नैतिक, रचनात्मक और राजनीतिक ज़िम्मेदारी

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प्रजातंत्र में कोई भी सरकार तब तक प्रजातांत्रिक नहीं मानी जा सकती, जब तक वह अपने देश के नागरिकों के प्रति उत्तरदायी न हो, क्योंकि वह उन्हीं के लिए और उन्हीं के नाम पर राज्य करती है. एक संसदीय व्यवस्था में वह संसद के प्रति उत्तरदायी होती है. चलिए, बात शुरू से करते हैं. जब 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की बात चल रही थी तो बहुत ही दोमुंही बातें सुनने को मिलीं. पहली यह कि प्रधानमंत्री को इस बात की हवा तक नहीं थी कि आख़िर दूरसंचार मंत्रालय में चल क्या रहा था. इस बात पर लोगों को विश्वास नहीं हुआ. तब बात आई कि प्रधानमंत्री ने तो अपने मंत्री को अपने विचार बता दिए थे कि वह उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन मंत्री ने उनकी बात की अनदेखी कर दी और अपने मन से सारा काम किया.

ख़ानापूर्ति तब चालू हुई, जब देश के सर्वोच्च लेखा अधिकारी की रिपोर्ट जनता के सामने आ गई. इस ख़ानापूर्ति के दो पहलू थे. पहला तो यह कि दूरसंचार नीति में कोई ख़राबी नहीं है, बस इस नीति के क्रियान्वयन में ही सारी हेराफेरी की गई थी. दूसरी यानी राजनीतिक पटल पर यह कहा गया कि प्रधानमंत्री इस घोटाले की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हैं, लेकिन इस ज़िम्मेदारी में से सारे ज़िम्मेदाराना पहलू कमज़ोर कर दिए गए.

ख़ानापूर्ति तब चालू हुई, जब देश के सर्वोच्च लेखा अधिकारी की रिपोर्ट जनता के सामने आ गई. इस ख़ानापूर्ति के दो पहलू थे. पहला तो यह कि दूरसंचार नीति में कोई ख़राबी नहीं है, बस इस नीति के क्रियान्वयन में ही सारी हेराफेरी की गई थी. दूसरी यानी राजनीतिक पटल पर यह कहा गया कि प्रधानमंत्री इस घोटाले की नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हैं, लेकिन इस ज़िम्मेदारी में से सारे ज़िम्मेदाराना पहलू कमज़ोर कर दिए गए. प्रधानमंत्री ने अपनी कमज़ोरी गठबंधन धर्म के नाम पर जनता के  सामने पेश कर दी, लेकिन यह सारी बातें उस समय धरी की धरी रह गईं, जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जांच में कई गड़े मुर्दे उठ खड़े हुए. इसके बाद बारी आई अंतरिक्ष विभाग की और धांधली के रुपहले परदे पर आई एंट्रिक्स-देवास डील. शुरू से ही किसी और मंत्रालय पर इसका दारोमदार डालने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी, इसलिए उत्तरदायित्व और ज़िम्मेदारी के प्रश्न को ही ख़त्म करते हुए इस डील को रद्द कर दिया गया. इसे रद्द करने से उठने वाले न्यायिक बवंडर को सत्ता के हथियार से दबा दिया गया, लेकिन अब भी सब ख़त्म नहीं हुआ है. असली ड्रामा तो तब शुरू होगा, जब दूसरा पक्ष भारत सरकार को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाएगा. मंत्रालय के स्तर पर तो ज़िम्मेदारी का प्रश्न दबा दिया गया, लेकिन वहां पर देश की ज़िम्मेदारी को दरकिनार करना मुश्किल होगा.

अब बात करते हैं इन सबसे ज़्यादा पेचीदे सवाल की. यह सवाल है चीफ विजिलेंस कमिश्नर की नियुक्ति का. यह एक ऐसा निर्णय था, जिसे स्वयं प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में उस कमेटी ने लिया था, जिसमें उनके गृहमंत्री भी थे और देश के विपक्ष की नेता भी. एक ऐसे भूतपूर्व दूरसंचार सचिव की नियुक्ति की गई, जिसके नाम पर विपक्ष की नेता ने उंगली उठाई थी. यह नियुक्ति तब की गई थी, जब 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला भले ही जनता के सामने नहीं आया था, लेकिन इसके बारे में सुगबुगाहट तेज़ थी. इस मामले में प्रधानमंत्री न तो अपने किसी मंत्री पर दायित्व टाल सकते हैं और न स़िर्फ नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर भाग सकते हैं. यह भी नहीं कहा जा सकता है कि इस बात से देश को कोई हानि नहीं पहुंची, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने साफ़ कह दिया है कि यह नियुक्ति और इसके पीछे का निर्णय ग़ैर क़ानूनी है. इसकी वजह से जनता की नज़रों में सीवीसी जैसे उच्च संवैधानिक पद की गरिमा का हनन हुआ.

इस बात पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वह अपनी ज़िम्मेदारी क़ुबूल करते हैं. बहुतों ने चैन की सांस ली कि कम से कम इस मामले में उन्होंने बस नैतिक ज़िम्मेदारी का नाम नहीं लिया और न गठबंधन धर्म की दुहाई दी. इसलिए यह बात तो साफ़ है कि सीवीसी की नियुक्ति में हुए घोटाले की ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री के सिर पर है. जो गड़बड़ हुई और उसकी वजह से जो नुक़सान हुआ, वह सब सभी के सामने है. अब ऐसा है तो प्रधानमंत्री की नीयत पर साफ़-साफ़ शक होता है. भारत का गौरवशाली इतिहास इस बात का गवाह है कि एक रेल मंत्री ने एक रेल चालक की लापरवाही से हुई दुर्घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी ली थी. उन्होंने बिना कोई स़फाई दिए तुरंत पद छोड़ दिया था. दशकों बाद आज यह स्थिति है कि सत्ताधारियों और शासन द्वारा लिए गए निर्णय पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप बनकर रह गए हैं, जिनमें पब्लिक बहुत कम है और प्राइवेट बहुत अधिक. आज हम व्यक्तिगत गोपनीयता के नाम पर घोटाले होते देख रहे हैं.

समय वास्तव में बदल गया है, लेकिन आज भी संसदीय प्रजातंत्र चल रहा है और इस नाते यह बिल्कुल नाक़ाबिले बर्दाश्त है कि किसी बहुत बड़ी राजनीतिक ग़लती पर स़िर्फ एक ज़िम्मेदार राजनीतिक व्यक्ति अपनी ग़लती स्वीकार कर ले. असल में अगला सही क़दम होना चाहिए उस ज़िम्मेदार व्यक्ति का इस्ती़फा. आज अगर विपक्ष प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा लेने में नाकामयाब रहा तो उसके सिर पर भी देश के प्रजातंत्र की हत्या का इल्ज़ाम रहेगा. यह मुद्दा स़िर्फ विपक्ष और सत्ताधारी पार्टी के बीच का मामला नहीं है, यह संसद में मीठे शब्दों के आदान-प्रदान से आपसी भाईचारे को बनाए रखने का मामला नहीं है, ऐसा भी नहीं है कि विपक्ष द्वारा इस्तीफ़ा मांगने पर कांग्रेस के भीतर प्रधानमंत्री के विरोध को भुलाकर पार्टी उनके साथ खड़ी नज़र आएगी. पार्टियां तो अपना काम वैसे ही करती रहेंगी, जैसे आज तक करती आई हैं, लेकिन मुद्दा है विपक्ष के इम्तिहान का. अगर विरोधी पक्ष भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा से अलग अन्य कारणों पर ध्यान देगा तो यह तय है कि विपक्ष भी सत्ता पक्ष की तरह दोमुंहा दिखाई पड़ेगा.

 लेखक भारत के वाणिज्‍य एवं वित्त सचिव रह चुके हैं

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