हिच्हाइकर्स गाइड टू द गैलेक्सी के दीवाने यह जानते हैं कि ज़िंदगी का रहस्य क्या है? उनके मुताबिक़, यह एक जादुई संख्या 42 है. इसी तरह यूपीए सरकार के पास भी एक जादुई संख्या है. यह जादुई संख्या जीडीपी विकास दर है. जब भी सरकार किसी मुसीबत में ख़ुद को पाती है, तब उस व़क्त यही जीडीपी उसके लिए आशा की किरण बन जाती है. 2010-2011 के लिए जीडीपी विकास दर 8.6 फीसदी से ज़्यादा रहने का अनुमान लगाया जा रहा है. तमाम आरोपों में घिरे होने, घोटालों और आम आदमी के पैसों की खुली लूट के बाद भी सरकार आराम से यह कह सकती है कि हमारी जीडीपी विकास दर 8.6 फीसदी है.
साल दर साल घाटे में रहने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को वित्तीय सहायता देने का फैसला भी चौंकाने वाला है. इसके अलावा पानी-बिजली आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी भी चौंकाती है. असल में इस सबका परिणाम उच्च ब्याज को चुकाने के रूप में सामने आता है.
ज़ाहिर है, अर्थव्यवस्था की इस बढ़ती दर के पीछे सरकार की वर्तमान नीतियों का ज़्यादा हाथ नहीं है. यह अर्थव्यवस्था ख़ुद ही गति पकड़ रही है. असल में यह 1991 में नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है, जो अब जाकर दिख रहा है. इतने सालों में भारत के निजी क्षेत्रों की कंपनियां बहुत आगे चली गईं. इससे भारी मात्रा में कर के रूप में राजस्व की प्राप्ति हुई. इस राशि से विभिन्न कार्यक्रमों को शुरू करने में मदद मिली. इनमें से कुछ ऐसे कार्यक्रम हैं, जो कांग्रेस के भीतर लेफ्ट विंग के लोगों के सपने थे, क्योंकि यह धड़ा उदारीकरण से नफरत करता है. राजस्व से मिले पैसे के बल पर ही नरेगा और एनएसी द्वारा सुझाए जाने वाले (हस्तक्षेप) कार्यक्रमों पर ख़र्च किया जा रहा है.
हालांकि मैं इस बात में कोई सहायता नहीं कर सकता कि आप महसूस कर सकें कि यह अच्छा समय आगे भी जारी रहेगा. उदाहरण के लिए इस बारे में ख़ूब प्रचार किया जा रहा है कि कृषि क्षेत्र में भी 5.6 फीसदी का विकास हुआ, लेकिन यह पिछले साल की तुलना में काफी कम बढ़ा है. अगर आप पिछले दो सालों की तुलना करें तो पाएंगे कि कृषि विकास दर सामान्य से भी कम रही. जब मुद्रास्फीति बढ़ने लगी तो इस समस्या के लिए सूचकांक संख्या का बहाना बनाया गया. असल में असली खलनायक मुद्रास्फीति ही रही. पहली बार, जहां तक मुझे याद है, अर्थव्यवस्था के साथ मुद्रास्फीति दर दोहरे अंक में चिपकी हुई ऩजर आई. इससे पहले जब मुद्रास्फीति दर इतनी ज़्यादा बढ़ी थी, तब इसने अहमदाबाद में नवनिर्माण मोर्चा को जन्म दिया था, जिसकी वजह से तत्कालीन सरकार को देश में आपातकाल तक की घोषणा करनी पड़ी. उस व़क्त एक और सूचकांक के बारे में भी बात होती थी. बदहाली सूचकांक, जिसमें मुद्रास्फीति दर और बेरोज़गारी दर दोनों शामिल थीं.
मेरे मुताबिक़असल जीडीपी दर वह है, जब उसमें से मुद्रास्फीति दर को घटा दिया जाए. आप पाएंगे कि पिछले 20 वर्षों में यह अंतर धनात्मक रहा है. इसका अर्थ है कि विकास दर हमेशा मुद्रास्फीति दर से ज़्यादा रही. अब यह स्थिति नहीं है. अब यह अंतर ॠणात्मक हो गया है. मैं आशा करता हूं कि 2011-2012 में भी यह अंतर ॠणात्मक ही रहेगा. यानी असली विकास दर से ज़्यादा बड़ी मुद्रास्फीति दर रहेगी. हम बजट बनाने के मामले में हमेशा नरम रुख़ अपनाते रहे हैं. घाटा कभी भी 5 फीसदी से ज़्यादा नहीं होना चाहिए और हमें बताया जाता है कि घाटा 4.6 फीसदी है. लेकिन निश्चित रूप से एक ऐसी अर्थव्यवस्था, जिसकी विकास दर 8.6 फीसदी हो, को घाटा नहीं होना चाहिए. 1950 के बाद पहले दस सालों की योजनाओं ने हमेशा अतिरिक्त राजस्व दिया, लेकिन भारी क़र्ज़ की वजह से आगे चलकर वित्तीय लापरवाही दिखने लगी. पिछले बजट में लिए गए क़र्ज़ के बदले ब्याज चुकाने में ही स़िर्फ 2,48,664 करोड़ रुपये ख़र्च होने का अनुमान लगाया गया था. यह रकम कुल राजस्व प्राप्ति की 36 फीसदी थी और शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर होने वाले ख़र्च की दस गुना.
साल दर साल घाटे में रहने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को वित्तीय सहायता देने का फैसला भी चौंकाने वाला है. इसके अलावा पानी-बिजली आदि पर दी जाने वाली सब्सिडी भी चौंकाती है. असल में इस सबका परिणाम उच्च ब्याज को चुकाने के रूप में सामने आता है. अगर ग़रीबी अभी ख़त्म नहीं हुई है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि इस समस्या से लड़ने के लिए हमारे पास संसाधन नहीं हैं, बल्कि हम इन संसाधनों का इस्तेमाल अपनी पुरानी ग़लतियों का खामियाज़ा भुगतने में कर रहे हैं. कुछ लोग यह मानते हैं कि यदि विदेश में जमा काला धन वापस आ जाए तो भारत की सभी समस्याएं ख़त्म की जा सकती हैं, लेकिन पैसा तो वहां है. हमें ख़ुद को झकझोरना होगा और हर एक ख़र्च पर सवाल उठाना और पूछना होगा कि यह ख़र्च किसकी भलाई के लिए किया जा रहा है, अमीरों के लिए, मध्य वर्ग के लिए या ग़रीबों के लिए? उदाहरण के लिए पेट्रोल पर सब्सिडी का फायदा स़िर्फ बेहतर स्थिति वालों को ही होता है. शायद अगले बजट में यह न हो, लेकिन क्या हम भविष्य में इस तरह की गणना करेंगे?
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