सीएनटी एक्ट को लेकर पिछले दिनों उठा विवाद फिलहाल थम गया है, लेकिन राख के नीचे चिंगारी दबी है. यह चिंगारी कभी भी भड़क सकती है. पिछले दिनों सीएनटी एक्ट के एक प्रावधान को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया था. इसकी वजह से अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में दरार नज़र आने लगी थी. मंत्रिमंडल में शामिल नेता परस्पर विरोधी बयान दे रहे थे. झामुमो अपने पुराने रंग में लौट आया था. हालांकि भूमि और राजस्व विभाग के सचिव संतोष कुमार ने विभागीय मंत्री, मुख्य सचिव या मुख्यमंत्री के अनुमोदन के बिना ही जो तुगलकी फरमान जारी किया था, वह अनुसूचित जाति और पिछड़ी जातियों की ज़मीन की खरीद बिक्री से संबंधित था, जिसका तत्काल असर यह पड़ा कि राज्य के सभी ज़िलों के निबंधन कार्यालयों में सन्नाटा छा गया. ज़मीन का निबंधन तक बंद हो गया था. बाद में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने सचिव के आदेश पर रोक लगा दी तो निबंधन का काम शुरू हुआ. सरकार के राजस्व में करोड़ों की क्षति के बावजूद हेमंत सोरेन ने सचिव के आदेश को कड़ाई से लागू करने की ज़रूरत पर बल दिया. इसके साथ ही कई संगठन इसे कड़ाई से लागू करने के पक्ष में बयानबाज़ी करने लगे. दूसरी तरफ रजिस्ट्री कार्यालय और व्यवसायी वर्ग के लोगों ने इस प्रावधान पर तत्काल रोक लगाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए. मालूम हो कि छोटानागपुर काश्तकारी अधीनियम की धारा 46 की उपधारा 1-बी में यह प्रावधान है कि अनुसूचित जाति और पिछड़ी जाति की ज़मीन उसी इलाके के उसी जाति के लोग खरीद सकते हैं, वह भी उपायुक्त की अनुमति के बाद. हालांकि बिहार सरकार ने 40 वर्ष पूर्व ही कोर्ट के आदेश से इस प्रतिबंध को हटा दिया था और झारखंड में राज्य गठन के बाद भी व्यवहारत: यह लागू नहीं था. यदि झारखंड में यह लागू हो जाए तो विकास का पहिया पूरी तरह थम जाएगा, क्योंकि तब कुछ ही ज़मीन ही खरीद बिक्री के योग्य बच जाएगी. इसके समर्थकों का कहना है कि इससे औद्योगिक विकास पर असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि उपायुक्त के आदेश से इनकी खरीद बिक्री हो सकेगी. जब यह प्रावधान लागू नहीं है तब तो उद्योगों के लिए ज़मीन मिलने में कठिनाई हो रही है. लागू होने के बाद कम से कम निवेशक तो झारखंड की ओर रु़ख करने से कन्नी काटेंगे.
एक नौकरशाह के हाथों बोतल से निकला हुआ यह जिन्न कितना उत्पात मचाएगा और झारखंड को किस दिशा की ओर ले जाएगा, कहना मुश्किल है. उल्लेखनीय है कि जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास योजना कीहज़ारों करोड़ की आवंटित राशि सीएनटी एक्ट और सीलिंग एक्ट के कारण नहीं उठायी जा पा रही थी. अब तीन प्रमुख शहरों से सीलिंग एक्ट हटाने के बाद कुछ उम्मीदें बंधी हैं लेकिन सीएनटी एक्ट का मामला अभी भी उलझा हुआ है. अर्जुन मुंडा का पूरा धन खरसावां उपचुनाव की ओर केंद्रित है.
झाविमो सुप्रीमो एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी इस मामले को समझते हैं, इसीलिए वह शुरू से ही सीएनटी एक्ट में संशोधन के पक्षधर रहे हैं. इस विवाद के खड़े होने के बाद भी उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस एक्ट की समीक्षा करने और इसमें समयानुकूल संशोधन करने का अनुरोध किया है. यह एक्ट जिस समय बना था, उस व़क्त तक ज़मीन के मालिकाना हक़ के दस्तावेजीकरण की कोई पद्धति नहीं थी. ताक़तवर लोग आदिवासियों की ज़मीन पर ज़बरन क़ब्ज़ा कर लेते थे. उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिये ही ब्रिटिश सरकार ने सीएनटी और एसपीएनटी एक्ट बनाया. विस्थापन के मामले भी ज्यादातर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में उलझे हैं. आज की तारी़ख में निजी क्षेत्र के उद्यमी या रियल स्टेट के व्यवसायी किसी भूखंड पर लाठी के बल पर क़ब्ज़ा नहीं कर सकते. आदिवासियों की ज़मीन पर तो ऐसा होने का सवाल ही नहीं उठता है. इसके उलट आदिवासी ही किसी भी भूखंड पर सरना का झंडा गाड़कर उस पर क़ब्ज़ा कर सकते हैं. इनके क़ब्ज़े को हटाने की किसी में ताक़त नहीं. इस एक्ट के कारण आज इनकी ज़मीन की कोई कीमत नहीं. सामान्य ज़मीन यदि एक लाख रुपये डिसमिल बिकेगी तो इनकी इसी लोकेशन की ज़मीन की कीमत 10 हज़ार भी नहीं मिलेगी. इस एक्ट के कारण वे ज़मीन मालिक होकर भी कंगाल हैं. ज़मीन से उन्हें कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती. प्राइम लोकेशन की ज़मीन का मालिक होकर भी वे इसमें सब्जी उगाने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकते. झारखंड को कश्मीर की तरह क़ानूनी बंदिशों से भरा राज्य बनाने की साज़िश इस राज्य को वापस कबीला युग की ओर ले जाएगी. हेमंत सोरेन जैसे नेता संभवत: यही चाहते हैं. यह प्रावधान राजनीतिक रंग लेता जा रहा है. झामुमो और अन्य झारखंड नामधारी दलों को यह आदिवासियों और सदानों के बीच एकता कायम कर अपने जनाधार में विकास का एक ज़रिया नज़र आ रहा है. पेसा एक्ट को लेकर उनके बीच दूरी बढ़ गई थी. इसीलिये सदानों के पेसा विरोधी आंदोलन के प्रबल विरोधी आदिवासी नेता अब इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कहीं ग़ैर आदिवासी सदानों की ज़मीनों की सुरक्षा के लिए सीएनटी एक्ट में मौजूद प्रावधान पर रोक न लग जाए. उन्हें भी सीएनटी समर्थक बनाकर अपने क़रीब लाया जाए. इससे एक नया समीकरण बनेगा जो उन्हें सत्ता में बने रहने में सहायक सिद्ध होगा. उन्हें राज्य की नहीं अपनी कुर्सी की चिंता है. दूसरी तरफ झारखंड के विकास के लिए चिंतित नेता इस बात को लेकर परेशान हैं कि कम से कम झारखंड के शहरी इलाकों को इन प्रावधानों से मुक्तकैसे कराया जाए. किसी भी शहर का विकास रियल स्टेट सेक्टर के विकास पर निर्भर करता है और यह सेक्टर पूरी तरह निजी क्षेत्र से संचालित होता है. निवेश को आकर्षित करने में इस सेक्टर की प्रमुख भूमिका होती है. यही कारण है कि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी झारखंड के विकास के दरवाजे बंद करने की जगह उसे यथासंभव खोल देना चाहते हैं. वे अपने वोट बैंक के लिए नहीं बल्कि झारखंड के विकास के लिए चिंतित दिखाई पड़ रहे हैं. हालांकि, एक नौकरशाह के हाथों बोतल से निकला हुआ यह जिन्न कितना उत्पात मचाएगा और झारखंड को किस दिशा की ओर ले जाएगा, कहना मुश्किल है. उल्लेखनीय है कि जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास योजना कीहज़ारों करोड़ की आवंटित राशि सीएनटी एक्ट और सीलिंग एक्ट के कारण नहीं उठायी जा पा रही थी. अब तीन प्रमुख शहरों से सीलिंग एक्ट हटाने के बाद कुछ उम्मीदें बंधी हैं लेकिन सीएनटी एक्ट का मामला अभी भी उलझा हुआ है. अर्जुन मुंडा का पूरा धन खरसावां उपचुनाव की ओर केंद्रित है. झामुमो भी अर्जुन मुंडा के विधायक बनने के बाद खाली होने वाले जमशेदपुर संसदीय क्षेत्र पर नज़र टिकाए हुए है. लेकिन लगता नहीं है कि यह विवाद इतनी जल्दी थमेगा.
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