बीती 22 फ़रवरी को सत्र न्यायालय ने गोधरा रेल आगज़नी मामले में अपना फैसला सुनाया. अदालत ने गुजरात सरकार के इस आरोप को सही ठहराया कि स्थानीय मुसलमानों ने साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने का षड्यंत्र रचा था. जिन 94 आरोपियों पर मुक़दमा चल रहा था, उनमें से 63 को बरी कर दिया गया और 31 को साज़िश के तहत कारसेवकों को ज़िंदा जलाने का दोषी ठहराया गया. गोधरा कांड को साज़िश बताने वाले पहले व्यक्ति थे गुजरात के तत्कालीन एवं वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी. वह घटना के आधे घंटे के भीतर इस निष्कर्ष पर पहुंच गए थे. उन्होंने कहा था कि गोधरा कांड के पीछे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन थे, जिन्होंने स्थानीय मुसलमानों की मिलीभगत से इसे अंजाम दिया था. इन मुसलमानों को पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई का सहयोग भी हासिल था. गोधरा की तत्कालीन कलेक्टर जयंती रवि ने घटना के पीछे कोई साज़िश होने की आशंका से इंकार किया था. गोधरा जैसी बड़ी रेल दुर्घटनाओं की रेलवे आवश्यक रूप से आंतरिक जांच कराता है, परंतु तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने इस घटना की जांच किए जाने के आदेश नहीं दिए. वह उन दिनों भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन सरकार में शामिल थे.
गोधरा कांड के पीछे मुस्लिम आतंकी षड्यंत्र होने के आरोप का जमकर प्रचार किया गया और फिर उसका इस्तेमाल गुजरात में हुए मुसलमानों के क़त्लेआम को उचित ठहराने के लिए किया गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि गुजरात इसलिए हुआ, क्योंकि गोधरा हुआ था. उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने गुजरात में मोदी के समर्थन में चुनाव प्रचार किया. वह उन दिनों भाजपा के ख़ेमे में थीं. गुजरात क़त्लेआम के बारे में मायावती ने तब कहा, गोधरा भी तो हुआ था! बाद में केंद्र में यूपीए की सरकार बनी और रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने गोधरा कांड की जांच के आदेश दिए. रेलवे के लिए यह क़ानूनन ज़रूरी है कि वह हर बड़ी दुर्घटना की जांच कराए. गोधरा के मामले में यह ज़िम्मेदारी वर्षों बाद पूरी की गई. जांच के लिए बनर्जी आयोग बना, जो इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गोधरा कांड किसी षड्यंत्र का नतीजा नहीं था.
गोधरा कांड को षड्यंत्र साबित करने के लिए गुजरात पुलिस ने कई गवाह ढूंढ निकाले. उन्हें यह स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया कि उन्होंने 140 लीटर पेट्रोल ख़रीदा, पेट्रोल रेलवे लाइन तक पहुंचाया, एस-6 एवं एस-7 के बीच के वेस्टीब्यूल को काटा, एस-6 में पेट्रोल फैलाया और फिर बाहर से आग के जलते हुए गोले फेंक कर कोच में आग लगा दी. हालिया निर्णय में यह तो स्वीकार किया गया है कि गोधरा के पीछे षड्यंत्र था, परंतु गुजरात सरकार द्वारा मुख्य षड्यंत्रकारी घोषित किए गए हाजी उमर जी को बेक़सूर बताया गया है. अन्य प्रमुख आरोपियों के ख़िला़फ भी कोई सुबूत नहीं पाए गए. केवल ये तथ्य ही निर्णय का खोखलापन सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं. गोधरा को षड्यंत्र बताने का मुख्य आधार यह है कि पेट्रोल बेचा-ख़रीदा गया और एस-6 में आग के गोले फेंके गए. इन दोनों घटनाओं का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. जिन लोगों ने पहले स्वीकार किया कि उन्होंने पेट्रोल बेचा, वे भी अदालत में अपने बयान से मुकर गए और एक ने तो यह कहा कि गवाही के लिए उसे 50 हज़ार रुपये दिए गए थे, उसे यह राशि गुजरात पुलिस के मुख्य जांचकर्ता परमार ने दी थी. ज़ाहिर है, षड्यंत्र की कहानी में छलनी से भी ज़्यादा छेद हैं.
यह आरोप कि मुसलमानों ने बाबरी कांड का बदला लेने के लिए कारसेवकों को ज़िंदा जलाया, कई कारणों से तार्किक नहीं लगता. पहली बात तो यह है कि मुसलमानों को ही नहीं, बल्कि शासन तंत्र को भी पता नहीं था कि साबरमती एक्सप्रेस में कारसेवक यात्रा कर रहे थे. केवल विहिप के नेताओं को जानकारी थी. दूसरे, उस दिन साबरमती एक्सप्रेस पांच घंटे से अधिक देरी से चल रही थी. ट्रेन का गोधरा पहुंचने का सही समय आधी रात के आसपास है. किसी भी षड्यंत्रकारी के लिए अचानक सामने आई ऐसी परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाना कठिन होता है. तीसरे, जिस समय वेस्टीब्यूल काटा जा रहा था, उस समय आरपीएफ और जीआरपी के जवान क्या कर रहे थे? वेस्टीब्यूल को काटना और फिर उसमें घुसना कोई आसान काम नहीं होता. चौथे, ठंड के मौसम में (घटना फरवरी 2002 की है) पौ फटने के पहले कोच के खिड़की-दरवाज़े बंद रहे होंगे. ऐसे में बाहर से आग के गोले अंदर कैसे फेंके गए? पहले प्रचार किया गया था कि ट्रेन मुसलमानों ने रोकी थी. बाद में हुई जांचों में यह सामने आया कि ट्रेन दो बार रुकी, पहली बार कारसेवकों द्वारा चेन खींचे जाने से और दूसरी बार किसी तकनीकी ख़राबी से. यह भी कहा गया कि कारसेवक भाग न सकें, इसलिए कोच के दरवाज़े बाहर से लॉक कर दिए गए थे. यह दावा करने वाले शायद भूल गए कि रेलों के यात्री डिब्बों में बाहर से दरवाजे लॉक करने की कोई व्यवस्था ही नहीं होती.
इस आरोप पर संदेह करने के पर्याप्त आधार हैं कि गोधरा कांड के पीछे मुसलमानों का षड्यंत्र था. गोधरा प्लेटफार्म पर खानपान सामग्री बेचने वाले हिंदू वेंडर अजय बारिया को भी षड्यंत्र में शामिल कर लिया गया. जज पटेल ने अजय के बयान को बहुत महत्व दिया. सवाल यह है कि मुस्लिम षड्यंत्रकारी अंतिम समय में किसी हिंदू को षड्यंत्र में शामिल क्यों करेंगे? वे पेट्रोल ढोने और कोच जलाने में उसकी मदद क्यों लेंगे? अजय की मां ने बताया कि पुलिस ने ज़बरदस्ती उसे गवाह बनने पर मजबूर किया था और पुलिस उस पर लगातार नज़र रखती है. एक पेट्रोल पंप के कर्मचारियों रंजीत सिंह एवं प्रताप सिंह पटेल ने दावा किया था कि 26 फ़रवरी को उन्होंने कुछ मुसलमानों को 140 लीटर पेट्रोल बेचा था. इन दोनों ने पहले पुलिस को यह बताया था कि उन्होंने उस रात किसी को पेट्रोल नहीं बेचा. छह महीने बाद वे अपनी बात से पलट गए. प्रताप ने कहा कि पुलिस अधिकारी परमार ने उन दोनों को बयान बदलने के लिए 50 हज़ार रुपये दिए थे. परमार ने उन्हें यह भी बताया था कि अदालत में उन्हें किन मुसलमानों को पेट्रोल के ख़रीददार के तौर पर पहचानना है.
जबीर बहेरा नामक एक अपराधी ने पहले कहा कि मौलवी उमर जी ने ही एस-6 को निशाना बनाने का निर्णय लिया था, परंतु बाद में वह अपने दावे से पीछे हट गया. एक अन्य मामूली अपराधी सिकंदर सिद्दीक़ीने कहा कि मौलवी पंजाबी ने भीड़ को उकसाया था, परंतु पंजाबी उस दिन देश में ही नहीं थे.
लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक है
|
|
|









