उड़ी-उड़ी रे पतंग, उड़ी-उड़ी रे…जैसे गीत भले ही सदाबहार हों, लेकिन अब नवाबों की नगरी लखनऊ में पतंगबाज़ी की परंपरा लगभग ख़त्म होती जा रही है. पिछले दिनों यहां पतंग के मांझे से एक व्यक्ति की आंख चोटिल होने से पतंगबाज़ी के प्रति लोगों में भय व्याप्त हो गया है. रंग-बिरंगी पतंगें हमें आकर्षित करती हैं और हमारे अंदर प्रतिस्पर्धा का भाव पैदा करती हैं, लेकिन हर हालत में जीत की चाहत ने इस पाक हुनर को रक्तरंजित कर दिया है. मंझा के रूप में तार के प्रयोग ने पतंगबाज़ी को कलंकित कर दिया है. प्रति वर्ष लखनऊ महोत्सव के अंतर्गत पतंगबाज़ी कला प्रतियोगिता का आयोजन करके जहां प्रशासन अवध की इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखने के लिए वचनबद्ध है तो दूसरी ओर स्वार्थी तत्वों के कारण पतंगबाज़ी बदनाम हो रही है. रक्षाबंधन के बाद पतंगबाज़ी का दौर क्या शुरू हुआ, मानों बिजली विभाग की शामत आ गई. अपनी पतंग कटने न पाए, इसलिए धड़ल्ले से डोर की जगह लोहे के महीन तारों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो बिजली विभाग और उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का सबब बन रहे हैं. पतंगबाज़ी का मौसम आते ही लोहे के महीन तार बेचने वाले सक्रिय हो गए हैं, जो ऐसे तार 10 रुपये प्रति 100 ग्राम की दर से बेच रहे हैं. पतंगबाज़ इसका इस्तेमाल करके दूसरों की पतंगों के साथ बिजली के तार भी काट रहे हैं. यह हाल तब है, जबकि तीन महीने पहले ही पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक नवनीत सहगल ने ज़िलाधिकारी एवं डीआईजी को उन दुकानों की सूची सौंपी थी, जहां से ऐसे तार बेचे जा रहे हैं, लेकिन ज़िला प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया.
रंग-बिरंगी पतंगें हमें आकर्षित करती हैं और हमारे अंदर प्रतिस्पर्धा का भाव पैदा करती हैं, लेकिन हर हालत में जीत की चाहत ने इस पाक हुनर को रक्तरंजित कर दिया है. मंझा के रूप में तार के प्रयोग ने पतंगबाज़ी को कलंकित कर दिया है. प्रति वर्ष लखनऊ महोत्सव के अंतर्गत पतंगबाज़ी कला प्रतियोगिता का आयोजन करके जहां प्रशासन अवध की इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखने के लिए वचनबद्ध है तो दूसरी ओर स्वार्थी तत्वों के कारण पतंगबाज़ी बदनाम हो रही है. रक्षाबंधन के बाद पतंगबाज़ी का दौर क्या शुरू हुआ, मानों बिजली विभाग की शामत आ गई.
बक़ौल डीआईजी, कुछ महीने पहले एक बैठक में इस तरह की बात हुई थी. इसके बाद पुराने शहर के चौक, वजीरगंज, अमीनाबाद एवं कैसरबाग सहित कई थानों को निर्देश भी जारी किए गए थे. पुलिस के इस उदासीन रवैये का ही नतीजा है कि शहर के लगभग सभी इलाक़ों में पतंग की दुकानों से ऐसे तार धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं. तार बंधी पतंगें स़िर्फ बिजली संकट का कारण नहीं बन रही हैं, बल्कि उनसे दुर्घटना की भी आशंका बनी रहती है. वर्ष 2003 में कैसरबाग इलाक़े में विद्युत लाइन में फंसी पतंग से नीचे लटकते लोहे के महीन तार की चपेट में आकर अमीनाबाद इंटर कॉलेज के युवा शिक्षक संजीव पांडेय की मौत हो गई थी. बीते साल 25 दिसंबर को इमामबाड़ा और हनुमान सेतु पुल के पास दोपहिया वाहन से जा रहे मनकेश्वर पांडेय एवं अली जफर को भी पतंग की डोर ने गंभीर रूप से घायल कर दिया था. कभी बच्चों और युवाओं को खासी प्रिय रही पतंगबाज़ी पर उपभोक्तावादी संस्कृति की ज़बरदस्त मार पड़ी है. अब कुछ ख़ास मौक़े पर ही बच्चे, किशोर एवं इक्का-दुक्का युवक पतंगबाज़ी का लुत़्फ उठाते हैं. लखनऊ में पतंग बनाने और मांझा सूतने का कारोबार लगभग ख़त्म होने की राह पर है. पतंग प्रतियोगिताएं तो बीते जमाने की बात हो गई हैं. पहले पतंगबाज आपस में एक-दूसरे से पेच लड़ाने की बाज़ी लगाते थे और इसके लिए बड़ी-बड़ी पतंगें, जो सही तरह से उठ सकें,ख़ुद ही तैयार करते थे. फिर इन बड़ी पतंगों को मांझे के बजाय साधारण डोर के सहारे उड़ाकर देखा जाता था.
पतंगबाज़ अपनी पतंगों के काप और टढ़े ख़ुद तैयार करते थे और उनकी पतंगों की पहचान चील, डंडा, अद्धा, गिलास एवं चांद-तारा आदि निशानों से आसमान में ही होती थी. पतंगबाज एक-दूसरे की पतंग काटने के लिए जंगलों में जाकर ख़ुद मांझा सूतते थे और विशेष लच्छी तैयार करते थे. मांझा सूतने के लिए वे सरेस, नीला थोथा, महीन कांच, लोहे का बुरादा, रंग एवं बिल्ली-बंदर का मल आदि का इस्तेमाल करते थे, ताकि हजारा नलकी की डोर पर बारीक धार रखी जा सके. दशहरा, रक्षाबंधन, 15 अगस्त, 26 जनवरी एवं मकर संक्रांति जैसे अवसरों पर पतंगबाज़ अपने हुनर का प्रदर्शन करते थे. पेच लड़ाने के दौरान चरखी पकड़ने के लिए भी बहुत सतर्क और होशियार लोग ही रखे जाते थे, जो पेच के दौरान चरखी को इस तरह पकड़ सकें कि रील कहीं अटके नहीं. लेकिन अब पतंगबाज़ी बीते ज़माने की बात हो गई है और बच्चों में ही सिमट कर रह गई है. बच्चों ने अब पन्नी की पतंग बना ली है. अच्छन मियां कहते हैं, पतंग जैसी नाज़ुक कला भागमभाग की ज़िंदगी में तन्हा होकर ख़त्म हो रही है. बच्चों पर पढ़ाई का बोझ है और वैसे भी वीडियो गेम, टीवी के आगे सब कुछ फीका है. अब वह जमाना गया, न वैसे शौक़ीन रहे और न ख़रीददार. त्योहारों पर बच्चे छोटी पतंगें और कंपनी का बना मांझा ख़रीद कर अपना शौक़ पूरा कर लेते हैं.
नवाबों के दौर में पतंगबाज़ी के पेच लड़ाने के लिए बड़े-बड़े उस्ताद हुआ करते थे. आज लखनऊ और बरेली में परंपरागत रूप से मांझा बनाने वाले कारीगर दयनीय हालत में पहुंच गए हैं. बाज़ार में चीनी पतंगें और मांझा आ जाने के कारण वे बामुश्किल बीस-तीस रुपये रोज़ कमा पा रहे हैं. आसमान में लहराती पतंगें बनाने वाले हुनरमंद कारीगरों की मेहनत को कोई पूछने वाला नहीं है. तंग गलियों और छोटे-छोटे घरों में ज़हरीली लेई और बॉस के बुरादे के बीच लगातार काम करते पतंगसाज टीबी जैसी घातक बीमारी के शिकार होकर मौत के मुंह में जाने के लिए विवश हैं. मौलवीगंज निवासी तारिक मियां का परिवार पिछली तीन पीढ़ियों से पतंग के कारोबार से जुड़ा हुआ है. अब तारिक मियां को भी लगता है कि पतंग के दिन लदने वाले हैं. कभी जनवरी का महीना आते ही पतंगबाज़ सक्रिय हो जाते थे और पतंगों की क़ीमत भी अच्छी मिलती थी, लेकिन अब न पतंग उड़ाने वाले दिखते हैं और न पतंगसाज़. गुजरात में अपना हुनर दिखा चुके झांसी के पतंगबाज़ नीरज कहते हैं कि जिस तरह चीन और जापान में पतंगबाज़ी की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं होती हैं, वैसी हमारे यहां भी होनी चाहिए.
उत्तर भारत में पतंगबाज़ी का इतिहास वर्षों पुराना है, लेकिन गुजरात और विशेष रूप से अहमदाबाद इस लिहाज़ से देश भर में अव्वल है. गुजरात में तो प्रति वर्ष अंतरराष्ट्रीय पतंग उत्सव आयोजित किया जाता है. बताते हैं कि पतंग का आविष्कार लगभग 2800 वर्ष पूर्व चीन में हुआ था, जहां पतंग बनाने के लिए अच्छे काग़ज़, रेशम के कपड़े, धागे और हल्के-मज़बूत बांस आसानी से मिल जाते थे. दुनिया की सबसे बड़ी पतंग ब्रिस्टल इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल इंग्लैंड में उड़ाई गई, जिसकी लंबाई 210 फुट थी. इसे न्यूज़ीलैंड के पीटर लेन ने डिज़ाइन किया था. यह पतंग केवल 22 मिनट और 57 सेकेंड तक हवा में उड़ सकी.
सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया
उत्तर प्रदेश में पतंग बनाने के धंधे में लगे अधिकतर कामगार या तो मुसलमान हैं या दलित. इन दोनों ही वर्गों की स्थिति बहुत ख़राब है. पुराने लखनऊ की तंग गलियों में अंधेरे और सीलन भरे कमरों में महिलाएं रात-दिन पतंगें बनाने में लगी रहती हैं, लेकिन उनकी मज़दूरी इतनी कम है कि विश्वास ही नहीं होता. वे पतंगों का मौसम आने के छह महीने पूर्व ही इस काम में जुट जाती हैं. इन महिलाओं में युवतियां ज़्यादा हैं, जो अपने लिए ईद में नए कपड़े नहीं सिलवातीं, बल्कि अपनी कमाई के पैसे इसलिए बचाती हैं, ताकि वे उन्हें अपने विवाह में ख़र्च कर सकें. आश्चर्य की बात यह है कि एक हज़ार पतंगें बनाने पर उन्हें बतौर मज़दूरी केवल 20-30, बहुत हुआ तो 40 रुपये ही मिलते हैं. मकर संक्रांति के पर्व के एक-दो महीने पूर्व मज़दूरी में कहने भर को इज़ा़फा होता है, लेकिन सीजन ख़त्म होते ही हाल और भी ख़राब हो जाता है. इस व्यवसाय से जुड़ा शख्स दलित हो या मुस्लिम अथवा किसी अन्य जाति-समुदाय का, हाल कमोबेश सभी का यही है. टूटी-फूटी झोपड़ियों में रहने वाले इन फटेहाल लोगों की ओर किसी का भी ध्यान नहीं है. गुजरात और राजस्थान जैसे प्रदेशों में, जहां पतंगबाज़ी का बहुत पुराना रिवाज है, सरकार ने इस व्यवसाय को ज़िंदा रखने और इसके फलने-फूलने के लिए कई योजनाएं लागू कर रखी हैं, जिनकी वजह से आज इन राज्यों में पतंग व्यवसाय बहुत अच्छी हालत में है. लेकिन उत्तर प्रदेश में जहां मायावती का शासन है, वहां इस व्यवसाय और इससे जुड़ी ग़रीब जनता के लिए कुछ भी नहीं किया गया है. यानी उत्तर प्रदेश में इन ग़रीब लोगों की पतंग कट गई है.
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