्या में मुसलमान इकट्ठा हों, तब भी हमले के लिए मुसलमानों को ही ज़िम्मेदार बताया जाता. पुलिस तुरंत कुछ मुस्लिम युवकों को धर लेती और उनके ख़िला़फ सुबूत भी जुटा लेती थी. ग़ैर भाजपा शासित प्रदेशों एवं केंद्र की सरकारें भी इस तमाशे को चुपचाप देखती रहीं. जांच प्रक्रिया पर आरोपियों या सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जब भी आपत्ति उठाई, उन्हें दरकिनार कर दिया गया. जांच प्रक्रिया का पाखंड पहली बार तब उजागर हुआ, जब महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे ने मालेगांव धमाकों में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर एवं हिंदुत्व शिविर के कई सिपहसालारों का हाथ होने के पुख्ता सुबूत पेश किए. सभी आरोपी आरएसएस के किसी न किसी अनुसांगिक संगठन से जुड़े हुए थे, सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित थे और हर चीज को धर्म के चश्मे से देखते थे. करकरे द्वारा किए गए खुलासों यह हुआ कि पुलिस और राजनीतिक नेतृत्व अपनी जिद छोड़कर हिंदूवादी संगठनों को भी जांच के घेरे में लेने लगे. करकरे को धमकियां मिलने लगीं, उनकी जान ख़तरे में पड़ गई. अंतत: 26 नवंबर, 2008 को उनकी हत्या हो गई.

करकरे के प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि आतंकी हमलों की जांच सही दिशा में होने लगी. इंद्रेश कुमार जैसे आरएसएस नेता एवं विहिप के स्वामी असीमानंद जांच के घेरे में आ गए. असीमानंद ने गुजरात के डांग ज़िले में ईसाई विरोधी जनोन्माद भड़काया, जिससे वहां ईसाइयों के ख़िला़फ व्यापक हिंसा हुई. असीमानंद ने डांग में शबरी कुंभ का आयोजन किया. आदिवासियों को डरा-धमका कर उसमें भाग लेने पर मजबूर किया गया. इस कुंभ में आरएसएस एवं उसके सहयोगी संगठनों के नेताओं की उपस्थिति उल्लेखनीय रही. यह कुंभ संघ के अल्पसंख्यक विरोधी अभियान का हिस्सा था. असीमानंद एक बार फिर चर्चा में हैं. कारण है उनका इक़बालिया बयान, जिसमें उन्होंने आतंकी हमलों में अपनी एवं अपने साथियों की भागीदारी स्वीकार की. यह बयान उन्होंने 18 दिसंबर, 2010 को मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया. स्वामी के दिमाग़ में बदला लेने का विचार सबसे पहले 2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले के बाद आया. 2006 में वाराणसी के संकट मोचन मंदिर पर हमले के बाद इस विचार ने जोर पकड़ लिया. स्वामी ने कहा, हमने भरत भाई (भरत रीतेश्वर) के वलसाड स्थित निवास पर जून 2006 में बैठक की. इसमें हमने निश्चय किया कि मुसलमानों के पूजास्थलों पर विस्फोट किए जाएं. संदीप डांगे, भरत भाई, साध्वी प्रज्ञा, सुनील जोशी, लोकेश शर्मा, राम जी कालसांगरा एवं अमित बैठक में मौजूद थे. हमने तय किया कि मालेगांव, अजमेर दरगाह, मक्का मस्जिद और समझौता एक्सप्रेस में विस्फोट किए जाएं. जोशी ने इन सभी ठिकानों का सर्वेक्षण करने की ज़िम्मेदारी ली. स्वामी ने कहा कि हमलों की तैयारी के लिए बैठक की पहल उसने की थी. ज्ञातव्य है कि लोकेश शर्मा को पहले ही अजमेर दरगाह विस्फोट के सिलसिले में हिरासत में लिया जा चुका है.

पुलिस जांच से यह साबित हुआ कि कई हिंदुत्ववादी जैसे साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर (पूर्व अभाविप कार्यकर्ता), ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, पूर्व मेजर उपाध्याय (भाजपा पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ मुंबई का प्रमुख), स्वामी दयानंद पांडे (आरएसएस से जुड़ाव, अभिनव भारत की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका), इंद्रेश कुमार (आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य), सुनील जोशी (आरएसएस प्रचारक, बाद में अज्ञात हत्यारों के हाथों मारा गया), देवेंद्र गुप्ता (आरएसएस प्रचारक, अभिनव भारत से संबंध), रामचंद्र कालसांगरा एवं संदीप पांडे आदि कई आतंकी घटनाओं में शामिल थे. स्वामी असीमानंद की स्वीकारोक्तियों से कई बातें साफ हो गई हैं. पहली बात तो यह है कि नांदेड में संघ कार्यकर्ता राजकोंडवार के घर में हुए विस्फोट, जिसमें बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए थे, के समय से ही सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि हिंदुत्ववादियों का आतंकी घटनाओं में हाथ है. नांदेड मामले की जांच एक जनसमिति ने की थी और पुलिस की जांच एवं निष्कर्षों में कई कमियां पाई गई थीं. इसके बाद महाराष्ट्र के परभणी, जालना, बीड एवं अन्य स्थानों पर ऐसी ही घटनाएं हुईं. सामाजिक कार्यकर्ता लगातार अपने संदेहों की ओर सरकार और मीडिया का ध्यान आकर्षित करते रहे, परंतु उनकी किसी ने नहीं सुनी. पुलिस की सोच तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त थी ही, ग़ैर भाजपाई राज्य सरकारें एवं केंद्र सरकार भी इन विस्फोटों के बीच की समानताओं और पुलिस जांच की कमियों को अनदेखा करती रहीं.

मीडिया का बड़ा हिस्सा भी चुप्पी साधे रहा और आतंकी घटनाओं में हिंदुत्ववादियों की भूमिका को न के बराबर महत्व देता रहा. आतंकी घटनाओं में तथाकथित जेहादियों की भूमिका की ख़बरें तो मुखपृष्ठ पर बैनर शीर्षकों से छपती थीं. इसके विपरीत पुलिस के निष्कर्षों को चुनौती देने वाली ख़बरें, सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा की गईं जांचों के नतीजे आदि या तो छपते ही नहीं थे और यदि छपते भी थे तो अंदर के पृष्ठों पर छोटे-छोटे शीर्षकों से. इसी मानसिकता के चलते दर्जनों मुस्लिम नौजवानों को पुलिस के हाथों घोर शारीरिक यंत्रणा झेलनी पड़ी. कई की पढ़ाई छूट गई और कई के फलते-फूलते करियर बर्बाद हो गए. सामूहिक सामाजिक सोच यह बना दी गई कि सभी आतंकी मुसलमान होते हैं. आज भी बड़ी संख्या में मुस्लिम युवक ऐसे आतंकी हमलों के सिलसिले में सलाखों के पीछे हैं, जिन हमलों की ज़िम्मेदारी असीमानंद एंड कंपनी ने ले ली है. क्या सरकार पुलिस की ग़लत जांच प्रक्रिया के कारण इन युवकों के साथ हुए अन्याय और अत्याचार की भरपाई करेगी? यह मांग की जा रही है कि वे तुरंत रिहा हों और उन्हें मुआवज़ा भी मिले. सरकार को इन मांगों के संबंध में जल्दी से जल्दी निर्णय

लेना चाहिए.

एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आरएसएस के साथ क्या किया जाना चाहिए. संघ नफरत की राजनीति का मुख्य स्रोत है. आतंकी घटनाओं में लिप्त पाए गए अधिकांश हिंदुत्ववादियों का संघ से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध था. संघ आसानी से इन लोगों से अपना कोई भी नाता होने से इंकार कर सकता है और वह ऐसा करेगा भी. संघ अपने अनुसांगिक संगठनों की गतिविधियों के लिए क़ानूनन ज़िम्मेदार नहीं है, क्योंकि काग़ज़ पर वे सभी स्वायत्त हैं. जो आरोपी संघ से सीधे संबद्ध थे, उन्हें निष्कासित कर दिया गया है और संघ ने उनसे अपना पल्ला झाड़ लिया है. संघ प्रमुख ने कहा है कि उनके संगठन में हिंसक गतिविधियां करने वालों के लिए कोई स्थान नहीं है. क़ानूनन संघ पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती. संघ का संगठनात्मक ढांचा इतना लचीला है कि वह सैकड़ों क़त्ल करा दे, तब भी उसके दामन पर ख़ून का एक धब्बा भी नज़र नहीं आएगा.

संघ को प्रतिबंधित करने की मांग बेमानी है. पहले भी संघ पर तीन बार प्रतिबंध लग चुका है, महात्मा गांधी की हत्या के बाद, आपातकाल के दौरान और बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद. संगठनों पर प्रतिबंध लगाने से कुछ खास फायदा नहीं होता. असली इलाज है विचारधारात्मक, सामाजिक एवं राजनीतिक स्तरों पर संघ से मुक़ाबला. यह एक कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है. संघ अपनी विचारधारा का सतत प्रचार-प्रसार करता रहा है. मीडिया से लेकर स्कूली पाठ्य पुस्तकों तक, सभी का उपयोग संघ अपनी विचारधारा के प्रसार के लिए करता रहा है. स्वामी असीमानंद, लक्ष्मणानंद एवं अन्य कथित संतों ने संघ की विचारधारा को धर्म का लबादा पहना दिया है. हर भारतीय नागरिक, जो प्रजातांत्रिक समाज और मानवाधिकारों का हामी है, उसे अपने समान विचार वाले अन्य लोगों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाकर धर्म आधारित राष्ट्रवाद का मुक़ाबला करना चाहिए. चाहे स्वामी असीमानंद हों या ओसामा बिन लादेन, दोनों धर्म की चाशनी में लिपटे आतंकवाद के पोषक हैं.

(लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक हैं)

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2 thoughts on “बिन लादेन और असीमानंद एक ही थैली के चट्टे-बट्टे

  • July 28, 2013 at 11:09 PM
    Permalink

    डॉ.राम्पुन्यानी साहब आपने जो अपने लेख में लिखा है वह १००% सही है, इन सब मुद्दों के बारे में तहलका ,आलमी सहारा , द हिन्दू , जैसे अखबार और पत्रिका में साफ़ हो चूका है , और आप जैसे निर्भीक पत्रकार की देश को काफी जरुरत है क्योकि सही मुद्दे जब तक सामने नहीं आएगा, देश कभी सही राह पे नहीं आ सकेगा ,

    Reply
  • February 17, 2011 at 6:23 AM
    Permalink

    ………. “संघ का संगठनात्मक ढांचा इतना लचीला है कि वह सैकड़ों क़त्ल करा दे, तब भी उसके दामन पर ख़ून का एक धब्बा भी नज़र नहीं आएगा “………. .

    ………. ” सभी आरोपी आरएसएस के किसी न किसी अनुसांगिक संगठन से जुड़े हुए थे, सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित थे और हर चीज को धर्म के चश्मे से देखते थे. करकरे द्वारा किए गए खुलासों यह हुआ कि पुलिस और राजनीतिक नेतृत्व अपनी जिद छोड़कर हिंदूवादी संगठनों को भी जांच के घेरे में लेने लगे. करकरे को धमकियां मिलने लगीं, उनकी जान ख़तरे में पड़ गई. उनकी जान ख़तरे में.पड़ गई. अंतत: 26 नवंबर, 2008 को उनकी हत्या हो गई.” ……….

    ………. आप पर आरोप ……….

    उपर लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक का लिखा है :

    क्या आप ऊपर का लिखा स्वीकार कर इसका प्रचार कर यह फैला रहें हैं कि हत्या RSS ने करवाई है, तो साफ़ साफ़ लिखो. सीधा आरोप लगाओ. चौथी दुनिया गोल गोल चक्कर छोड़ सीधा चलो, जो प्रचार करना हो करो
    Reply

    Reply
  • February 17, 2011 at 6:08 AM
    Permalink

    ………. ” सभी आरोपी आरएसएस के किसी न किसी अनुसांगिक संगठन से जुड़े हुए थे, सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित थे और हर चीज को धर्म के चश्मे से देखते थे. करकरे द्वारा किए गए खुलासों यह हुआ कि पुलिस और राजनीतिक नेतृत्व अपनी जिद छोड़कर हिंदूवादी संगठनों को भी जांच के घेरे में लेने लगे. करकरे को धमकियां मिलने लगीं, उनकी जान ख़तरे में पड़ गई. उनकी जान ख़तरे में.पड़ गई. अंतत: 26 नवंबर, 2008 को उनकी हत्या हो गई.” ……….

    धमकियां…..उनकी जान ख़तरे में पड़ गई. अंतत: 26 नवंबर, 2008 को उनकी हत्या हो गई ………..

    ………. आप पर आरोप ……….

    उपर लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक का लिखा है :
    क्या आप ऊपर का लिखा स्वीकार कर इसका प्रचार कर यह फैला रहें हैं कि हत्या RSS ने करवाई है, तो साफ़ साफ़ लिखो. सीधा आरोप लगाओ. चौथी दुनिया गोल गोल चक्कर छोड़ सीधा चलो, जो प्रचार करना हो करो

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