सपना था, मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल को एशिया स्तर के अस्पतालों की सूची में सबसे अव्वल रखना, लेकिन सरकारीकरण होने के साथ ही मेडिकल कॉलेज की बुनियाद रखने वाले सदस्यों का सपना एक-एक कर टूटता चला गया. सेवा, सहिष्णुता और प्रेम का पाठ सिखलाने की बजाए यहां हिंसा का पाठ प़ढाया जाने लगा. तभी तो मेडिकल कॉलेज में जूनियर चिकित्सकों का दबदबा इस कदर है कि ज़रा सी भी बात होने पर धरना, तालेबंदी, मार-पीट और आंदोलन का रु़ख अख्तियार करना इनके लिए खेल बन गया है. डॉक्टर बनने के पूर्व एक शपथ ली जाती है. ईमानदारी, निष्ठा और प्रेम भाव से मरीजों का इलाज करने का और मरीजों की जान बचाने के लिए जी-जान लगाने का, लेकिन ऐसा हो कहां रहा है? अगर ऐसा होता तो क्या मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टर अपनी जिद मनवाने के लिए ह़डताल करते! इनकी तो जिद पूरी हो गयी, लेकिन जिनके घरों का एकमात्र चिराग बुझ गया, पुत्र के सिर से पिता का साया उठ गया, गोद में खिलाने वाली मां चली गई, क्या वापस आ पाएगी? क्या जूनियर डॉक्टरों को इसका अ़फसोस है. वे तो जश्न मना रहे हैं कि उनकी जीत हो गयी. लेकिन जिन लोगों को मौत ने हरा दिया, उनके परिवार का क्या होगा? राज्य सरकार के ज़िम्मे आते ही अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज में काम करने वाले लोगों के भविष्य तो सुरक्षित हो गए, लेकिन यहां आने वाले मरीज़ों को सुविधाएं कम होती चली गईं. हालांकि, आज बदले माहौल में इस मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सेवाएं कुछ बेहतर हुई हैं, लेकिन साथ ही यह मेडिकल कॉलेज आज राजनीति, बैठकबाज़ी, झग़डा-झंझट, दलित-महादलित की गुटबाजी का मैदान बन गया. हालिया दिनों में यहां के जूनियर डॉक्टरों एवं राजद विधायक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव के बीच हुई झ़डप राज्य स्तरीय सुर्खियों का विषय बनी, जिस कारण राज्य भर के मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में जूनियर डाक्टरों ने ह़डताल की.
विधायक-जूनियर डॉक्टर के बीच हुई झड़प और गोलीबारी की घटना के बाद और स्पष्ट हो गया. क्योंकि इस मामले को लेकर तमाम शहरवासियों और विभिन्न संगठनों के लोगों ने जूनियर डॉक्टरों के खिला़फ जमकर धरना-प्रदर्शन किया और मौन जुलूस भी निकाला. लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मरीज़ों के परिजनों के साथ जूनियर डॉक्टरों की जो हरकत होती है, इसके कारण ही वहां पदस्थापित वरीय चिकित्सक भी काम करने से कतराते हैं. लेकिन मामला जब पेशे से संबंधित होता है, तो लाचार होकर वरीय चिकित्सकों को भी जूनियर डॉक्टरों का साथ देना पड़ता है.
भगवान का रूप माने जाने वाले डॉक्टर तमाम अपील के बाद भी मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर अपनी मांगों पर अ़डे रहे. वहीं विधायक के बचाव में उनके अंगरक्षकों द्वारा की गई फायरिंग को बिहार पुलिस मेंस एसोसिएशन ने जायज़ ठहराते हुए राज्य सरकार से अपने सिपाही को जेल भेजे जाने के मामले पर गंभीर होते हुए राज्य सरकार से ही पूछ डाला कि आ़िखर वीआईपी की सुरक्षा में लगाये गए अंगरक्षकों की ड्यूटी क्या हो. यह सरकार तय कर दे. एक तऱफ किसी वीआईपी के साथ घटना घटती है, तो अंगरक्षक ज़िम्मेदार माने जाते हैं. यदि इनके बचाव में अंगरक्षक फायरिंग करता है, तब भी उसे दोषी ठहराया जाता है. अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज में एक मरीज़ के इलाज को लेकर विधायक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव और जूनियर डॉक्टरों के बीच हुई झ़डप में कौन दोषी है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन राज्य भर में इस मामले को लेकर जूनियर डाक्टरों की ह़डताल के कारण आम आदमी एवं जनता ही हलकान रही. आ़िखर इस मामले में जनता का क्या दोष था. अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टरों की दबंगई हरकत इसके पूर्व भी कई बार देखी गई है. मरीज़ों के परिजनों से की जा रही मारपीट को जब कैमरे में क़ैद करने वाले मीडियाकर्मियों को पीटा गया, तब भी जूनियर डॉक्टर और मेडिकल कॉलेज के सीनियर डॉक्टर अपनी-अपनी राग अलापते रहे. बिहार के एक ज़िले के तत्कालीन जज की पत्नी के इलाज में भी जूनियर डॉक्टरों ने जो अमानवीय हरकत की, वह भी राज्य स्तर में सुर्खियों पर छाई रही. हाल के दिनों में बिजली-पानी की समस्या को लेकर इस मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों ने अपने ही कॉलेज और अस्पताल में जो तो़ड-फो़ड और आगजनी की. विधायक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव के साथ जब घटना घटी, तो पुलिस जीप को फूंक देने, सदर अनुमंडल पदाधिकारी के अंगरक्षक के साथ मारपीट करने के मामले में भी जूनियर डॉक्टरों की कार्रवाई को मुन्ना भाई एमबीबीएस जैसे संबोधन से पुकारा जा सकता है. ऐसा नहीं है कि आज के सुशासन में ऐसी स्थिति आई है, राजद शासनकाल में इस मेडिकल कॉलेज के छात्रावास में राजद के स्थानीय एवं दबंग कार्यकर्ताओं का आना-जाना भी इस मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टरों के कारण ही था. इस समय छात्रावास में मेडिकल कॉलेज में प़ढने वाली एक छात्रा के साथ अमानवीय घटना घटी थी, तब पुलिस और प्रशासन के संज्ञान में परिजनों ने इस मामले को नहीं देकर अपनी इज़्ज़त बचाई थी, लेकिन लोगों को कानों-कान खबर तो लग ही गई. इस मेडिकल कॉलेज में विधायक और जूनियर डॉक्टरों के बीच एक मरीज के इलाज पर हुए मामले में भी कुछ वरीय व अवकाश प्राप्त चिकित्सकों की भूमिका भी संदिग्ध रही. इस मामले को लेकर गया में आम लोगों की सहानुभूति अब डॉक्टरों, विशेष कर मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों के प्रति नही रही. इस बात का पता विधायक-जूनियर डॉक्टर के बीच हुई झड़प और गोलीबारी की घटना के बाद और स्पष्ट हो गया. क्योंकि इस मामले को लेकर तमाम शहरवासियों और विभिन्न संगठनों के लोगों ने जूनियर डॉक्टरों के खिला़फ जमकर धरना-प्रदर्शन किया और मौन जुलूस भी निकाला. लोगों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मरीज़ों के परिजनों के साथ जूनियर डॉक्टरों की जो हरकत होती है, इसके कारण ही वहां पदस्थापित वरीय चिकित्सक भी काम करने से कतराते हैं. लेकिन मामला जब पेशे से संबंधित होता है, तो लाचार होकर वरीय चिकित्सकों को भी जूनियर डॉक्टरों का साथ देना पड़ता है. ऐसे प्रतिदिन इस मेडिकल कॉलेज में मरीजों के परिजनों के साथ कुछ न कुछ होने की बात सामने आती है. लेकिन इस बार मामला राजद के दबंग विधायक डॉ. सुरेंद्र प्रसाद यादव से जुड़ा हुआ है, इसीलिए कुछ विशेष लोग राजदकालीन शासन को दोहराकर विधायक के लोगों की ग़लती का हवाला दे रहे हैं. पर सच्चाई यही है कि अब जूनियर डॉक्टरों के प्रति गया में आम लोगों की सहानुभूति लगभग समाप्त सी हो गई है.
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