पर्व नहीं,हम बदले हैं

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बात ज्यादा पुरानी नहीं है. यही कोई सात-आठ साल पहले मैं कानपुर (उत्तर प्रदेश) से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक में कार्यरत था. होली का मौका था, मैं घर पर अपने कमरे में बैठा पुराने अ़खबार पलट रहा था. अचानक मैंने किसी को कुछ अटपटा सा बोलते सुना तो कान उसी तऱफ केंद्रित हो गए, सगरे तीज-त्योहारन मा आग लागी जाय रही…ई होली है? कहां ते लागत है? ई महंगाई तो खाय जाई सबका…

स़िर्फ महंगाई बढ़ने से ही त्योहार फीके नहीं पड़े, बल्कि कहीं कुछ और भी घटता जा रहा है हमारे अंदर और हमारे बीच, जो हमें अपनी संस्कृति, तीज-त्योहारों और परंपराओं से लगातार दूर करता जा रहा है.

त्योहारों के बदलते स्वरूप के लिए अपने चिर परिचित ठेठ अंदाज़ में महंगाई को कोसने वाला और कोई दूसरा अथवा सिरफिरा नहीं था, बल्कि पड़ोस में रहने वाली मुहल्ला मौसी रामवती थीं, जिनकी नज़र में दैनिक ज़रूरत की वस्तुओं के दामों में होने वाली बढ़ोतरी ही तीज-त्योहारों की रौनक़ हरने की दोषी थी. किसी हद तक उनकी सोच सही भी थी. किसी बात की वजह तलाशने का उनका अपना एक पैमाना था, क्योंकि एक आम अनपढ़, सीधी-सादी बुज़ुर्ग महिला की समझ का दायरा ही कितना बड़ा होता है.

लेकिन, मौसी को यह कतई नहीं भान था कि स़िर्फ महंगाई बढ़ने से ही त्योहार फीके नहीं पड़े, बल्कि कहीं कुछ और भी घटता जा रहा है हमारे अंदर और हमारे बीच, जो हमें अपनी संस्कृति, तीज-त्योहारों और परंपराओं से लगातार दूर करता जा रहा है. रही महंगाई की बात, तो आज से सात बरस पहले रसोई और जेब की हालत इतनी बदतर नहीं थी. ज़रूरत की चीजें और बाकी ज़िम्मेदारियां किसी न किसी तरह पूरी हो जाती थीं, लेकिन अब सोचना पड़ता है. एक नहीं, कई बार. क्या करें, क्या न करें की स्थिति से निकलना अब आसान नहीं होता. वैसे भी त्योहार स़िर्फ समर्पण मांगते हैं, धन की उन्हें कोई विशेष दरकार नहीं होती. वे तड़क-भड़क के भूखे नहीं हैं और न ही शाह़खर्ची के हिमायती. वे तो बस इतना चाहते हैं कि आप पूरी ईमानदारी के साथ उठकर उनका स्वागत करें.

स़िर्फ होली ही नहीं, हर त्योहार अपनी चमक, अपनी उमंग खोता जा रहा है. अब तो स़िर्फ एक धुंध बची है औपचारिकता की, जिसने सारे उल्लास को अपने दामन में छिपा लिया है. ज्यादा दूर जाने की बात नहीं है, बीती 8 फरवरी को वसंत पंचमी थी. स्कूलों और कुछ संस्थाओं में भले ही सरस्वती पूजन के कार्यक्रम हो गए हों, लेकिन घर और परिवार के स्तर पर कहीं कुछ विशेष होता नहीं दिखा. मुझे अपना बचपन अच्छी तरह याद है. वसंत पंचमी के दिन पूरे मुहल्ले के तन पर वसंती कपड़े दिखते थे. इस दिन विशेष के लिए रसोई के झाड़न, परदे और पोछे तक वसंती रंग में रंग दिए जाते थे, लेकिन अब वह बात और त्योहारों के प्रति वह उत्साह कहीं नहीं दिखता. दिल्ली तो खैर मेट्रो सिटी है, यहां जीवन की भागदौड़ की गति भी सामान्य से कहीं ज्यादा है, सो तीज-त्योहारों में कृत्रिमता का पैठना स्वाभाविक है, लेकिन दीगर शहर, यहां तक कि गांव भी अब इस अनापेक्षित परिवर्तन से अछूते नहीं रहे.

एक समय था कि त्योहारों पर घरों की दीवार रूपी विभाजक रेखा दरकिनार कर पूरा मुहल्ला या गांव कुछ इस क़द्र एकाकार हो जाता था, मानों कोई बड़ा परिवार किसी खास आयोजन की तैयारी में जुटा हुआ है. लेकिन अब तो त्योहार घर की चाहरदीवारी में ही सिमट गए हैं, बल्कि वहां भी सकुचते जा रहे हैं. मानों वे खुद ही अति से ज्यादा महत्वाकांक्षी हो चुके मानव से दूर हो जाना चाहते हों. पर्व आता है बाद में, बाज़ार हावी हो जाता है पंद्रह-बीस दिन पहले से ही दिल और दिमाग़ पर. त्योहार बनाइए जानदार-गिफ्ट दीजिए शानदार जैसे स्लोगन अपनी कुटिल मुस्कराहट के साथ जन सामान्य को लूटने के लिए मुस्तैद हो जाते हैं. उधर अति आधुनिक बनने और दिखने की आधारहीन लालसा पाले बैठे लोग त्योहार में शान पैदा करने के चक्कर में बाज़ार के हाथों लुट-पिटकर लौट आते हैं. और, जब होश आता है तो मायूसी उनके सामान्य दिनों की सीमित खुशियां भी छीन लेती है, त्योहार गया भाड़ में. होली में घरों में रात-रात भर जागकर बनने वाली गुझिया और पिचक्के कहीं गुम हो गए हैं और दीवाली में मिट्टी के दीपक. उनका स्थान तोताराम के रसगुल्लों एवं चीन से आई झालरों ने ले लिया है. मानों प्रकृति से नाता बिल्कुल खत्म. मनसा-वाचा-कर्मणा सब कुछ कृत्रिम.प्रगति की यह कैसी अंधी दौड़ है? बच्चों से पूछो कि होली का त्योहार हम क्यों मनाते हैं? दीवाली और दशहरा मनाने के पीछे क्या वजह है? रक्षाबंधन किस बात का प्रतीक है? तो वे इन सवालों का कोई सटीक जवाब दे पाने में हिचकिचाते हैं, बचने की कोशिश करते हैं, भटक से जाते हैं. वे यह तो बता देते हैं कि मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रैंडशिप डे और न जाने कौन-कौन से डे कब और क्यों मनाए जाते हैं तथा उन मौक़ों पर क्या-क्या किया जाता है. उन्हें यह सब बताने में कोई भी मुश्किल पेश नहीं आती. कौन ज़िम्मेदार है इस स्थिति का? बच्चे तो क़तई नहीं, क्योंकि जब हम और आप उन्हें बताएंगे ही नहीं, तो वे भला कैसे समझेंगे कि कौन-सा त्योहार कब, क्यों और कैसे मनाया जाता है तथा उनके पीछे मक़सद क्या है? जब वे कोई पाठ ही नहीं पढ़ेंगे, तो उनसे कोई सबक़ सीखने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है? जब आप खुद उन्हें जन्म से ही प्रकृति से दूर कर देंगे तो कृत्रिमता खुद-ब़खुद उनके जीवन की एक ज़रूरत बन जाएगी. उन्हें उनकी ज़मीन से, संस्कृति से कौन दूर कर रहा है? स़िर्फ आप और हम. पैसों की खनक ने वास्तविक खुशियों से हमारा नाता तोड़ दिया है. कहने का मक़सद मात्र इतना है कि आज की भागमभाग ज़िंदगी में पर्वों के रूप में जो पल-दो पल हमें अपनी खामियां समझने, प्रकृति से जुड़ने और भविष्य का रास्ता तय करने के लिए मिलते हैं, उन्हें हम महज़ मनोरंजन अथवा शान बघारने का मौक़ा भर न समझें, वरन्‌ उन पर्वों की महत्ता और उनके संदेशों पर मनन करें. साथ ही नई पीढ़ी को यह समझाएं कि पर्व हमारे लिए ज़रूरी क्यों हैं, उन्हें कैसे मनाना चाहिए और उनसे सीखना क्या चाहिए?

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