आर्थिककानून और व्यवस्थाजरुर पढेंदेशविधि-न्याय

पारिवारिक सर्वेक्षण सूचीः हजारों लोगों के नाम गायब

Share Article

कमज़ोर बुनियाद पर ऊंची इमारत की हसरत पूरी नहीं हो सकती. अगर ऐसा होता है तो भविष्य में संकट का भय बना रहता है. हम बात कर रहे हैं सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत सरकार द्वारा प्रदत्त उपभोक्ता वस्तुओं के वास्तविक लाभुकों की समस्याओं से. जो पिछले कई वर्षों से इस व्यवस्था के चक्की में पिसते हुए अक्सर हाय तौबा मचाते हैं. बहरहाल, जन वितरण प्रणाली के लाभुकों को सरकारी स्तर पर दो वर्गों में विभाजित कर साधन संपन्न व ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए अलग-अलग मानक तय किये गये हैं. जिसमें बीपीएल परिवार के लिए अन्य कल्याणकारी योजनाओं के साथ ही अनुदानित मूल्य पर जन वितरण प्रणाली के दुकानों के माध्यम से अंत्योदय अन्न योजना व अन्नपूर्णा योजना के तहत खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है.

लोग ज्यादा हैं और तेल कम. ठेला वेंडरों को किन कूपनधारियों के बीच किरासन का वितरण किया जाने का प्रावधान है. कहना मुश्किल जान पड़ता है. इसके अलावा सुदूरवर्ती पुलिस थानों के लिए 1 हज़ार 860 लीटर, हाट बाज़ार के नाम पर 6 हज़ार लीटर व सरकारी संस्थानों के मद में 7 हज़ार लीटर किरासन तेल का आवंटन किया गया है.

वर्तमान में ज़िले में ग़रीबी रेखा के नीचे क़रीब 4 लाख चिन्हित हैं. ज़िले के विभिन्न प्रखंडों में बीपीएल परिवारों का जो निर्धारण किया गया है, उसे लेकर बराबर मामला गहराता रहा है. मीडिया के रिपोर्टों से ज्ञात होता है कि बीपीएल निर्धारण में सरकारी कर्मचारियों ने केंद्र के मानको को ताक पर रखकर मनमाने तौर पर बीपीएल परिवार का निर्धारण करने का बखूबी रूप से कार्य किया है. बीपीएल परिवार में वैसे लोगों का नाम भी दर्ज है, जिनकी हैसियत करोड़ों में है. जबकि वैसे ग़रीब परिवारों का भी इस सूची में नाम दर्ज नहीं हो सके है, जिनकी माली हालत बहुत कमज़ोर है तथा वैसे परिवार की ज़िंदगी केवल मज़दूरी पर आश्रित है. ऐसी स्थिति में जन वितरण प्रणाली के तहत व्यवस्था का आलम क्या होगा? यह सहज रूप से जाना जा सकता है. हाल यह है कि ज़िले के राशनिंग लानिंग में जहां भी हाथ रखा जाएगा, वहीं सड़ाध मिलेगी. ज़िला आपूर्ति व्यवस्था बिचौलिये की मुट्ठी में क़ैद होकर कसमसा रही है. अधिकारियों की मिली-भगत से मानकों के विपरीत आवंटन सूची बनाकर पसंदीदा डीलरों को मनमानी तौर पर वस्तुओं का उठाव कराया जाता है, जबकि अधिकांश दुकानदारों को नाम मात्र का आवंटन उपलब्ध कराए जाने की बात सामने आती है. हद तो तब हो गई जब बनियापुर प्रखंड में मई 2010 के कूपन जनवरी 2011 में बंटने पर उपभोक्ता भड़क गए और उन्होंने पंचायत सचिव के मैसेंजर से कूपन छीनकर फाड़ डाले. कूपन का वितरण सभी पंचायतों में सरकारी कर्मियों के द्वारा बांटने का सरकारी निर्देश है मगर प्राय: सभी पंचायतों में संबंधित पंचायतों के मुखिया द्वारा बांटे गये. जिसमें संबंधित मुखियाओं द्वारा व्यापक रूप से मनमानी किए जाने की आम शिकायत मिलती है. बताया जाता है कि करीब 75 हज़ार से अधिक परिवार ऐसे भी हैं, जिनका नाम पारिवारिक सर्वेक्षण सूची से ग़ायब है. जिसके कारण उन्हें किरासन तेल नहीं मिलता है. शहर व देहात के कई ऐसे मोहल्ले हैं जहां ग़रीब परिवार के लोगों को अंधेरे में ही रात गुज़ारनी पड़ती है. ज़िले में किरासन तेल का भारी संकट है. जन वितरण प्रणाली के विक्रेताओं के माध्यम से मिलने वाला किरासन बहुत कम है. एपीएल व बीपीएल सूची में शामिल ग्रामीण परिवार को 3 लीटर और शहरी परिवार को ढाई लीटर किरासन दिया जाता है. इस मात्रा से महीने भर का गुज़ारा कैसे होता होगा, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इससे अलग स्थिति यह है कि जिनका नाम न तो एपीएल सूची में है और न ही बीपीएल सूची में. उन्हें स़िर्फ कालाबाज़ारी मे बिकने वाले किरासन से ही घर में उजियारा मिल सकता है. हालत यह है कि लोग ज्यादा हैं और तेल कम. ठेला वेंडरों को किन कूपनधारियों के बीच किरासन का वितरण किया जाने का प्रावधान है. कहना मुश्किल जान पड़ता है. इसके अलावा सुदूरवर्ती पुलिस थानों के लिए 1 हज़ार 860 लीटर, हाट बाज़ार के नाम पर 6 हज़ार लीटर व सरकारी संस्थानों के मद में 7 हज़ार लीटर किरासन तेल का आवंटन किया गया है. जबकि सरकारी मानकों का अलग मानना है. ज़िले में किरासन तेल के थोक अधिकृत विक्रेताओं की संख्या 17 है, जिन्हें जन वितरण प्रणाली विक्रेताओं सहित ठेला वेंडरों को अनुदानित दर पर तेल उपलब्ध कराने की ज़िम्मेवारी है.

Sorry! The Author has not filled his profile.
×
Sorry! The Author has not filled his profile.

You May also Like

Share Article

Comment here