पेंशन के आसरे हैं कई बुज़ुर्ग

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एटा में पाश्चात्य संस्कृति की तेज बह रही बयार ने एटा जैसे ज़िले में भी सामाजिक बदलाव ला दिए हैं. यही वजह है कि सामाजिक बदलाव की परिणति के बीच में वृद्धजनों की पारिवारिक उपेक्षा में आए दिन बढ़ोतरी हो रही है. जिस औलाद को बुढ़ापे की लाठी माना, उसी के तिरस्कार ने इस वर्ग के समक्ष बुढ़ापे में रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है. परिणाम यह है कि हज़ारों वृद्धों के लिए सरकारी पेंशन ही बुढ़ापे की लाठी बन गई है या फिर पेंशन से वंचित तमाम वृद्ध हाड़तोड़ मेहनत करने को विवश हैं.

गांव पौंढरी के सुखवीर, अल्हैपुर के मंगू, छछैना के बहोरी आदि वृद्धों की पीड़ा ठीक इसी तरह की ही है. जो वृद्धजन पेंशन के लिए भागदौड़ में विश्वास नहीं करते, वह औलाद होने के बावजूद भी गांवों से रोज शहर आकर मेहनत-मजदूरी कर वृद्ध समाज को ज़ज्बा ही नहीं दे रहे, बल्कि उन्हें तिरस्कार करने वाली औलाद को भी ठेंगा दिखा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के एटा क्षेत्र के समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित वृद्धावस्था पेंशन के आंकड़े इसके गवाह हैं. दो वर्षों में ही पांच हज़ार से अधिक पेंशन धारकों में वृद्धि हुई है. वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्र के 23670 व नगरीय क्षेत्र के 1099 वृद्धजन विभाग से पेंशन पाकर बुढ़ापा काट रहे हैं. जिसमें एटा तहसील के ग्रामीण क्षेत्र में 10599, अलीगंज में 8927 तथा जलेसर में सबसे कम 4144 वृद्धों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है. वृद्धों के लिए सरकारी पेंशन औलाद से कम नहीं है. शहरी क्षेत्र में अभी भी पेंशन के सहारे कम वृद्ध जीवन जी रहे हैं. एटा तहसील में 342, अलीगंज में 644 तथा जलेसर में मात्र 113 ही पेंशन धारक लाभान्वित हो रहे हैं. यह आंकड़ा तो पेंशन पाने में स़फल वृद्धों का है बल्कि इसके अलावा भी तमाम वृद्धजन पेट के लिए पेंशन पाने को विभाग के चक्कर काटते देखे जा सकते हैं. इस विभाग के कार्यालय पर तमाम ऐसे वृद्धजन मौजूद देखे जा सकते हैं जिन्होंने अपनी जीवनभर की खुशियों को औलाद पर न्यौछावर कर दिया और बुढ़ापे में उन्हें यह दिन दिखा दिया कि वह सरकारी सहायता को ही बुढ़ापे की लाठी मानकर यहां फरियाद कर रहे हैं. गांव पौंढरी के सुखवीर, अल्हैपुर के मंगू, छछैना के बहोरी आदि वृद्धों की पीड़ा ठीक इसी तरह की ही है. जो वृद्धजन पेंशन के लिए भागदौड़ में विश्वास नहीं करते, वह औलाद होने के बावजूद भी गांवों से रोज शहर आकर मेहनत-मजदूरी कर वृद्ध समाज को ज़ज्बा ही नहीं दे रहे, बल्कि उन्हें तिरस्कार करने वाली औलाद को भी ठेंगा दिखा रहे हैं. समाज का कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं है. जिन्होंने जीवनभर मेहनत कर बुढ़ापे को सुकून से जीने के लिए लाखों रुपया एकत्रित किया, आज ऐसे भी तमाम लोग अपनों के लिए बेगाने हैं.

पहल मुक़ाम तक नहीं पहुंची

जिले में समाज कल्याण विभाग भले ही हज़ारों वृद्धों को पेंशन का सहारा दे रहा हो पर आज तक कोई भी सरकारी वृद्ध आश्रम स्थापित नहीं हो सका है. ऐसे हालात समाज के कुछ लोगों ने वृद्ध, असहायों को सहारा देने के लिए हाथ तो बढ़ाए हैं, लेकिन समाज से अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण अभी यह प्रयास का़फी धीमी गति से ही चल रहे हैं. स्वामी विवेकानंद वृद्धजन कल्याण समिति द्वारा एटा-आगरा मार्ग पर भूमि की व्यवस्था कर निर्माण कार्य शुरू तो कराया गया है, लेकिन अभी वृद्धों को छत मिलने में देर है. समाजसेवी प्रवेशचंद्र कैलानी ने भी वृद्धा आश्रम की स्थापना के प्रयास मुख्यालय पर किए हैं. इसके अलावा शहर के ही समाजसेवी राकेश गांधी द्वारा भी इस दिशा में क़दम तो बढ़ाया गया है, लेकिन अभी यह प्रयास सार्थक होने में कुछ समय और लग जाएगा. यदि यह प्रयास मुक़ाम तक पहुंचे तो अपनों के सताए वृद्धों को नया जीवन मिलेगा.

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