बिहार में नीतीश सरकार विकास एवं बेहतर कार्य संस्कृति के भले ही लाख दावे कर रही है, पर पटना हाईकोर्ट को लगता है कि सरकार में राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है. अदालत ने तो यहां तक कह दिया कि पटना जंगल है और यहां अफसरों की मिलीभगत से हर काम कराना संभव है. राजधानी पटना सहित कई ज़िलों में सड़क जाम और यातायात नियमों की घोर अनदेखी पर हाईकोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने कहा कि अव्यवस्था का मुख्य कारण राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है, लेकिन यह अब बर्दाश्त से बाहर है. यदि जाम से निज़ात दिलाने के लिए नीतिगत फैसला न लिया गया तो उच्चाधिकारियों की परेड कराई जाएगी.
सरकार कोर्ट से वादा कर आती है, पर अगली सुनवाई में वह एक- दो क़दम से आगे नहीं दिखती. कोर्ट का डंडा चलता है तो सारा अमला हरकत में आता है, पर कुछ दिनों बाद सब कुछ पुराना पड़ जाता है और गाड़ी वहीं की वहीं खड़ी दिखाई पड़ती है. लोगों को याद है, जब लालू -राबड़ी शासन के दौरान कोर्ट के डंडे से ही कुछ चीजें पटरी पर रहती थीं. क़ानून व्यवस्था से नाराज़ कोर्ट ने कई द़फा तो बिहार में जंगलराज तक कह दिया था. लोगों को उम्मीद है कि फिर पुरानी कहानी नहीं दोहराई जाएगी और कोर्ट ने जिन मामलों में चिंता जताई है, उन पर सरकार गंभीरता से ध्यान देगी.
न्यायमूर्तिद्वय शिवकीर्ति सिंह एवं डॉ. रवि रंजन की खंडपीठ ने कहा कि विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया था कि चुनाव के बाद अतिक्रमण एवं सड़क जाम से छुटकारा दिलाने के लिए लघु एवं दीर्घकालीन योजना बनाई जाएगी, लेकिन सरकार अब भी पुराना राग ही अलाप रही है. कोर्ट ने जानना चाहा कि सड़क के किनारे आख़िर कौन बंदोबस्त करता है, लोग किस तरह सड़क के किनारे दुकानें बना लेते हैं. इसी तरह पटना में बन रहे बेतरतीब अपार्टमेंटों पर भी कोर्ट ने नाराज़गी जताई है. सबसे ज़्यादा फटकार विजिलेंस ब्यूरो के क्रियाकलापों को लेकर लगाई गई. न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी की पीठ ने कहा कि यदि राज्य सरकार सचमुच भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना चाहती है तो सबसे पहले उसे निगरानी अन्वेषण विभाग बंद कर देना चाहिए, क्योंकि भ्रष्टाचार की जड़ विजिलेंस ही है. कोर्ट ने विजिलेंस को 2008 में आवास बोर्ड के अधिकारियों-कर्मचारियों की संपत्ति का ब्योरा देने को कहा था. विजिलेंस को कर्मचारियों के कार्यकलापों की जांच भी करनी थी.
विजिलेंस ने कोर्ट को बताया कि आवास बोर्ड के अधिकारी सहयोग नहीं कर रहे हैं. इस पर कोर्ट का कहना था कि आरोपी से विजिलेंस सहयोग की अपेक्षा करती है. ऐसा कभी हुआ है कि अभियुक्त स्वयं बताए कि उसने क्या किया है. ऐसा प्रतीत होता है कि विजिलेंस आवास बोर्ड के साथ मिला हुआ है. निगरानी विभाग पर कोर्ट की इस टिप्पणी से सरकार की भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जंग पर प्रश्नचिन्ह लग गया है. आख़िर जिस हथियार से लड़ाई लड़ी जानी है, उसकी गुणवत्ता कोर्ट की टिप्पणी से साफ हो जाती है. सभी जानते हैं कि बिहार में भ्रष्टाचार के ख़िला़फ लड़ाई लड़ना कोई सरल काम नहीं है. ख़ुद नीतीश कुमार भी महसूस करते हैं कि यह बड़ी जंग है. उन्होंने कई मौक़ों पर कहा कि भ्रष्टाचारियों में ताक़त है तो वे मुझे उखाड़ फेकें नहीं तो मैं भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा दूंगा. सरकारी कार्यालयों से लेकर पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर धब्बे हैं. यही वजह है कि सरकार इस काम की गंभीरता को समझ रही है.
निगरानी विभाग के प्रधान सचिव अशोक कुमार चौहान कहते हैं कि सरकार प्रीवेंटिव विजिलेंस सिस्टम विकसित करेगी, जिसका मक़सद भ्रष्टाचार ख़त्म करना है. सभी विभागों से बातचीत करके सीवीओ के पद सृजित कराने का प्रयास किया जा रहा है. चौहान का कहना है कि भ्रष्टाचार समाप्त करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसी को ध्यान में रखकर ज़िला स्तर पर भी फ्लाइंग स्न्वॉयड का गठन किया गया है, जो डीएम के अंतर्गत काम करता है और इसमें डीएसपी स्तर के अधिकारी शामिल किए गए हैं. चौहान के दावों के उलट एक सच्चाई यह भी है कि निगरानी विभाग ख़ुद अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है. जिस तरह भ्रष्टाचार उन्मूलन के दावे किए जा रहे हैं, उसे अमलीजामा पहनाने के लिए एक ऐसे निगरानी विभाग की ज़रूरत है, जो सभी संसाधनों से लैस हो, पर विभाग के मौजूदा ढांचे को देखने से तो लगता है कि लड़ाई कहीं आधी-अधूरी न रह जाए.
बताया जा रहा है कि भ्रष्टाचार से जुड़े अभी लगभग दो हज़ार मामले लंबित हैं. दरअसल कोर्ट का गुस्सा इसी आधी-अधूरी तैयारी को लेकर था. सरकार कोर्ट से वादा कर आती है, पर अगली सुनवाई में वह एक- दो क़दम से आगे नहीं दिखती. कोर्ट का डंडा चलता है तो सारा अमला हरकत में आता है, पर कुछ दिनों बाद सब कुछ पुराना पड़ जाता है और गाड़ी वहीं की वहीं खड़ी दिखाई पड़ती है. लोगों को याद है, जब लालू -राबड़ी शासन के दौरान कोर्ट के डंडे से ही कुछ चीजें पटरी पर रहती थीं. क़ानून व्यवस्था से नाराज़ कोर्ट ने कई द़फा तो बिहार में जंगलराज तक कह दिया था. लोगों को उम्मीद है कि फिर पुरानी कहानी नहीं दोहराई जाएगी और कोर्ट ने जिन मामलों में चिंता जताई है, उन पर सरकार गंभीरता से ध्यान देगी.
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