आर्थिककानून और व्यवस्थाजरुर पढेंदेशविधि-न्याय

नदी के कटान से किसान हुए बेघर

Share Article

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहराईच ज़िले के कई गांव ऐसे हैं जहां नदी के कटान से कई घर उजड़ जाते हैं. यह स्थिति वहां के गांवों के हर घर की है. इस स्थिति में गांव वाले अपना सामान समेट कर किसी अन्य स्थान पर चले जाते हैं. नदी के तेजी से होते कटान में जिन परिवारों का घर आ रहा होता है वे स्वयं अपने घर को उजा़डते जिसे कभी मेहनत करके उन्होंने बनाया था. यहां नदी के कटान से अनेक परिवार बेघर हो चुके हैं और तटबंध पर शरण लिए हुए हैं. उनके खेती की ज़मीन तो नष्ट हो गई, घर भी नहीं बचा, तो आख़िर ये कैसे जीवन यापन करें. बच्चों को क्या खिलाएं, बच्चें घर जाने की ज़िद करते हैं पर उन्हें कैसे समझाएं की घर तो नष्ट हो गया.

लोगों ने बहुत अभाव की स्थिति में तटबंधों पर शरण ली. अपने दुख-दर्द, भूख, अभाव की स्थिति बताते हुए महिलाओं की आंखों में आंसू आ गए. अब प्रशासन ने उनसे तटबंध से भी हटने को कह दिया है, ऐसे में वह कहां जाएंगे.

यह कहानी केवल बहराईच की नहीं है बल्कि लखीमपुर खीरी जैसे नदी कटान से प्रभावित अन्य ज़िलों की भी है. कहारनपुरवा, गोलगंज पंचायत, फखरपुर ब्लॉक के लोगों ने बताया कि 75 प्रतिशत कृषि भूमि का कटान हुआ है पर प्रशासन की तऱफ से क्षतिपूर्ति कुछ भी नहीं हुई है और ऐसी हालत में उन्हें किसी भी तरह की सहयोग प्राप्त नहीं हुआ. इस वर्ष की बाढ़ में लगभग पूरी फसल नष्ट हो गई पर क्षतिपूर्ति किसी भी किसान को नहीं मिली. पिछले वर्ष भी खेती की बहुत बर्बादी होने पर कोई क्षतिपूर्ति नहीं मिली थी. यह यहां हर वर्ष की कहानी है. दो वर्ष पहले मामूली राशि की सहायता चेक देकर सरकार ने खानापूर्ति कर लिया. कुछ वर्ष पहले आवास न होने पर 800 रुपए का चेक मिला था. यहां अपने-अपने पुरवे से आए गोलगंज पंचायत के अन्य किसानों की भी ऐसी ही स्थिति है. सोचने वाली बात यह है कि 800 सौ रुपए का चेक उन्हें किस हिसाब से मिला. आवास के एवज में दिए गए इस राशि में भला कैसे ये अपना आवास बनाए. इनके पास खाद्यान्न का पूर्णतया अभाव है, एक तो पेट की अग्नि साथ ही मौसम का बदलाव. इस ठंड और शीत लहर में आख़िर वे कैसे गुजर बसर करें.

तमाम समस्याओं से जूझ रहे यहां के लोग लगभग रोते हुए कहते हैं कि हमारा गांव कटान से बहुत बुरी तरह तबाह हुआ है और हम रोड पर आ गए हैं. अब जहां वे रह रहें है वहां उन्हें रोज़ाना की ज़रूरत के सामानों का भी पूर्णतया अभाव है. यहां के लोगों को उम्मीद है कि वे फिर इस पर खेती कर सकेंगे और उसी जगह पर फिर से घर बसा सकेंगे. किसान अपनी ज़मीन के नज़दीक ही बने रहना चाहते हैं. लोगों को इस बात का बेहद दुख है कि सरकार ने न तो उन्हें कोई मुआवज़ा दिया और न ही उन्हें दुबारा उस जगह बसने में ही कोई सहयोग कर रही है. लोगों ने बहुत अभाव की स्थिति में तटबंधों पर शरण ली. अपने दुख-दर्द, भूख, अभाव की स्थिति बताते हुए महिलाओं की आंखों में आंसू आ गए. अब प्रशासन ने उनसे तटबंध से भी हटने को कह दिया है, ऐसे में वह कहां जाएंगे. महिलाओं के लिए तो यह स्थिति और भी संवेदनशील है. यहां के लोगों को प्रशासन की तो कोई मदद नहीं मिली पर कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने ज़रूर उनकी सहायता की जिससे उन्हें कुछ राहत महसूस हुआ. कई गांव तो कटान में इस तरह तबाह हो गए कि वहां के लोग अपने बहुत से सामान भी नहीं बचा पाए और अब उन्हीं सामानों को ख़रीदना उनके बस की बात नहीं है. इस तरह यहां के लोगों का ख़ुशहाल जनजीवन तबाह और बर्बाद गया. उनके साथ इससे पहले भी ऐसा हो चुका है पर तब भी उनके लिए कोई उचित और स्थाई व्यवस्था नहीं की गई. यहां के लोगों के पास भी इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है कि वह बार-बार इस समस्या से दो चार हों. इस वर्ष लगभग 50 परिवार कटान से प्रभावित हुए. जिस स्थान पर फिलहाल उन्होंने अपना निवास स्थल बनाया है वह भी संवेदनशील है. कटान से बुरी तरह प्रभावित यहां के कई परिवार तो हमेशा के लिए अपना गांव घर छो़ड अन्यत्र चले गए हैं. यहां के लोगों की मांग है कि उनकी हालत को देखकर उनके सरकारी क़र्ज़ माफ कर दिए जाएं तो इसके साथ ही उन्हें ग़रीबी की रेखा से नीचे मान कर उन्हें बीपीएल/अंत्योदय कार्ड तथा इससे जुड़े लाभ दिए जाएं क्योंकि उनका घर और खेती सबकुछ बर्बाद हो गया है, उनके पास कुछ भी नहीं बचा है.

Sorry! The Author has not filled his profile.
×
Sorry! The Author has not filled his profile.

You May also Like

Share Article

Comment here