महंगाई ने लोगों का जीना दूभर कर दिया है. अब जो सबसे बड़ा सवाल है, वह यह है कि एक प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों में देश की कमान होते हुए भी इस समस्या का निदान क्यों नहीं हो रहा है. हालत यह है कि देश के मध्यम एवं निम्न वर्ग के लोगों की ज़िंदगी की गणित गड़बड़ा गई है. विशेषज्ञ बताते हैं कि मनुष्य की मूलभूत ज़रूरतों की मांग और आपूर्ति के बीच के फासले से ही महंगाई ने उग्र रूप धारण किया है, जिसके हाल-फिलहाल में ठीक होने की उम्मीद कम है. दुनिया भर से एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि चीन, वियतनाम, श्रीलंका एवं ब्राज़ील सरीखे देशों में भी खाद्य पदार्थों की क़ीमतें लगातार बढ़ रही हैं. अल्ज़ीरिया में तो खाद्य सामग्री को लेकर दंगे हुए हैं. रूस जैसे बड़े गेहूं उत्पादक देश में मौसम की मार के कारण इस वर्ष गेहूं के उत्पादन में पांच फ़ीसदी गिरावट आने का अनुमान है. हाल में भारत आए चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने भी स्वीकारा था कि उनका देश भी महंगाई से परेशान है. और तो और, अमेरिका की कहानी भी बिगड़ रही है.
बीते वर्ष प्रमुख औद्योगिक देशों (अमेरिका, कनाडा, इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान) के वित्त मंत्रियों ने कनाडा में एक बैठक की, जिसमें केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने हिस्सा लिया. बैठक में महंगाई और मंदी से निपटने के लिए तमाम मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा हुई, लेकिन नतीजा कुछ ख़ास नहीं निकला. बैठक के बाद कनाडा के वित्तमंत्री जिम फ्लेहर्टी ने कहा कि वैश्विक आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है.
महंगाई ने दुनिया को इस कदर परेशान कर दिया कि बीते वर्ष प्रमुख औद्योगिक देशों (अमेरिका, कनाडा, इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान) के वित्त मंत्रियों ने कनाडा में एक बैठक की, जिसमें केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने हिस्सा लिया. बैठक में महंगाई और मंदी से निपटने के लिए तमाम मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा हुई, लेकिन नतीजा कुछ ख़ास नहीं निकला. बैठक के बाद कनाडा के वित्तमंत्री जिम फ्लेहर्टी ने कहा कि वैश्विक आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है. हालांकि अब तक सुधार की प्रक्रिया मज़बूत नहीं हुई है. आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) विकसित देशों का संगठन है, जिसमें अमेरिका और जापान जैसे देश शामिल हैं. वैश्विक उत्पादन में इन देशों का 60 फीसदी से अधिक योगदान है, लेकिन ओईसीडी के हाल के आंकड़े बताते हैं कि इन देशों में बेरोज़गारी उच्च स्तर पर है. स्पेन में सर्वाधिक बेरोज़गारी दर 20.6 फीसदी रही. इसके बाद क्रमश: स्लोवाक रिपब्लिक (14.5 फीसदी) और आयरलैंड (13.9 फीसदी) का स्थान रहा. जर्मनी में बेरोज़गारी दर 6.7 फीसदी देखी गई. कनाडा, फिनलैंड, कोरिया और स्वीडन में बीते नवंबर महीने में बेरोज़गारी दर में हल्की कमी दर्ज की गई है. जबकि ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य, डेनमार्क, फ्रांस, हंगरी और लक्जमबर्ग में वृद्धि दर्ज की गई.
आम तौर पर आयात और निर्यात के बीच बेहद चौड़ी खाई को घरेलू स्तर पर आयातित उत्पादों की मांग घटाकर पाटा जाता है. इसके लिए मुद्रा की क़ीमत महंगी की जाती है. क़र्ज़ की मांग घटाने के लिए भी केवल यही रास्ता बचता है. फिलहाल क़र्ज़ की मांग 24 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक 20 फीसदी तक लाना चाहता है. वैश्विक बाज़ारों में जिंसों की बढ़ती क़ीमतों की चुनौती अभी बरक़रार है. यह एक बड़ा कारण है, जिसके चलते रिज़र्व बैंक स्थानीय स्तर पर क़ीमतों को थामने के लिए अपनी नीतियां सख्त करेगा. वह बैंक दरों में 25 आधार अंकों की बढ़ोत्तरी कर सकता है. बैंकों को इस वर्ष नीतिगत दरों में भी इज़ा़फा करना होगा, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे यहां मुद्रा स्फीति की चुनौती की वजह मौद्रिक विस्तार कतई नहीं है. चूंकि मुद्रा स्फीति पर पड़ रहे तमाम दबाव मांग के कारण नहीं हैं. अत: रिज़र्व बैंक इससे निपट सकता है, क्योंकि नीतियां सख्त करने से विकास पर विपरीत असर पड़ेगा.
पिछले दिनों केंद्र सरकार के मंत्री समूह की बैठक हुई, जिसमें महंगाई से निपटने के उपायों पर विचार हुआ. कहा गया कि सरकार महंगाई से लड़ना चाहती है, लेकिन विकास की क़ीमत पर नहीं. सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पेश करने के लिए प्रतिबद्ध है, इससे बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिलेगी. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग हर दिन भूखे रह जाते हैं और विश्व की जनसंख्या का छठा हिस्सा भूखा सोता है. कोई भी देश इससे अछूता नहीं है. खाद्यान्नों की उत्तरोत्तर कमी होती जा रही है. इस वक़्त दुनिया में उपलब्ध कृषि योग्य ज़मीन बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न पैदा करने की दृष्टि से अपर्याप्त है. 2050 तक खाद्यान्न उत्पादन में कम से कम 70 फ़ीसदी की वृद्धि की आवश्यकता होगी, क्योंकि अनुमान है कि अगले चार दशकों में दुनिया की आबादी बढ़कर नौ अरब हो जाएगी. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि दुनिया की वर्तमान कृषि योग्य ज़मीन की पैदावार अगर बढ़ाई जाती है तो भी 2050 तक कम से कम 37 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार होंगे.
आज भारत विश्व शक्ति बनकर उभरने का दावा कर रहा है, फिर भी देश में हर चौथा व्यक्ति भूखा है. भारत में अनाज की उपलब्धता पर जारी एक रिपोर्ट में ऐसा दावा किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश में तक़रीबन 21 करोड़ से अधिक लोगों को भर पेट भोजन नहीं मिल पाता है. संख्या के अनुपात में यह अफ्रीका के सबसे ग़रीब देशों से भी ज़्यादा है. सच तो यह है कि एक आम आदमी को प्रति वर्ष मिलने वाली खाद्य सामग्री पिछले 10 वर्षों के भीतर 34 किलो कम हो गई है. वैश्विक आर्थिक संभावनाएं-2011 शीर्षक से प्रकाशित अपनी ताजा रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा है कि विश्व की अर्थव्यवस्था वर्ष 2011 और 2012 में धीमी गति के साथ, लेकिन मज़बूती से बढ़ने की दिशा में है. अनुमान है कि इस दौरान वैश्विक आर्थिक वृद्धि में क़रीब आधा योगदान चीन और भारत का होगा. विश्व बैंक ने अपने अनुमान में कहा है कि वैश्विक जीडीपी 2010 के 3.9 प्रतिशत के मुक़ाबले 2011 में घट कर 3.3 प्रतिशत रहेगी. 2012 में इसके फिर से 3-6 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है. रिपोर्ट के अनुसार, 2010 में विकाशील देशों की वृद्धि दर सात प्रतिशत रही. 2011 और 2012 में इसके 6 प्रतिशत रहने की संभावना है. उधर भारतीय वित्त मंत्रालय उम्मीद कर रहा है कि देश आगामी वित्तीय वर्ष से 9 फीसदी से अधिक विकास दर हासिल कर लेगा. हालांकि इस दर को प्राप्त करने की राह उतनी आसान भी नहीं होगी, क्योंकि पश्चिम एशिया में व्याप्त अस्थिरता, वैश्विक अर्थव्यवस्था के वापस पटरी पर लौटने को लेकर जताई जा रही अनिश्चितता और कई अन्य कारक भारत की उम्मीदों पर पानी फेर सकते हैं.
|
|
|









