गंगोत्री में ही गंगा मैली

हर धर्म की अपनी मान्यताएं-परंपराएं होती हैं. आस्था को विज्ञान की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु ऐसा भी नहीं कि उसमें कोई तर्क न हो. यदि धर्म न हो तो समाज में समरसता, भाईचारा और उल्लास देखने को न मिले. धर्म हमें अनुशासन सिखाता है और अधर्म के मार्ग पर चलने वाले को लगातार सजग करता है. हर धर्म की मान्यताएं अलग हैं, जो स्थान, समय एवं परिस्थितियों के अनुसार रहती हैं. तैंतीस करोड़ देवी- देवताओं की मान्यता वाले हिंदू धर्म में प्रकृति एवं परिवेश को सर्वोपरि और पूजनीय माना गया है. प्रकृति के वे तत्व जो जीने के लिए अपरिहार्य हैं, उन्हें हिंदू धर्म में देवी या देवता का स्थान प्राप्त है. इनमें जल का स्थान सर्वोपरि है और उसे विष्णु का स्थान प्राप्त है. नदियों को पूजनीय माना गया है और गंगा को मां का स्थान मिला है. हिंदू धर्म में यदि गंगा न हो तो कई मान्यताएं उलट हो जाएं. मुंडन से लेकर अंतिम संस्कार तक गंगा ही याद आती है, वहीं गंगा की पूजनीयता का वैज्ञानिक आधार भी है.

गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा कौन नहीं जानता. अपने पूर्वजों के तारण के लिए भगीरथ ने कई हज़ार साल तक तपस्या की थी. हालांकि इस कथा को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु हिमालय की चोटियों को शिव की जटाओं के रूप में माना जाता है. जहां पर वह ग्लेशियरों के रूप में विद्यमान है, वहां से उसका जल नियंत्रित रूप से प्रवाहित होता रहता है.

गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा कौन नहीं जानता. अपने पूर्वजों के तारण के लिए भगीरथ ने कई हज़ार साल तक तपस्या की थी. हालांकि इस कथा को वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता, किंतु हिमालय की चोटियों को शिव की जटाओं के रूप में माना जाता है. जहां पर वह ग्लेशियरों के रूप में विद्यमान है, वहां से उसका जल नियंत्रित रूप से प्रवाहित होता रहता है. गोमुख से उतरने पर गंगा का वेग बड़ा उग्र होता है, लेकिन जैसे-जैसे वह हिमालय की पहाड़ियों से नीचे उतरती है, उसका वेग मंद पड़ने लगता है. हिमालय से अनेक धाराएं निकलती हैं. गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक नदी की धारा जहां से भी गुजरती है, उन स्थानों की तीर्थ जैसी महिमा है. हिमालय को देवभूमि कहा जाता है, जहां गंगा के तट कई ॠषि-मुनियों की तपस्थली थे. उत्तराखंड में भागीरथी एवं अलकनंदा के किनारे बसे स्थलों को तीर्थ का स्थान हासिल है. कहा जाता है कि गंगोत्री में गंगा का मंदिर वह स्थान है, जहां राजा भगीरथ ने तपस्या की थी. इस मंदिर के दर्शनार्थ प्रति वर्ष लाखों लोग आते हैं. इससे आगे सबसे बड़ा नगर उत्तरकाशी पड़ता है, जो उत्तर की काशी कहा जाता है, जहां भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है. उत्तरकाशी से आगे गंगा टिहरी के डूबने तक गणेश प्रयाग में मिलती थी. बांध बनने के कारण गणेश प्रयाग का अस्तित्व अब नहीं रहा. टिहरी से आगे देव प्रयाग में उसका मिलन अपनी बड़ी बहन अलकनंदा से होता है, जो एक प्रमुख संगम है. यहां से आगे भागीरथी एवं अलकनंदा मिलकर गंगा कहलाती है. मान्यता है कि देव प्रयाग में भगवान श्रीराम ने ब्रह्म हत्या के प्रायश्चित हेतु तप किया था.

गंगा आज अपने उद्गम से मैली हो रही है. कई स्थानों पर यह इतनी प्रदूषित है कि इसका जल पीने योग्य नहीं रहा. शहरों की गंदगी गंगा में जाने से रोक पाने में कोई भी सरकार सफल नहीं हो सकी. गंगाजल यदि पवित्र है तो हमें भी उसे पवित्र रखना चाहिए. बड़ी संख्या में लोगों के हिमालय में आने से भी गंगा में कचरे एवं प्लास्टिक की भरमार हो रही है

यूं तो गंगा जहां से गुजरती है, वे सब स्थल तीर्थ समान हैं, किंतु गंगा को तीर्थत्व हरिद्वार में प्राप्त होता है. रावण वध के उपरांत श्रीराम ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति के लिए हरिद्वार आए और फिर गंगा में स्नान करके उन्होंने देव प्रयाग की ओर प्रस्थान किया. मान्यता है कि हरिद्वार, प्रयाग और गंगा सागर में स्नान मात्र से ब्रह्मलोक, विष्णुलोक एवं शिवलोक की प्राप्ति होती है. हरिद्वार के अधिष्ठाता देवता ब्रह्मा हैं, जहां हरि पादुकाएं हैं. हरिद्वार आदिकाल से महात्माओं, ॠषियों एवं साधकों की तपस्थली रहा है. जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर आदिनाथ ने भी गंगा के तट पर मायापुरी में तपस्या की. कालांतर में शंकराचार्य ने यहां आश्रमों की स्थापना की. हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, बिठूर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना एवं गंगा सागर के तटों पर हर प्रमुख पर्व पर लाखों हिंदू धर्मावलंबी स्नान हेतु आते हैं और पुण्य लाभ की कामना एवं एक नए विश्वास के साथ घर लौटते हैं. ॠग्वेद में गंगा की महिमा का विवरण त्रिपथगा यानी तीन पथों पर चलने वाली नदी के रूप में मिलता है. गंगा का उद्भव स्वर्ग से हुआ, जहां वह पहले प्रवाहमान थी. अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए भगीरथ इसे पृथ्वी पर लाए. इसका तीसरा पथ पाताल लोक में होगा. इसका यह मतलब निकाला जा सकता है कि अत्यधिक दोहन से यह समाप्त हो जाएगी.

भारत के लिए गंगा सिर्फ नदी नहीं, बल्कि एक दर्शन है. कुछ लोग गंगा को जीवनदायिनी मानते हैं तो कुछ मोक्षदायिनी. हरिद्वार एवं प्रयागराज में पर प्रति 12 साल में कुंभ होता है और 6 साल में अर्द्धकुंभ. चार माह तक चलने वाले इन मेलों के दौरान करोड़ों लोग जाति, संप्रदाय एवं पंथ भूलकर गंगा स्नान करते हैं. साधु-संत एवं उनके अखाड़े भी इस अवसर पर जुटते हैं. प्रयागराज अध्यात्म एवं ज्ञान की धाराओं का भी संगम है, जो मोक्ष का मार्ग दिखाता है. मान्यता है कि कुंभ के दौरान प्रयाग में कल्पवास करने से मनुष्य को जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है. गंगा आगे विंध्याचल से होते हुए बनारस पहुंचती है. यहीं श्मशान घाट पर भगवान ने राजपाट गंवा चुके राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा ली थी. मान्यता है कि बनारस में जीवन त्याग करने से व्यक्ति को स्वर्ग में स्थान मिलता है. इसीलिए हज़ारों लोग अपने उन बुज़ुर्गों को मृत्यु से पूर्व यहां ले आते हैं. यहां के मणिकर्णिका एवं हरिश्चंद्र घाट पर चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती. गंगाजल की अमृत जैसी महिमा है. गंगाजल को शास्त्रों में सोमरस की संज्ञा दी गई है. सोम मनुष्य के दीर्घजीवन के लिए एक औषधि है. इसी क्षेत्र में अनगिनत जड़ी-बूटियां उत्पन्न होती हैं.

गंगाजल को यदि अमृत समान माना गया है तो उसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं. गंगा की धारा हिमालय की धवल चोटियों से निकलती है. वहीं शिवालिक की पहाड़ियों से निकली लघु जलधाराएं इसके स्वरूप को विस्तारित करती हैं. जिस रास्ते से जलधाराएं गुजरती हैं, वहां के खनिज- लवण इसमें घुलते चले जाते हैं. गंगाजल में कई प्रकार के रोगों से मुक्ति प्रदान करने की क्षमता है. यह ऐसा रोगनाशक है, जो लंबे समय तक रखने के बाद भी ख़राब नहीं होता. गंगाजल की महिमा यह है कि हर पूजा- अनुष्ठान में इसे विघ्न-बाधा दूर करने के लिए चारों दिशाओं में छिड़का जाता है. उत्तराखंड आने वाले श्रद्धालु अपने साथ गंगाजल ले जाना नहीं भूलते. सम्राट अकबर भी गंगाजल के औषधीय गुणों को मानते थे, इसलिए उनके पीने का पानी हरिद्वार से ऊंटों द्वारा आगरा लाया जाता था. गंगा करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती है, इसका जल फसलों को जीवन देता है और यह असंख्य लोगों की आजीविका का माध्यम है. विश्व की विभिन्न सभ्यताएं किसी न किसी नदी के किनारे ही विकसित हुईं. भारत में भी हिमालय से लेकर गंगा सागर तक अनेक सभ्यताएं बसीं. कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं छायाकारों को गंगा के अनेक रूपों ने प्रभावित किया. वर्तमान में कलियुग का प्रथम सोपान चल रहा है और आस्था की प्रतीक गंगा अपवित्र होती जा रही है. यह आशंका अपने अवतरण से पहले गंगा ने राजा भगीरथ के सम्मुख रखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था, मैं एक और कारण से पृथ्वी पर नहीं जाना चाहती. मुझे लगता है, पृथ्वी के लोग तो मुझमें अपने पाप धो देंगे, लेकिन मैं उन पापों को कहां धोऊंगी? इस पर भगीरथ ने कहा था, हे माता, पृथ्वी पर इच्छा का त्याग करने वाले ब्रह्मनिष्ठ एवं पवित्र लोग भी रहते हैं, जिनमें भगवान का वास है और वे स्नान करके तुम्हारे पापों को भी दूर कर देंगे. लेकिन भगीरथ का वह कथन आज कलियुग में उलटा सिद्ध हो रहा है. भगीरथ जिस लोक कल्याण की भावना से गंगा को पृथ्वी पर लाए थे, अब वह भावना हमारे कर्णधारों में नहीं दिखती. गंगा पर जबसे भोगवादी दृष्टि पड़ी है, तबसे उसका रसातल की ओर जाने का द्वार मानो खुल गया है.

गंगा आज अपने उद्गम से मैली हो रही है. कई स्थानों पर यह इतनी प्रदूषित है कि इसका जल पीने योग्य नहीं रहा. शहरों की गंदगी गंगा में जाने से रोक पाने में कोई भी सरकार सफल नहीं हो सकी. गंंगाजल यदि पवित्र है तो हमें भी उसे पवित्र रखना चाहिए. बड़ी संख्या में लोगों के हिमालय में आने से भी गंगा में कचरे एवं प्लास्टिक की भरमार हो रही है. गंगा में पूजा के नाम पर जो कुछ भी डाला जाता है, उससे गंगाजल दूषित ही होता है. गंगा में फैक्ट्रियों का दूषित जल एवं कचरा जिस प्रकार मिलाया जा रहा है, उससे गंगा विषैले नाले में परिवर्तित हो चुकी है. अधजले शवों, कोयले, लकड़ी और राख आदि से गंगा कितनी प्रदूषित हो रही है, यह कन्नौज, कानपुर, वाराणसी एवं पटना में देखा जा सकता है. आगे अनेक नदियों के मिलने से जलराशि बढ़ जाती है, जिससे उतनी गंदगी नज़र नहीं आती. फरक्का के बाद गंगा का प्रवाह कम हो जाता है, इसकी एक धारा बांग्लादेश चली जाती है. यहां एक बार फिर यह भागीरथी कहलाने लगती है और आगे जाकर हुगली. कोलकाता जैसे महानगर से गुजरने के बाद भी काफी गंदगी इसमें मिलती है. गंगाजल जब तक शुद्ध है, तभी तक यह लाभप्रद है. वैदिककालीन लोग दूषित जल को व्याधियों का कारण मानते थे. उनका कहना था कि शुद्ध जल औषधि समान है, उसके सेवन और उससे स्नान करने से रोगों का नाश होता है.

वैदिक काल में दूषित जल के शमन के भी नियम थे. गड्‌ढे खोदकर उसे इस प्रकार दबा दिया जाता था, जिससे बीमारी न फैले. गंगा करोड़ों लोगों की प्यास बुझाती है. अमीर अब बोतलबंद पानी इस्तेमाल करने लगे हैं, लेकिन ग़रीब ऐसा नहीं कर सकता. सरकार की प्राथमिकता उद्योगों की स्थापना एवं बिजली उत्पादन है. इसलिए आज गंगा की पवित्रता के स्थान पर उसके दोहन की योजनाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है. गंगा की अमृत समान धारा को बिजली की धारा के रूप में देखा जा रहा है. गंगा के अधिक दोहन के परिणाम हम देख रहे हैं. हिमालय को छलनी करके गंगा एवं सहायक नदियों पर अनेक जल विद्युत परियोजनाएं इस प्रकार बन रही हैं कि उनकी कलकल बहती धारा सुरंगों-बांंधों में कैद होने को अभिशप्त हो जाएंगी. जहां कभी नदी बहा करती थी, आज वहां सूखी घाटियां नज़र आती हैं. उत्तर भारत की जीवन रेखा मानी जाने वाली गंगा पूरे भारत की सांस्कृतिक छवि का प्रतिबिंब है, एक दर्शन है, जिसकी धारा से मनुष्य के जीवन-मृत्यु के सवाल जुड़े हैं. गंगा का कलकल निनाद एवं निरंतरता उसकी पहचान है. आज जिस प्रकार उसके साथ छेड़छाड़ हो रही है, उससे उस आस्था का समाप्त होना लगभग तय है, जो हिंदू धर्म का एक प्रमुख आधार है.

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