छत्तीसगढ़ः फ्लोरेसिस ने पांव पसारे, सरकार बेखबर

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बस्तर अंचल के संभाग मुख्यालय जगदलपुर से 47 किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बाहुल्य ग्राम बाकेल की आबादी 25 हज़ार है. दूषित पानी की आपूर्ति के चलते इस गांव के 72 लोग फ्लोरेसिस नामक ख़तरनाक बीमारी से पीड़ित हैं, पीड़ितों में महिलाओं और बच्चों की संख्या ज़्यादा है. ग़ौरतलब बात यह है कि यहां से क़रीब दो किलोमीटर की दूरी यानी राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 43 जगदलपुर-रायपुर मार्ग के 45वें किलोमीटर पर भाजपा सांसद बलिराम कश्यप और उनके पुत्र एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री केदार कश्यप का गृहग्राम फरसागुड़ा है, जहां सांसद एवं उनके मंत्री पुत्र अक्सर आते-जाते रहते हैं.

दूषित पेयजल ने क़रीब एक सैकड़ा लोगों का जीवन नारकीय बना दिया है. बड़ी संख्या में लोग विकलांगता की ओर अग्रसर हैं और सरकार को इसकी कोई जानकारी नहीं है, जबकि गांव-गांव में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की तैनाती उसके दावे में शामिल है. यह हाल उस जगह का है, जहां से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर भाजपा सांसद और उनके पुत्र एवं राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री का पैतृक निवास है.

इसी प्रकार बस्तर विकास खंड की खंडसरा पंचायत के ग्राम नौपारा में फ्लोराइडयुक्त पानी पीने से दो सौ से अधिक बच्चों के दांत काले, भूरे और पीले हो गए हैं और कमज़ोर होकर टूट-टूटकर झड़ रहे हैं. इस बीमारी की शुरुआत ऊपर के दांतों में धनुषाकार आकृति की तरह दाग़ पैदा होने के साथ होती है और फिर यह सभी दांतों को अपनी चपेट में ले लेती है. क्षेत्रीय जनता पिछले पांच-छह सालों से इस बीमारी से पीड़ित है, लेकिन आश्चर्य का विषय यह है कि ज़िले के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को इसकी कोई ख़बर नहीं है. वहीं दूसरी तऱफ राज्य सरकार लोक स्वास्थ्य के बड़े-बड़े दावे करते नहीं थकती. स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी गांव-गांव में फैले हैं, बावजूद इसके सरकार इस बीमारी से अनभिज्ञ जान पड़ती है. लोग जानकारी और संसाधनों के अभाव में इधर-उधर भटकने के लिए मजबूर हैं.

स्थानीय दीप्ति हायर सेकेंडरी स्कूल की शिक्षिका रोशनी शिंदे एवं अनिल हर्जपाल के मार्गदर्शन में शुभेंदु राय, मोहनी पटेल, अनुपमा गौण, नंदनी सोनकेशरी एवं हिमांशु गुप्ता नामक छात्रों ने इस बात की जानकारी मिलने पर बाकेल का दौरा किया और लोगों से बातचीत करके बीमारी के कारणों का पता लगाया. इन छात्रों ने जब वहां पेयजल की जांच की तो उन्होंने पाया कि उसमें बड़ी मात्रा में फ्लोराइड है. इस जांच दल ने अपनी रिपोर्ट जब स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार को भेजी तो हड़कंप मच और तब जाकर प्रशासन हरकत में आया. लेकिन नतीजे ने ढाक के वही तीन पात वाली कहावत को ही चरितार्थ किया. स्वास्थ्य विभाग की महिला सुपरवाइज़र कुमुदनी मांडावी, एक पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता और उप अभियंता सुरेंद्र सिंह एवं आर एस साहू को निलंबित करके शासन ने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली. जबकि पीड़ित लोगों के सहायतार्थ सरकार की ओर से कोई क़दम नहीं उठाया गया.

बाकेल गांव से छह किलोमीटर की दूरी पर भानुपरी में तीस बिस्तरों वाला एक शासकीय अस्पताल है और 25 किलोमीटर की दूरी पर बस्तर विकास खंड में खंड चिकित्सा केंद्र एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का कार्यालय है, जहां खंड चिकित्सा अधिकारी एवं खंड प्रसार प्रशिक्षक सहित स्वास्थ्य विभाग का एक बड़ा अमला कार्यरत है. विभागीय सूत्र बताते हैं कि खंड प्रसार प्रशिक्षक से उनका मूल काम न लेकर लेखाकार का कार्य छह वर्षों से इसलिए लिया जा रहा है, क्योंकि वह शासकीय धनराशि के समायोजन में माहिर माने जाते हैं. जबकि असल में उनका काम क्षेत्र में योजनाओं की निगरानी और फैलने वाली बीमारियों के बारे में विभाग को तत्काल सूचित करना है. लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का अनु विभागीय अधिकारी एवं अन्य अमला भी बस्तर में तैनात है, जिसकी ज़िम्मेदारी है कि वह शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. हालांकि इसके लिए कार्यपालन अभियंता ज्यादा ज़िम्मेदार है.

चिकित्सकों के अनुसार, फ्लोरेसिस नामक यह बीमारी पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण होती है. फ्लोराइडयुक्त पानी नियमित रूप से पीने अथवा ज़्यादा मात्रा में इस्तेमाल करने से यह बीमारी दांतों से उत्पन्न होती है और फिर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाती है. अधिक मात्रा होने पर मनुष्य की हड्डियों में दर्द शुरू हो जाता है और वह खड़े होने की स्थिति में भी नहीं रहता. चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी का कोई उपचार नहीं है. फ्लोराइडयुक्त पानी छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में पाया जाता है, जिसमें बस्तर भी शामिल है. सरकार शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये व्यय कर रही है और इस कार्य के लिए अलग से एक मंत्रालय भी बनाया गया है. संयोग से उसके मंत्री प्रभावित क्षेत्र के क़रीब के रहने वाले हैं.

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग का काम नलकूप खनन करके परीक्षण के उपरांत शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करना है, लेकिन पिछले 5-6 वर्षों से जनता फ्लोराइडयुक्त पानी पीने के लिए मजबूर है. इसी वजह से इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमारी से ग्रस्त हैं. जल का परीक्षण क्यों नहीं कराया गया, जबकि विभाग का यह प्रथम कर्तव्य है, इस सवाल का जवाब कार्यपालन यंत्री से लेकर मंत्री तक किसी के पास नहीं है. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के इस बीमारी से पीड़ित होने पर मचे बवाल पर पर्दा डालने के लिए कलेक्टर ने दो कार्यपालन यंत्रियों की रिपोर्ट पर विभाग के दो उप यंत्रियों सुरेंद्र सिंह और आर एस साहू को निलंबित कर दिया और बिना कोई आरोपपत्र दिए 45 दिनों के बाद बहाल भी कर दिया. जबकि मुख्य रूप से कार्यपालन यंत्री ही ज़िम्मेदार होता है. उप यंत्रियों को मोहरा बनाकर शेष दोषी लोगों को बचा लिया गया और मामले पर राख डाल दी गई. जब यह स्थिति विभागीय मंत्री के गृहग्राम के बगल के गांव की है तो राज्य के अन्य दूसरे इलाक़ों का क्या हाल होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

पंचायतों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए पूर्ण अधिकार दिए गए हैं. गांव की समस्याएं कैसे हल करनी हैं, यह काम उन पर छोड़ दिया गया है. पांच वर्ष पूर्व विभाग द्वारा पानी के परीक्षण के लिए किटें बांटी गई थीं, किंतु पंचायत पदाधिकारियों ने बिना निजी फायदे के इस कार्य में कोई रुचि नहीं ली. अंचल की पंचायतों के सचिव सरपंचों की अशिक्षा का भरपूर लाभ उठाते हैं. उनका ध्यान जनसमस्याओं के निराकरण में कम और शासकीय धनराशि को हड़पने में ज़्यादा रहता है. समस्याएं उत्पन्न होने का एक कारण यह भी है. देश में भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक नासूर की तरह फैल गया है, जिसका असर संसद से लेकर गांव तक देखा जा रहा है. यही वजह है कि पंचायतों में भी शासकीय धन की बेख़ौ़फ बंदरबांट हो रही है नेता और अधिकारी एक-दूसरे को बचाने में लगे रहते हैं. जनता की शिक़ायत पर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती. पीएचई का अमला भी मूल काम के बजाय शासकीय धन के समायोजन में ज़्यादा दिलचस्पी रखता है. स्वास्थ्य विभाग की निष्क्रियता का हाल यह है कि यहां हर कोई मुफ्त का वेतन उठाना चाहता है और शासकीय राशि हड़पने की योजना में जुटा रहता है.

दूषित पानी पीने से 19 लोग विकलांग हो गए हैं. उन्हें मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी ने फ्लोरेसिस प्रभावित मानकर प्रमाणित किया है. लेकिन इनकी ज़िंदगी कैसे बसर होगी, इस ओर न विभाग और न  सरकार की तऱफ से मदद के कोई संकेत हैं. तीन से लेकर 11 वर्ष तक के इन बच्चों के सामने पहाड़ सा जीवन है. विकलांग बच्चे जब वयस्क होंगे तो उनसे विवाह कौन करेगा? वे अपना जीवनयापन कैसे करेंगे? ऐसे तमाम सवाल लोगों के सामने मुंह बाए खड़े हैं. 11 वयस्क लोग भी इस बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें तीन महिलाएं और आठ पुरुष हैं. विकलांगता के चलते प्रजनन क्षमता पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका है. नक्सलवाद की वजह से आदिवासियों की जनसंख्या में काफी कमी आई है. हंगामे के बाद इस बीमारी की रोकथाम के लिए शासन ने बाकेल में फ्लोराइड रिमूवल संयंत्र लगाए हैं. फ्लोराइड प्रभावित ग्राम संघ करमरी, धुरावंड, तुरपुरा, केशरपाल, कुम्हली, सलना बबई, बावनी मारी और चंदेली में भी संयंत्र लगाने के लिए 42 लाख रुपये की प्रथम किस्त जारी की गई है, लेकिन विकलांगों को किसी प्रकार के मुआवज़े अथवा शासकीय मदद की कोई ख़बर नहीं है.

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