बजट 2011 इसमें गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है

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प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है. जहां जनता को खाने को भरपेट भोजन न हो वहां यह काम और भी आसान हो जाता है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को सरकारी फाइलों और वित्त मंत्री के लाल सूटकेस में बंद आंकड़ों और संख्याओं के परे ले जाकर ही किसी भी बजट के  पीछे की मंशा समझी जा सकता है. इसे समझने का आधार होता है कि बजट में आम जनता के लिए क्या है? ऐसा इसलिए है क्योंकि जनता ही देश को पैसा कमा कर देती है और सरकारें केवल उस पैसे की रखवाली करतीं हैं. इस बजट को देखा जाए तो एक बार फिर से कांग्रेस सरकार ने यह जता दिया है कि वह हर क़ीमत पर बाज़ारवाद और नव उदारवाद का साथ देगी.

यह बजट जनता के लिए दुःख लेकर आया है, जबकि जनता महंगाई और भुखमरी की मार झेल रही है, देश के किसान त्राहिमाम कर रहे हैं और बच्चों का भविष्य अंधकार की गर्त में चला गया है. प्रणब मुखर्जी ने बजट पूर्व अपने भाषण में बहुत ही मानवीय बातें कीं. वित्त मंत्री ने माना कि देश महंगाई और अभाव की मार झेल रहा है. उन्होंने यह भी माना कि यह महंगाई और कमी सबसे ज्यादा प्रभाव खाद्य पदार्थों के ही संदर्भ में है. यहां तक उनकी बात बिलकुल सही है. भारत में पिछले एक साल में खाने की चीज़ों आटे, दाल, चावल, दूध, अंडा, प्याज, सब्ज़ियां एवं चीनी के भाव में ही सबसे ज्यादा उछाल आया है.  सुनने वालों ने सोचा कि शायद सरकार को और खुद मंत्रीजी को शर्म आई है और वह इसका निवारण करने जा रहे हैं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. महंगाई कोई साधारण बात नहीं है कि इसे तुरंत कम किया जा सके. सरकार ने पिछले दिनों प्याज के दाम आसमान छूने पर जनता को दिखाने के लिए बड़े छापे मारे, लेकिन समझने की बात यह है कि इन छापों से कुछ नहीं होता. महंगाई बाक़ी बहुत से कारकों से बढ़ती या घटती है. अब अगर पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ेंगे तो सारे सामानों कि ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और महंगाई भी बढ़ जाएगी और इसका पूरा इंतज़ाम इस बजट में कर दिया गया है. इस बजट में पेट्रोल और सार्वजनिक वाहनों के ईंधनों पर दी जाने वाली सब्सिडी को बड़े पैमाने पर घटा दिया गया है.

2010-11 में 38386 करोड़ से घटाकर 2011-12 के लिए बस 23640 करोड़. सरकार शायद बहरी ही नहीं अंधी भी हो गई है. शायद प्रणब मुखर्जी ने अ़खबार पढ़ना और टी.वी पर समाचार सुनना बंद कर दिया है. ऐसा नहीं होता तो वे समझते कि जब तेल उत्पादन करने वाले देशों यानी पूरे पश्चिम एशिया में क्रांति की लहर चल रही हो तो ज़ाहिर है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत अपने आप बढ़ेगी और इसलिए भारत में भी. अब सब्सिडी भी कम कर दी तो जनता क्या करेगी? प्रणब जी ने महंगाई को तो माना और यह भी स्वीकार किया कि भारत में कुपोषण का काला साम्राज्य फैलता जा रहा है, लेकिन क्या किया? खाद्यान्नों पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी को ही कम कर दिया. पिछले साल यह सब्सिडी 60600 करोड़ थी और इस साल इसे 60573 करोड़ कर दिया गया है. अब इस बात का क्या मतलब निकलता है, इसके पीछे मुखर्जी साहब की कौन-सी नई और नायाब आर्थिक सोच है यह तो वही जानें, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में खाद्यान्नों की क़ीमतें बढ़ रही हैं, यह क़दम जनता विरोधी है. यह कटौती कम जान पड़ती है, लेकिन अगर इसे कृषि उत्पादों से जुड़े कोल्ड स्टोरेज और गोदामों के लिए नियत खर्च में कमी के साथ जोड़ दिया जाए तो इस कमी का आंक़डा लगभग छह हज़ार करोड़ का हो जाता है.

इस बजट की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि वित्तीय और आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के नाम पर इसमें जनता के कल्याण के लिए पैसे का आवंटन कम कर दिया गया. अगर सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में इस बजट को समझा जाए तो पता चलता है कि सरकार ने इस बार पिछली बार से कम पैसा खर्च करने की योजना बनाई है. पिछली बार का बजट खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 15.4 प्रतिशत था जो इस बार घटकर बस 14 प्रतिशत रह गया है. अब अगर इसे बढ़ी हुई क़ीमतों और महंगाई के संदर्भ में देखा जाए तो यह बहुत ही गंभीर आंक़डा बनकर उभरता है. इस कम खर्ची और बचत की मार सबसे ज्यादा ग़रीब और हाशिये पर खड़े तबक़ों पर पड़ेगी. अब अपने भाषण में मुखर्जी साहब ने कहा कि उन्होंने पिछले दो साल के बजटों में व्यवसायियों और बड़े उद्योगपतियों को वैश्विक मंदी की मार झेलने की वजह से जो छूट दी थी, इस बजट में वे उसे वापस ले रहे हैं. अब पिछले दो सालों की इस रियायत को इस बार बंद किया गया तो ज़ाहिर सी बात है कि सरकार का बहुत पैसा बचा. तो प्रश्न यह उठता है कि इस पैसे को जनता के  लिए क्यों नहीं लगा दिया गया? अब बात सामाजिक विषयों और मदों में खर्च किए जाने वाले पैसे की. यह बजट का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है जैसा कि किसी भी बजट के पीछे की मंशा इसे देखकर समझी जा सकती है. सकल घरेलू उत्पादन के अनुपात में इस बार इस विषय पर सकल घरेलू उत्पाद का बस 1.96 प्रतिशत ही खर्च करने का सरकार का मन है. बड़ी बात यह है कि पिछले साल जब इतनी महंगाई नहीं थी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी चल रही थी तब भी यह अनुपात इस बार से अधिक था. मुखर्जी साहब ने अपने भाषण में कहा कि यह बजट उन्होंने ख़ासकर आम आदमी के लिए बनाया है, लेकिन उनकी कैंची जहां-जहां चली है वह इस बात को नकार देती है. सबसे पहले उनकी गाज गिरी महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) पर. याद रखने वाली बात यह है कि इस योजना को कांग्रेस ने अपनी अग्रणी योजनाओं में भी सबसे आगे रखा था. जनता का प्यार और विश्वास जीतने का यह सबसे बड़ा ज़रिया माना जाता था और देश में अप्रशिक्षित मज़दूरों के लिए यह योजना भगवान के आशीर्वाद से कम नहीं है. इस योजना को खाद्य सुरक्षा का भी एक स्तंभ माना जाता है. इस सबके बावजूद बजट में इसके सौ करोड़ रुपये काट दिए गए. इसी संदर्भ में एक और बात बहुत आवश्यक है. एक तो सरकार ने खाद्य पदार्थों पर दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती की, साथ में पहले रोज़गार पर खर्च काटा और ऊपर से खाने के दाम आसमान छूने लगे. इस तरह की व्यवस्था में, जहां पर एक मज़दूर और ग़रीब आदमी पर इतना भार डाला जा रहा हो, एक सफल अर्थव्यवस्था का पनपना संभव नहीं है. यह व्यथा यहीं नहीं रुकती, ग्राम खाद्यान्न बैंक योजना के लिए आवंटित पैसे में भी 30 फीसदी की कमी कर दी गई है.

मुखर्जी साहब ने बजट के पहले के अपने भाषण में संसद के सामने कहा कि उनकी सरकार विस्तृत विकास के लिए कटिबद्ध है और यह बजट उस विचार का आईना होगा, लेकिन उन्होंने ग़रीबों के संबंध में सभी योजनाओं से सरकारी खर्च काटने का काम ब़खूबी किया. पहले तो ग़रीब के मुंह से निवाला छीन लिया, फिर उसके सर के ऊपर की छत भी ले ली. इंदिरा आवास योजना जो कि कांग्रेस की अग्रणी योजनाओं में से एक है, का भी आवंटन का़फी हद तक पिछली बार की तुलना में कम कर दिया गया है. पिछली बार इसे 9334 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे और इस बार बस 8996 करोड़. स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना (नेशनल रूरल लिवलीहुड मिशन) का आवंटन भी लगभग सौ करोड़ कम कर दिया गया है. इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम से मुखर्जी साहब क़समें खाते हैं, लेकिन इसके विकास पर भी पानी फेर दिया गया है. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बजट 18996 करोड़ से घटाकर बस 16006 करोड़ रुपये कर दिया गया है. आज जब भारत के गांव मंदी की मार झेल रहे हैं, महंगाई और गिरते उत्पादन क्षमता से जूझ रहे हैं, जिससे मुखर्जी साहब भी इत्त़ेफाक़ रखते हैं और जिसे उन्होंने अपने भाषण में कहा भी, ग्रामीण विकास मंत्रालय का खर्च 76378 करोड़ से घटाकर 74143 करोड़ कर दिया गया है. सरकार ने शिक्षा पर खर्च बढ़ाकर वाहवाही कमाने का प्रयास तो किया, लेकिन जनता को नहीं बताया कि इसमें सरकार की कोई उदारता नहीं है बल्कि शिक्षा पर लगाए गए टैक्स से आए पैसे को ही वापस लगा दिया गया है. फिर भी इस बढ़ोतरी की सच्चाई कुछ अलग ही है. साथ ही सरकार ने दिखाया कि उसने सर्व शिक्षा अभियान पर पिछली बार के 15000 करोड़ की जगह इस बार 21000 करोड़ रुपये का खर्च नियत किया है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस पैसे से भी सबको शिक्षा के अधिकार की गारंटी नहीं दी जा सकती. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार के अपने आंकलन के अनुसार प्रारंभिक शिक्षा को आने वाले पांच सालों में सकल बनाने के लिए 1.82 करोड़ ख़राब रुपयों की ज़रूरत है. अगर इस हिसाब से देखा जाए तो इस बार का आवंटन इस संख्या का पांचवां हिस्सा होना चाहिए था. इसे इस आंकलन के अनुसार 33 हज़ार करोड़ होना चाहिए था.

कामगार मज़दूरों के हितों की भी अनदेखी इस बजट में की गई. राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत इस बार यह प्रावधान किया गया कि इसके अंतर्गत अब सारे मनरेगा के मज़दूर, बीड़ी उद्योग में लगे मज़दूर और कई खतरनाक क़िस्म के उद्योगों में काम कर रहे लोग आएंगे, लेकिन बजट में इस योजना के लिए बहुत ही कम पैसा आवंटित किया गया है. पिछली बार 446 करोड़ रुपये दिए गए थे, जबकी इसे इस बार काट कर 280 करोड़ कर दिया गया है. एक बार फिर ग़रीब आदमी मारा गया, ठगा गया. बच्चों पर भी किए जाने वाले खर्च में कोई ख़ास वृद्धि नहीं हुई है. कुपोषित बच्चों की संख्या देखी जाए तो, इस मामले में भारत विश्व में अग्रणी है, लेकिन यहां की सरकार के लिए शायद यह शर्मनाक बात न होकर एक तमग़ा है. आईसीडीएस (इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विस) में पिछली बार के 9280 करोड़ के ऊपर इस बार बस दस हज़ार करोड़ ही आवंटित किए गए हैं और यह पैसा भी इसलिए बढ़ाया गया है, क्योंकि इसमें काम करने वाली आंगनवाड़ी कर्मियों की तनख्वाह बढ़ाई गई है. इस कारण इस बढ़े हुए आवंटन से बढ़ा हुआ वेतन दिया जाएगा न कि बच्चों को इसका कोई लाभ मिलेगा. वैश्विक मंदी की मार झेल रही कृषि के लिए भी कुछ ख़ास नहीं किया गया है. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत इस बार का आवंटन बस 7860 करोड़ है, जो पिछली बार के 6755 करोड़ के मुक़ाबले कोई ख़ास वृद्धि नहीं है. उपज ब़ढाने के लिए किसान के पास बेहतर तकनीक नहीं है और देश में कृषि पर आधारित जनता की बहुतायत है. इतने कम पैसों में इन सारी समस्याओं का निवारण संभव नहीं है. हम सभी हरित क्रांति को देश के इतिहास का एक स्वर्णिम पन्ना मानते हैं, लेकिन इसे देश के पूर्वीय क्षेत्रों में फैलाने के लिए बस 400 करोड़ रुपये दिए गए हैं. इन अति ग़रीब पूर्वीय राज्यों में पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, असम, उड़ीसा, बिहार एवं झारखंड शामिल है. इसके विपरीत देश के महानगरों में बसें चलवाने के लिए ही लगभग ढाई हज़ार करोड़ रुपये रखे गए हैं.

खाद्य सुरक्षा पर यह सरकार एक क़ानून लाने जा रही है, लेकिन कृषि के लिए दिया गया पैसा नगण्य है. यह सरकार की लापरवाही है, जिस कारण साठ हज़ार ऐसे गांवों में जहां दलहन उगाई जाती है, के विकास के लिए बस 300 करोड़ रुपये दिए गए हैं. प्रणब मुखर्जी के ही अनुसार भारत की 40 प्रतिशत सब्ज़ियां बाज़ार पहुंचने से पहले ही स़ड जाती हैं, लेकिन सब्ज़ियों की खेती के विकास के लिए बस 300 करोड़ रुपये दिए गए. भारत की जनता में प्रोटीन की भारी मात्र में कमी पाई जाती है, लेकिन पूरे भारत के 1.18 बिलियन लोगों की प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय मिशन को बस 300 करोड़ रुपये का अनुदान दिया गया है. भारत दूध उत्पादन में विश्व में अग्रणी है, लेकिन यहां प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता शायद सबसे कम है, लेकिन फिर भी चारा विकास योजना को भी बस 300 करोड़ रुपये का ही आवंटन मिल पाया. अब देखते हैं कि इस बजट में इस देश की अल्पसंख्यक जनता के लिए क्या है? रंगनाथ आयोग और सच्चर कमेटी की रिपोर्टों ने यह साफ़ कर दिया कि इस देश का मुसलमान कितना ग़रीब और पिछड़ा हुआ है, लेकिन इस बजट ने मुसलमानों को भी धोखा दिया है. पूरे बजट में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के लिए बस एक ही परिच्छेद है. सरकार ने तय किया है कि अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता पर बैंकों द्वारा दिए गए लोन का 15 प्रतिशत दिया जाए, लेकिन यह दर पिछले साल 13 प्रशित रही और इस साल 13.6 प्रतिशत की कम दर से बढ़ी. साथ ही सरकार ने इस 15 प्रतिशत के लक्ष्य के लिए कोई नियत समय सीमा का निर्धारण नहीं किया है.

ज़ाहिर है, यह बजट जनता विरोधी है. जनता को ठगा गया. पूरे साल तो कांग्रेस और उसके घटक दलों ने देश को भ्रष्टाचार के मा़र्फत लूटा और जब बारी मरहम लगाने की आई तो जनता के ज़ख्मों को और कुरेद दिया गया.

  • खाद्यान्नों पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी को ही कम कर दिया. पिछले साल यह सब्सिडी 60600 करोड़ थी और इस साल इसे 60573 करोड़ कर दिया गया है
  • सकल घरेलू उत्पादन के अनुपात में इस बार सामाजिक विषयों पर सकल घरेलू उत्पाद का बस 1.96 प्रतिशत ही खर्च करने का सरकार का मन है
  • सार्वजनिक वाहनों के ईंधनों पर दी जाने वाली सब्सिडी को बड़े पैमाने पर घटा दिया गया है. इसे 38,386 करोड़ से घटाकर 2011-12 के लिए 23,640 करोड़ कर दिया गया
  • मनरेगा के बजट से सौ करोड़ रुपये काट दिए गए
  • इंदिरा आवास योजना के बजट से 338 करोड़ रुपये काटे गए
  • स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना (नेशनल रूरल लिवलीहुड मिशन) का आवंटन सौ करोड़ कम कर दिया गया है
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का बजट 446 करोड़ से 280 करोड़ कर दिया गया है
  • पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, असम, उड़ीसा, बिहार एवं झारखंड में हरित क्रांति विस्तार के लिए बस 400 करोड़ का प्रावधान
  • पूरे बजट में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के लिए बस एक ही परिच्छेद है. सरकार ने तय किया है कि अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता पर बैंकों द्वारा दिए गए लोन का 15 प्रतिशत दिया जाए.
  • पिछली बार का बजट खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 15.4 प्रतिशत था जो इस बार घटकर बस 14 प्रतिशत रह गया है
  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का बजट 18996 करोड़ से घटाकर 16006 करोड़ रुपये कर दिया गया है
  • ग्रामीण विकास मंत्रालय का खर्च 76378 करोड़ से घटाकर 74143 करोड़ कर दिया गया है

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