केले की खेती ने किया मालामाल

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गत वर्ष दो एकड़ में केले की खेती की थी, इस बार तीन एकड़ में. बैंक से रिटायर्ड होने के बाद पूरी तरह से खेती की तऱफ ध्यान लगाया. पहले गन्ना की खेती करता था, जिसमें एक मुश्त रक़म मिल जाती थी. लेकिन रिटायर्ड होने के बाद बढ़ती महंगाई ने खर्च बढ़ा दिया. आसपास की जा रही केले की खेती में हाथ आजमाया और अब इसी में फायदा नजर आ रहा है. यह कहना है पड़रौना के इंद्रजीत मिश्रा का.

केले का सीजन जुलाई से नवंबर तक होता है जबकि बुवाई मानसून आते शुरू हो जाता है. एक एकड़ में 1620 पौधा लगाया जाता है, जिसमें 30 से 35 हज़ार तक खर्च आता है. यदि फसल अच्छी रही तो 50 से लेकर 100 रु. प्रति घौद की आमदनी होती है. यानी प्रति एकड़ 70 हज़ार से लेकर एक लाख रुपए की आमदनी हो जाती है.

कुछ इसी तरह का रूझान देवरिया, पड़रौना, कुशीनगर और आसपास के किसान दिखा रहे हैं. कभी यह क्षेत्र गन्ना के उत्पादन में अग्रणी था. आसपास चीनी मिलों की अच्छी तादाद से उन्हें गन्ने की फसल को बेचने में परेशानी नहीं होती थी. नगदी फसलों में गन्ने की खेती कर किसान पारिवारिक ज़रूरतों को पूरा कर लेते थे. एक के बाद एक बंद होती चीनी मिले और सरकारी नीति से तंग आकर किसानों का गन्ने की खेती से मोह भंग होने लगा है.

कभी दस से बाहर एकड़ में गन्ने बोने वाले किसान अब या तो गन्ने की खेती छोड़ ही चुके हैं या फिर एक-आध एकड़ में बिजाई कर रहे हैं. समय के साथ क्षेत्र के मेहनतकश किसान परंपरागत खेती को छोड़ उन्नत किस्म के केले की आधुनिक खेती कर न स़िर्फ अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं बल्कि बदलते परिवेश में अन्य किसानों के लिए प्रेरणाश्रोत बन रहे हैं. बिहार की सीमा से सटे होने के चलते छोटे किसान अपनी फसल निकटवर्ती ज़िलों में बेच देते हैं, वहीं बड़े पैमाने पर खेती करने वालों को लिए दिल्ली, लखनऊ, गाजियाबाद, कानपुर के व्यावसायी अच्छी क़ीमत देने को तैयार बैठे रहते हैं. क्षेत्र की दोमट व समतल मिट्टी केले के खेती के लिए माकूल है. किसान टीसू कल्चर, अल्पान, मालभोग जी नाईल आदि किस्म के केलों की बिजाई कर रहे हैं. केले का सीजन जुलाई से नवंबर तक होता है जबकि बुवाई मानसून आते शुरू हो जाता है. एक एकड़ में 1620 पौधा लगाया जाता है, जिसमें 30 से 35 हज़ार तक खर्च आता है. यदि फसल अच्छी रही तो 50 से लेकर 100 रु. प्रति घौद की आमदनी होती है. यानी प्रति एकड़ 70 हज़ार से लेकर एक लाख रुपए की आमदनी हो जाती है. जो किसान स्वयं मंडी में ले जाने को सक्षम होते हैं उनको लाभ कुछ ज़्यादा मिल जाता है. केले की खेती के साथ सह खेती भी की जा सकती है, जिससे अच्छी आमदनी हो सकती है. वहीं, गन्ने की एक एकड़ में खेती करने वाले किसानों को 35 से 40 हज़ार की ही आय होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि किसान ज़मीन का बेहतर इस्तेमाल करके एक हेक्टेयर में 100 टन केला उगा सकते हैं. कर्नाटक के सिरसी ज़िले के बनवासी गांव में रहने वाले अब्दुल शेख एक किसान है. जिन्होंने गन्ने की खेती में मिसाल क़ायम की है. भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान के प्रोग्रेसिव किसानों की सूची में इनका नाम प्रमुखता से आता है. इसकी वजह यह है कि अब्दुल शेख ने केले की खेती को नया आयाम दिया है. भारत में पैदा होने वाले कुल फलों में केले का योगदान 32 फीसदी है. देश में अभी हर साल कुल दो करोड़ टन केले का उत्पादन होता है. मांग बढ़ने के साथ ही क्षेत्र के किसान बड़ी संख्या में केले की खेती से जुड़ रहे हैं. अच्छी आमदनी से किसानों ने मोटे अनाज की खेती करना कम कर दिया है. भले ही यह कम क्षेत्रफल में हो लेकिन हर किसान के खेत में केले की खेती हो रही है. क़रीब दो वर्ष पूर्व टिशू कल्चर के केले की खेती शुरू हुई. लोगों ने जब इसके फायदे समझे तो अब तो टिशू कल्चर के केले की खेती जनपद में आर्थिक क्रांति के रूप में बढ़ती जा रही है. क्षेत्र का पढ़ा लिखा युवा वर्ग नौकरी पेशा करने की बजाय केले की खेती को एक व्यवसायिक रूप दे रहा है. केले की महंगाई ने इस वर्ष किसानों को और मालामाल कर दिया. केले की खेती से जुड़े किसानों के लिए अच्छी खबर यह है कि अब उन्हे मौसम की मार से होने वाले आर्थिक नुक़सान से निजात मिल सकेगा. कृषि वैज्ञानिकों ने केले की नई प्रजाति विकसित की है. नई प्रजाति टिशू कल्चर मौसम की मार जैसे तेज बारिश और आंधी सहने में सक्षम है. केले की इस नई प्रजाति के पौधों की ऊंचाई चार से पांच फिट के बीच होगी. जिससे कि गर्मी के दिनों में चलने वाली तेज हवाओं, आंधी और बारिश से फसल सुरक्षित रह सके.

बौनी किस्म के इस प्रजाति के पौधे लगवाकर किसानों के उत्पादन बढ़ाने की ज़िला उद्यान विभाग ने कवायद शुरू कर दी है. ग़ौरतलब है कि केले की अब तक लगाई जाने वाली प्रमुख किस्मों में हार्वेस्टा समेत अन्य फसल की ऊंचाई सात से नौ फिट तक की होती है. जिससे तेज हवा और बारिश में इनके गिरने की आशंका बनी रहती है. पौधों के गिरने से किसानों को भारी आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ता है. योजना के पहले चरण में किसानों को बीज, जैविक उर्वरक के अलावा सिंचाई के लिए धन मुहैया कराया गया है. किसानों को प्रशिक्षण दिला इसके प्रति जागरूक किया जा रहा है. विकल्प के रूप में शुरू की गई केले की खेती से हो रही आमदनी को देख किसानों का रुझान तेजी से इस ओर बढ़ रहा है.

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