साई के बिना जीवन

Share Article

मैंने जीवन में परमात्मा का अनुभव बहुत जल्द ही कर लिया, लेकिन साई बाबा का अनुभव 1998 में हुआ. इतनी कम उम्र में ही भारत की सबसे सफल स्पोर्टस प्रमोशन की कंपनी की सफलता का स्वाद चख मैं एक दम रसातल में था. अपनों से धोखा खाया. सब कुछ लुट चुका था. जीवन से हारकर किसी के  कहने पर मैं परिवार समेत किसी चमत्कार की अपेक्षा से, शिरडी के द्वार पहुंचा. दुनिया से टूटा, बिखरा सा बाबा के दर पर जाकर बैठा था कि बाबा के साक्षात दर्शन हुए. इससे पहले ऐसा कभी हुआ नहीं था, इसलिए लगा सपना है कि शायद सपना होगा. अभी इसी अविश्वास में था कि अचानक बाबा बोले-क्या सोच रहा है? तू मेरा बेटा है, उठ और मेरा काम कर, मेरा प्रचार कर…

मैं बोला- बाबा, आप मेरा परिवार संभालों और मुझे मुक्ति दे दो. मैं अब और नहीं बर्दाश्त कर सकता. मैं इन्हें आपके हवाले कर बस मुक्त जीवन जीना चाहता हूं. बाबा बहुत ही प्यार से बोले- बेटा, अभी से हार मान ली. अभी तो बहुत काम बाक़ी है. चल उठ जा और मेरा प्रचार कर, तू मेरा बेटा है, यही तेरा काम है. नींद खुली तो सामने कोई न था, लेकिन बाबा का अहसास बहुत गहरा था. उनकी आवाज़ मेरे कानों में अब भी गूंज रही थी. उनके होने का उनभव काल्पनिक नहीं, बल्कि सच था. मैंने सोचा, चलो जैसा सुना था वैसा ही चमत्कार हुआ. बाबा के चरणों में आकर ऐसा बहुत लोगों के साथ होता है. मेरे साथ भी चमत्कार होगा और मैं मुश्किलों से निकल जाऊंगा. चमत्कार हुआ, मुश्किल से बाहर भी निकला. लेकिन तब से शायद कुछ और ही तय हो गया मेरे जीवन के लिए. लगा कि जैसे मेरे जीवन का रास्ता कोई और तय कर रहा था. बिजनेस फिर शुरू हुआ. चूंकि बाबा के शब्द याद थे. मैंने बाबा के जीवन पर फिल्म बनाना की योजना बनाई. फिल्म बनी और ़खूब चली. लेकिन मेरे जीवन के लिए कुछ और ही तय था. जब-जब भी मैंने बिजनेस पर काम किया, वह फेल होता गया. आज तक जिन प्रोजेक्टेस को करने में मुझे कभी भी फाइनेंसर या स्पॉन्सर्स की कमी नहीं रही थी, वो मुझ पर पूरा विश्वास करते थे. मैं न स़िर्फ पूरा इवेंट करता था, बल्कि स्पॉन्सर्स और अपने लिए पैसे भी बनाता था और हर इवेंट बहुत सफल होता था. अचानक मेरे स्पॉन्सर्स मुझ पर अविश्वास करने लगे, बिजनेस फिर पिछ़डने लगा. मुझे लगा क्या बाबा फिर मुझसे नाराज़ हैं. मैंने बाबा को फिर पुकारा, सपने में आ कर बाबा ने फिर कहा अपने जीवन का मक़सद याद कर. तुझे उसी के लिए चुना गया है. मेरा प्रचार प्रसार कर. जबसे होश संभाला था, स़िर्फ यही समझा था कि इस दुनिया में आगे ब़ढने के लिए या कोई भी मुक़ाम तय करने के लिए ख़ुद को प्रमोट करना प़डता है. अब गुरु के प्रचार-प्रसार के लिए क्या करूं. शायद समझ ही नहीं पा रहा था, इसी बीच बाबा से जु़डे लोगों के जो अनुभव थे, उस पर आधारित एक धारावाहिक बनाने की सोची. मजे कि बात ये है कि इस प्रोजेक्ट के सारे काम आसानी से होते गए. चैनल भी मान गया. फाइनेंसर मिला और स्पॉन्सर भी. बाबा बार-बार कहते गए सब सब कुछ भूलकर स़िर्फ मेरा काम कर. मैं, मुश्किलों में फंसा, समझ ही नहीं पा रहा था कि वह क्या कह रहे थे. इसके बाद तो जब-जब उनसे जु़डा काम किया, वह सफल रहा लेकिन अपना कोई काम शुरू किया तो वह असफल रहा. फिर मैं समझा कि जब आप अपनी सारी अपेक्षाएं, आकांक्षाएं किसी काम से जो़ड लेते हो तो आपका कल्याण स्वयं ही हो जाता है. शायद आप जो अपनी योजना बनाते हैं, उससे भी बेहतर और बड़ी योजना उसकी होती है. धीरे-धीरे मैंने जब इस राज को समझा और अपने जीवन के इस स़फर को जाना, मैं नतमस्तक होकर उसकी शरण में हो लिया. आज मेरा हर पल उससे जु़डा है. मेरा हर काम उसके लिए हुआ. धीरे-धीरे मैं यह भी समझा कि क्या बाबा को प्रचार-प्रसार की ज़रूरत थी? असल में नहीं थी. ज़रूरत लाखों-करो़डों दर्द में डूबी आत्माओं तक उनका संदेश पहुंचाने की थी. उनके अहसास को उन तक पहुंचाना था. मक़सद था बाबा का ऐसा परिवार बनाना, जिसमें हर पल एक ऊर्जा और एक शक्ति बल दे कि बाबा का साथ हमारे साथ है और उनका हाथ हमारे सिर पर हमेशा रहेगा. ओम साई राम.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *