महाराष्ट्र: सोनवणे की हत्या और राजुलवाड़ी का सच

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मनमाड़ में अतिरिक्त ज़िलाधिकारी यानी एडीएम सोनवणे को सरेआम जला दिया जाता है, मुंबई से नई दिल्ली तक खलबली मच जाती है. शासन-प्रशासन मानों अचानक नींद से जागता है, पूरे महाराष्ट्र में तेल मा़फियाओं और मिलावटखोरों के ख़िला़फ छापामार कार्रवाई शुरू हो जाती है. मुंबई से मराठवाड़ा तक के क्षेत्र को तेल मा़फियाओं का गढ़ बताकर उनके खिलाफ अभियान चलाया जाता है और मराठवाड़ा के बाद जहां से विदर्भ की सीमा लगती है, कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति शुरू हो जाती है. महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर पहुंचते-पहुंचते कार्रवाई का स्वरूप काग़ज़ों और फाइलों में सिमट जाता है यानी स़िर्फ संदिग्धों को थाने बुलाकर पूछताछ होती है.

अंग्रेज जब बार-बार और छापामारी अंदाज़ वाले हमलों से परेशान हो गए तो उन्होंने पारधियों को अपराधी घोषित कर दिया. दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अपराधी का वह लेबल आज भी इस जमात के साथ चिपका हुआ है. महाराष्ट्र के गांवों में बस्ती से दूर किसी टीलेनुमा या समतल ज़मीन पर पारधी समाज के लोग आज भी रहते हैं. ये समाज और राष्ट्र की मुख्य धारा से पूरी तरह कटे हुए हैं और इनमें शिक्षा का अभाव सा़फ दिखता है.

इस समूची कवायद के बीच नागपुर ज़िले के उमरेड तहसील मुख्यालय के नज़दीक राजुलवाड़ी में कुछ ऐसा हो जाता है, जो कई प्रश्न अनुत्तरित छोड़ जाता है. यहां रहने वाले पारधी समाज के मुखिया पन्नालाल राजपूत के घर पर छापा मारकर पुलिस 120 लीटर मिट्टी का तेल ज़ब्त करती है. पारधी समाज के लोग पुलिस पर हमला करते हैं और फिर अतिरिक्त सुरक्षाबल बुलाया जाता है, जो कार्रवाई करते हुए कई घरों में तोड़-फोड़ करता है. बाद में शुरू होता है आरोप-प्रत्यारोप का दौर. इस पूरे उच्चस्तरीय ड्रामे में मिलावटखोरी का असल मुद्दा दब जाता है. तेल मा़फिया से साठगांठ रखने वाले भ्रष्ट अधिकारी और नेता चैन की सांस लेते हैं, क्योंकि अब मुद्दा बदल गया है. अब मामला मिलावटखोरी पर कार्रवाई का नहीं है, बल्कि यह पुलिस बनाम पारधी समाज हो गया है. टोले में पुलिस गिरफ़्तारियां करती है, पन्नालाल को फरार बताया जाता है. दोनों पक्ष अपना दामन साफ-सुथरा रखने के लिए अब क़ानून और दुष्प्रचारों का सहारा ले रहे हैं. इस प्रचार युद्ध में कई प्रश्न सामने हैं. क्या पन्नालाल नक्सली है, क्या जब्त किया गया मिट्टी का तेल मिलावटखोरी के लिए रखा गया था, क्या आत्मरक्षा में पुलिस को इतनी बर्बर कार्रवाई करनी चाहिए, पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी नो कमेंट्स की स्थिति में क्यों हैं, क्या वहां के थानेदार ने बदले की कार्रवाई की, पुलिस बर्बर थी या पारधी समाज के लोग आक्रामक थे? ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनके जवाब स्वस्थ शासन-प्रशासन के लिए ज़रूरी हैं.

बीती एक फरवरी को सुबह साढ़े आठ बजे जब राजुलवाड़ी पारधी टोले के  निवासी अपनी नित्य क्रिया में मशगूल थे, तभी पुलिस उपाधीक्षक सुधाकर पालांदुरकर एवं उमरेड थाने के पुलिस निरीक्षक मधुकर गीते पुलिस बल के साथ वहां पहुंचे और उन्होंने पारधी समाज के मुखिया पन्नालाल राजपूत के घर में घुसकर तलाशी अभियान शुरू कर दिया. पारधी समाज के लोगों का कहना है कि पुलिस ने पन्नालाल को मारना-पीटना शुरू कर दिया. पन्नालाल कुछ समझ पाता, इसके पहले ही उसके घर पर मिले 120 लीटर मिट्टी तेल के साथ उसे हिरासत में ले लिया गया. अचानक हुई कार्रवाई से पन्नालाल बौखला गया. उसने पुलिस को बताया कि उसके घर से ज़ब्त मिट्टी का तेल उसका नहीं, बल्कि ग्रामवासियों का है और प्रमाण के  तौर पर उसने अपने पास मौजूद 42 राशनकार्ड भी दिखाए.

पुलिस ने उसकी एक नहीं मानी, जिससे मामला गर्माता गया. आरोप है कि पन्नालाल द्वारा कड़ा विरोध करने पर पुलिस ने ग्रामवासियों के सामने उसे अधनंगा करके मारना शुरू कर दिया. पन्नालाल को पिटता देख थोड़ी ही देर में उसकी पत्नी एवं दो बेटों के सब्र का बांध टूट गया और वे पुलिस अधिकारियों से भिड़ गए. आरोप लगाया जा रहा है कि पुलिस ने पन्नालाल की पत्नी को घसीटते हुए बाल पकड़ कर उसे मारना शुरू किया. पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा इस कदर मारपीट किए जाने पर वहां मौजूद ग्रामीणों ने पुलिस पर जमकर पथराव करके पन्नालाल, उसकी पत्नी और दोनों बेटों को आज़ाद करा लिया. क़रीब आधा घंटे तक चले इस एपिसोड के बाद संख्या में कम होने की वजह से पुलिस बल को वहां से भागना पड़ा. बताते हैं कि हर बार की तरह इस बार भी पन्नालाल पुलिस पर भारी पड़ गया था. पुलिस के मैदान छोड़ते ही ग्रामीणों ने सभी पुलिस वाहनों को जमकर क्षति पहुंचाई. उपाधीक्षक पलांदुरकर एवं पुलिस निरीक्षक मधुकर गीते की सूमो जीप सहित कई वाहनों में तोड़-फोड़ करके उन्हें जलाने का प्रयास किया गया, लेकिन थोड़ी ही देर में दोबारा पुलिस बल पहुंच जाने से यह भीषण हादसा होते-होते बच गया. अतिरिक्त बल के पहुंचते ही पुलिस दोबारा हरकत में आई. उसने जमकर लाठियां भांजी. ग्रामवासियों को चौराहे पर इकट्ठा करके उन्हें सरेआम पीटने का आरोप भी पुलिस पर लगा है. कई घरों में मौजूद आलमारियों को तोड़कर उनमें से नकदी और गहने निकाले जाने का आरोप भी राजुलवाड़ी निवासी लगा रहे हैं. साथ ही बर्तन, कपड़े एवं टीवी जैसे सामान तोड़ दिए गए. गांव में खड़े दुपहिया-तिपहिया वाहनों को भी पुलिस ने नहीं छोड़ा.   पन्नालाल का भी पुराना रिकार्ड कुछ अच्छा नहीं है. पुलिस का कहना है कि पन्नालाल आपराधिक प्रवृत्ति का है. आज पन्नालाल भले ही लोगों की सहानुभूति का पात्र हो, कई सामाजिक संगठन उसे पारधी समाज का हीरो मानकर उसके लिए आवाज़ उठा रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा नहीं हैं. कुछ जानकार तो इस कहानी को अलग रूप में देखते हैं. बताते हैं कि इसके पहले भी उसने कई दफा शराब अड्डे पर छापा मारने पहुंची उमरेड पुलिस पर जानलेवा हमले किए थे. बदनामी के डर से पुलिस ने ही मामला दबा दिया. इसी वजह से पुलिस और पन्नालाल के बीच शीतयुद्ध जारी था. पन्नालाल पर अवैध तरीक़े से शराब का व्यवसाय करने के 14-15 मामले उमरेड पुलिस थाने में दर्ज हैं. पिछले कई बरसों से उसने लगातार इन अवैध धंधों से लाखों की संपत्ति जोड़ ली है. यशवंत सोनवणे को आग के हवाले किए जाने के बाद राज्य भर में मिलावटखोरी के ख़िला़फ छापेमारी शुरू की गई है. ऐसा नहीं है कि इसके पहले इन अवैध धंधों को बंद करने जैसे आदेश सरकार ने पुलिस को नहीं दिए थे, लेकिन इस बार कार्रवाई मजबूरी थी. बड़े नाम तो सामने नहीं आए, पर छुटभइये तेल और शराब माफियाओं पर कार्रवाई ज़रूर की गई. इसी चपेट में पन्नालाल भी आ गया. पारधी समाज की कहानी अजीब है. पारधी नाम पारध शब्द से निकला है. पारध यानी शिकार करने वाला. अब पारधी भी कई तरह के होते हैं. पुराने जमाने में यह समाज राजाओं का सुरक्षा सलाहकार हुआ करता था. यह दुनिया की सबसे ख़ु़फिया और ईमानदार जमातों में से एक है. इसने कई छापामार लड़ाइयां लड़ीं और जीतीं. ख़ुद शिवा जी भी इस समाज की युद्ध शैली से प्रभावित थे. अंग्रेज जब बार-बार और छापामारी अंदाज़ वाले हमलों से परेशान हो गए तो उन्होंने पारधियों को अपराधी घोषित कर दिया. दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि अपराधी का वह लेबल आज भी इस जमात के साथ चिपका हुआ है. महाराष्ट्र के गांवों में बस्ती से दूर किसी टीलेनुमा या समतल ज़मीन पर पारधी समाज के लोग आज भी रहते हैं. ये समाज और राष्ट्र की मुख्य धारा से पूरी तरह कटे हुए हैं और इनमें शिक्षा का अभाव सा़फ दिखता है.

नक्सली होने का आरोप कितना सही

समूचे घटनाक्रम के बाद पुलिस ने पन्नालाल पर नक्सली होने का शक भी ज़ाहिर किया है. पुलिस का दावा है कि उसके घर में खोजबीन के दौरान नक्सली साहित्य बरामद किया गया. इस संबंध में पन्नालाल की बहू का कहना है कि वह पारधी समाज पर शोध कर रही है. हालांकि उसने अपने गाइड का नाम नहीं बताया. कहा जाता है कि आग लगती है, तभी धुआं उठता है, लेकिन इतना ज़रूर है कि पारधी समाज के गुण-दोष, उनका सामाजिक स्तर, लोकतंत्र में उनकी नगण्य भागीदारी आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जो उन्हें कभी भी नक्सलियों के क़रीब ला सकते हैं. नक्सलियों के समूचे इतिहास पर नज़र डालें तो इस प्रकार की जनजातियों के लोग हमेशा उनके सॉफ्ट टार्गेट रहे हैं. अगर इस आरोप में थोड़ी भी  सच्चाई है तो मामला और भी संगीन हो जाता है तथा इसे पुलिस की बर्बरता एवं पन्नालाल के रिकार्ड जैसी सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता. विदर्भ, मराठवाड़ा, खानदेश एवं सोलापुर तक पारधी समाज की मौजूदगी है. छापामार लड़ाई में यह समाज परंपरागत रूप से माहिर रहा है, इसका अगर माओवादियों के साथ गठजोड़ हो गया तो यह पूरे राज्य के लिए एक बड़ा ख़तरा साबित होगा. नागपुर ज़िले के पुलिस अधीक्षक छत्रपति वाकड़े ने तो घटना के संबंध में कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया, लेकिन क्षेत्रीय विधायक सुधीर पारवे पन्नालाल पर लगे आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हैं. पारवे कहते हैं कि यह सीधे तौर पर पुलिस का मामला है. नक्सली या फिर तेल मा़फिया जैसे आरोपों में कोई दम नहीं है.

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