वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई. आयोग दो-तीन सालों तक जगह-जगह घूमा. जब जांच चल रही थी तो कुछ बातें चौंकाने वाली लगीं. आयोग ने कहा कि भारत में गांव एक समाज है, जो अपनी व्यवस्था स्वयं करता है. वह किसी पर निर्भर नहीं है. यदि कोई अकस्मात बात होती है या ख़तरा आता है तो गांव समाज उसका प्रतिकार करता है. ए ओ ह्यूम ने भी कहा कि यह समाज ऐसा है कि जब कोई संकट आता है तो एक हो जाता है और उसके बाद फिर अपने-अपने काम में लग जाता है. जब तक इस देश में गांव समाज को ख़त्म नहीं किया जाता, तब तक आपका साम्राज्य स्थायी नहीं रह सकता. इस प्रकार का विद्रोह आपको झेलना ही पड़ेगा. नतीजतन, 1860 के बाद जितने भी क़ानून बने, उनमें से किसी में भी गांव समाज को कोई स्थान नहीं दिया गया. ऐसा कोई क़ानून नहीं, जिसमें गांव समाज की कोई भूमिका हो. आपस में झगड़ा हो जाए तो अदालत और न्याय पंचायत आदि बना दी गई. आप आपस में बात करके झगड़ा सुलझा सकते हैं, पर क़ानूनन सुलझा नहीं सकते. इसके लिए पुलिस है, अदालत है. गांव में जितने भी काम हैं, राज्य को दे दिए गए. हां, आज़ादी मिलने के लंबे समय के बाद पंचायती राज व्यवस्था के लिए क़ानून ज़रूर बने, लेकिन वे भी प्रशासन की अंतिम इकाई यानी गांवों तक पहुंचते-पहुंचते अपना अर्थ खोने लगे. ग्रामसभा नामक संवैधानिक संस्था को पंगु और निष्क्रिय बनाने की भरपूर कोशिश की गई और ऐसा करने वाले अपने मक़सद में सफल भी रहे.
गांव जिस तरह अंग्रेजों के समय में ग़ुलाम थे, आज भले ही वैसे न हों, लेकिन स्थिति बेहतर हुई हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता. सरकार ने जो हुक्म दे दिया, वह ग्रामसभा का काम है और जो हुक्म नहीं दिया, वह ग्रामसभा का काम नहीं. क़ानून व्यवस्था अंग्रेजों ने इसलिए बनाई थी कि उनका साम्राज्य कभी टूटे नहीं. आज़ादी के बाद भी गांवों की स्थिति कमोबेश वही बनी रही, लेकिन इस सबके बीच उम्मीद की किरण भी दिखाई दे रही है. तमाम क़ानूनी पेचीदगियों के बाद भी कुछ गांव ऐसे हैं, जो ग्रामसभा के ज़रिए विकास की नई इबारत लिख रहे हैं. ऐसा ही एक गांव है कुटुंबक्कम.
फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं, जो वर्तमान नियम-क़ानूनों के तहत ही लोकतांत्रिक ढंग से काम और ग्रामसभा की ताक़त का इस्तेमाल करते हुए अपने गांव की तस्वीर और तकदीर बदल रहे हैं. तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से क़रीब 40 किलोमीटर दूर बसा गांव कुटुंबक्कम पिछले 15 सालों से ग्राम स्वराज के रास्ते पर चल रहा है. 15 साल पहले तक यहां हर वह बुराई थी, जो देश के किसी भी अन्य गांव में देखी जा सकती है. शराब पीना, घर में मारपीट, गांव में आपसी झग़ड़े, छुआछूत एवं गंदगी आदि. गांव में 50 फीसदी आबादी दलितों की है, लेकिन जातियों के बंटवारे इतने गहरे थे कि नीची कही जाने वाली जातियों को कुछ रास्तों पर आने-जाने, कुओं से पानी लेने आदि तक की अनुमति नहीं थी. और, इन सबके चलते एक बर्बाद गांव. हर तऱफ बेरोज़गारी और ग़रीबी की मार, लेकिन आज इस गांव में आपस के झगड़े लगभग मिट गए हैं. जातियों की दीवारें अब काफी छोटी हो गई हैं. अब वही परिवार एकदम पड़ोस में रह रहे हैं, जो कल तक नीची और ऊंची जाति के झगड़े में उलझे थे. यहां तक कि गांव में अंतरजातीय विवाह भी हुए हैं. शराब पीकर घर में मारपीट करने का चलन अब थम चुका है.
एक ऐसे गांव, जिसे जातिपात, शराबखोरी, ग़रीबी एवं बेरोज़गारी जैसी बीमारियों ने हर तरह से तोड़ रखा हो, वहां के लोगों को विकास का सपना दिखाना मुश्किल काम था. फिर भी इलांगो ने गांव के ऊपर अपना सपना नहीं लादा. गांववालों के साथ बैठकर चर्चा से शुरुआत की. इलांगो की ताक़त थी कि उन्होंने पंचायत चुनाव जीतने के लिए न पैसा ख़र्च किया और न शराब बांटी. धीरे-धीरे लोग ग्रामसभा की बैठकों में आने के लिए प्रेरित हुए. इलांगो ने गांव के विकास के लिए एक पंचवर्षीय योजना बनाई और उस पर गांव में जमकर चर्चा हुई.
सवाल यह उठता है कि ये हुआ कैसे? इसका श्रेय गांव के पूर्व सरपंच रंगास्वामी इलांगो को दिया जा सकता है. इलांगो एक सफल वैज्ञानिक थे, लेकिन वह 1996 में अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़कर अपने गांव में पंचायत का चुनाव लड़े और जीत भी गए. 15 साल पहले के कुटुंबक्कम गांव का आज के कुटुंबक्कम में परिवर्तन यहीं से शुरू होता है, लेकिन अगर इसे गांव के एक होनहार नौजवान के व्यक्तित्व का चमत्कार और उसकी ऊंची पढ़ाई-लिखाई को इसका आधार मानकर छोड़ दिया जाए तो शायद इलांगो के 15 साल व्यर्थ हो जाएंगे तथा देश के हर गांव में लोग यही दुआ करते रह जाएंगे कि इलांगो जैसा कोई होनहार उनके गांव में भी पैदा हो जाए. कुटुंबक्कम में आए बदलाव को हमें किसी व्यक्ति से ऊपर उठकर इस रूप में समझना पड़ेगा कि यहां क्या-क्या हुआ और कैसे हुआ? शुरुआत तो 1996 में इलांगो के सरपंच बनने से हुई. इलांगो एक दलित परिवार से हैं और बचपन में गांव में झेले गए भेदभाव ने उनके मन में गहरा असर छोड़ा था. वह एक सपना लेकर अपने गांव आए थे, लेकिन एक ऐसे गांव, जिसे जातिपात, शराबखोरी, ग़रीबी एवं बेरोज़गारी जैसी बीमारियों ने हर तरह से तोड़ रखा हो, वहां के लोगों को विकास का सपना दिखाना मुश्किल काम था. फिर भी इलांगो ने गांव के ऊपर अपना सपना नहीं लादा. गांववालों के साथ बैठकर चर्चा से शुरुआत की. इलांगो की ताक़त थी कि उन्होंने पंचायत चुनाव जीतने के लिए न पैसा ख़र्च किया और न शराब बांटी. धीरे-धीरे लोग ग्रामसभा की बैठकों में आने के लिए प्रेरित हुए. इलांगो ने गांव के विकास के लिए एक पंचवर्षीय योजना बनाई और उस पर गांव में जमकर चर्चा हुई. यह चर्चा एक बैठक तक सीमित नहीं थी, बल्कि वार्ड स्तर पर भी इसके लिए बैठकें आयोजित की गईं. इन बैठकों में आए सुझावों के आधार पर पंचवर्षीय योजना में सुधार किए गए और इस पर काम शुरू हुआ. पूरी पारदर्शिता और हर काम के बारे में खुली बैठकों में चर्चा से लोग पंचायत के कामकाज में दिलचस्पी लेने लगे.
लेकिन सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों का रवैया एक चुनौती था. गांव से लेकर ज़िले तक के अधिकारियों-कर्मचारियों को जब किसी काम से कमीशन नहीं मिला तो वे कुपित होने लगे. नतीज़ा यह निकला कि इलांगो को काग़ज़ों में घेरने की कोशिश की गई. उन पर पंचायत का काम योजना के हिसाब से न कराने के आरोप लगे. ग़ौरतलब बात यह थी कि इलांगो इन सभी मुद्दों पर ग्रामसभा की खुली बैठकों में चर्चा करते थे. अधिकारियों को रिश्वत न देने का परिणाम यह हुआ कि एक मामले में इलांगो को निलंबित कर दिया गया. मामला यह था कि गांव में एक नाली का निर्माण होना तय हुआ और सरकार से इसके लिए 4 लाख 20 हज़ार रुपये का बजट मिला. गांव वालों ने पास की एक फैक्ट्री से बचे गे्रनाइट पत्थरों को इस्तेमाल करके यह काम मात्र 2 लाख 20 हज़ार रुपये में पूरा कर लिया. जबकि सरकारी योजना के मुताबिक़ उक्त पत्थर पड़ोस के एक स्थान से मंगाए जाने थे. इससे सरकारी पैसा भी बचा और काम भी जल्दी हो गया, लेकिन अधिकारियों ने इसे भ्रष्टाचार माना और इलांगो को निलंबित कर दिया. यहां पर इलांगो का साथ दिया गांधी के प्रयोगों ने. उन्होंने इसका शांति से विरोध किया. नतीज़ा मुख्यमंत्री के आदेश पर ग्रामसभा की बैठक हुई और 2000 लोगों ने इलांगो के पक्ष में वोट दिया. इसके बाद फिर से चुनाव हुए और इलांगो वापस अपने गांव के सरपंच बन गए. इस घटना के दौरान आई एकता ने गांव में जातियों की दीवार को नीचा किया और तब एक और सामाजिक प्रयोग की ज़मीन तैयार हुई. मुख्यमंत्री से मिलकर इलांगो ने ग़रीब परिवारों के लिए एक ऐसी कॉलोनी बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें हर दलित और ग़ैर दलित परिवार को एक-एक घर मिले. यह कॉलोनी सफलतापूर्वक बन गई और आज लोग इसमें अभूतपूर्व मेल-मिलाप से रहते हैं. इसके घर बेहद सस्ती तकनीक एवं सौर ऊर्जा के उपयोग के हिसाब से बनाए गए हैं. गांव में बदलाव का एक सबसे बड़ा उदाहरण है शराब की खपत में कमी. लोगों का शराब पीना और फिर पत्नी-बच्चों के साथ मारपीट करना आम बात थी और शायद इस बुराई ने इलांगो को गांव लौटने के लिए सबसे ज़्यादा प्रेरित किया था. सरपंच बनने के बाद इलांगो ने इसके लिए पुलिस और मीडिया का तो सहारा लिया ही, नुक्कड़ नाटकों का इस्तेमाल भी किया. चेन्नई के लोयोला कॉलेज के छात्रों की टीम ने गांव में शराब के नुक़सान पर आधारित कई नाटकों का मंचन किया.
धीरे-धीरे लोगों को लगा कि वे ग़लत कर रहे हैं और तब यह बुराई ख़त्म हुई. इसके अलावा सड़कों का निर्माण, ग़रीबों के लिए घर एवं रोज़गार के सम्मानित विकल्प आदि ऐसे काम हैं, जो अब इलांगो ही नहीं, गांव वालों के भी सपने बन गए हैं और इस पर काम भी हो रहा है. गांव में 60 फीसदी महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं, सारे बच्चे स्कूल जाते हैं. इसलिए बाल मज़दूरी जैसी बुराइयों का भी ख़ात्मा हो सका.
बीते 15 सालों में और भी कई ऐसे सफल काम हुए, जिनकी सूची बनाई जा सकती है. अब गांव के लोग इलांगो के साथ मिलकर एक और सपना देख रहे हैं और वह है आर्थिक आत्मनिर्भरता का सपना. इस सपने का आधार है यह विश्वास कि आसपास के 10-15 किलोमीटर क्षेत्र में आने वाले गांवों के लोगों की सभी ज़रूरतें स्थानीय स्तर पर ही पूरी हो सकती हैं यानी खाने-पीने से लेकर जीने के लिए ज़रूरी हर वस्तु. रंगास्वामी इलांगो और उनकी टीम अब इस सपने को साकार करने में जुटी हुई है.
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