राष्‍ट्रीय मुकदमा नीतिः देर से सही, एक दुरुस्‍त फैसला

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हमारे देश में ज़्यादातर मुक़दमे छोटे झगड़ों और आपसी अहम की लड़ाइयों के नतीजे होते हैं. इनमें कई मुकदमे ऐसे होते हैं, जिन्हें अदालत की जगह घंटों की बातचीत में आसानी से निपटाया जा सकता है. पारिवारिक और वैवाहिक विवादों के मामले तो मध्यस्थता के ज़रिए बेहतर तरीक़े से कम समय में सुलझ सकते हैं. हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में लोगों को नसीहत देते हुए कहा कि लंबी क़ानूनी लड़ाई पक्षकारों को स़िर्फ बर्बाद करती है, लिहाजा विवाद निपटारे के वैकल्पिक तंत्र मध्यस्थता को ज़्यादा से ज़्यादा लोग अपनाएं. न्यायमूर्तिद्वय मार्कंडेय काटजू एवं ज्ञानसुधा मिश्रा की पीठ ने पक्षकारों के साथ-साथ वकीलों को भी सलाह दी कि छोटे मामलों में वे अपने मुवक्किलों को मध्यस्थता का रास्ता चुनने की सलाह दें. यदि विवाद दो भाइयों के बीच है तो मध्यस्थता से उसका समाधान खोजा जाना चाहिए. वकीलों और पक्षकारों को ऐसे मामलों में गांधी जी की सलाह के मुताबिक़ मध्यस्थता या पंचाट की मदद लेनी चाहिए, क्योंकि दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 89 भी यही कहती है. पीठ ने कहा, महात्मा गांधी जो पेशे से बैरिस्टर थे, उन्होंने एक बार कहा था, वकील के तौर पर मैंने 20 साल प्रैक्टिस की, इसमें मेरा ज़्यादातर व़क्त सैकड़ों मामलों में समझौता कराने में बीत गया. ऐसा करके मैंने कुछ नहीं खोया, पैसा भी नहीं और निश्चित रूप से आत्मा को बिल्कुल नहीं. पीठ ने इस टिप्पणी के साथ याचिकाकर्ता बी एस कृष्णमूर्ति और बी एस नागराज के बीच संपत्ति विवाद से जुड़े मामले का निस्तारण करते हुए उसे बेंगलुरू के मध्यस्थता केंद्र के पास भेज दिया.

हमारे यहां न्यायिक सुधार कई सालों से लंबित हैं, फिर भी इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठाए जा रहे थे. केंद्र सरकार ने देर से सही, मगर राष्ट्रीय मुक़दमा नीति बनाने का जो फैसला किया है, उसकी तारी़फ की जानी चाहिए. इस नीति के सही क्रियान्वयन का असर अगले कुछ सालों में अदालतों के कामकाज पर पड़ सकता है. नीति के अमल में आने के बाद जहां मुकदमों की संख्या घटेगी, वहीं सुनवाई भी जल्दी हो सकेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, ऐसा नहीं कि यह बहुत मुश्किल काम है, बल्कि देश में समय-समय पर लोक अदालतों के ज़रिए इस तरह के मुक़दमों का निपटारा किया जाता रहा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मेगा लोक अदालत के ज़रिए महज़ एक दिन में एक लाख से ज़्यादा मुक़दमों का निपटारा कर दिखाया था. हालांकि उनमें ज़्यादातर मुक़दमे यातायात से संबंधित अपराधों, वैवाहिक विवादों, चेक बाउंस, पारिवारिक विवादों और छोटी-मोटी शिक़ायतों के थे, जिन्हें दोनों पक्षकारों से बातचीत करके आसानी से सुलझा दिया गया. हमारे यहां न्यायिक व्यवस्था कुछ ऐसी हो गई है कि छोटे से छोटे मामले के निपटारे में बरसों लग जाते हैं. यदि सही तरीक़े से सुनवाई हो तो ये महज़ कुछ महीनों में ही सुलझ जाएं. इसके पीछे कहीं न कहीं हमारी अदालतों की कार्यप्रणाली भी ज़िम्मेदार है. गवाहों का उपस्थित न होना, सम्मन तामीली न होना, अभियोजन पक्ष द्वारा समय पर चालान पेश न करना और गवाही न कराना जैसी लापरवाहियों के चलते कई बार जज चाहकर भी सुनवाई और जल्दी न्याय नहीं कर पाते. न्यायिक प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए जरूरी है कि लॉ इन्फोर्सिंग एजेंसियां, अभियोजन और वकील अपना काम ईमानदारी से करें, बार-बार स्थगन की प्रवृत्ति पर रोक लगे, प्रोसिक्यूशन सिस्टम को सक्षम और मुस्तैद बनाया जाए, जजों के लिए इन्सेंटिव सिस्टम लाया जाए और इंवेस्टीगेशन विंग को पुलिस से अलग किया जाए. अच्छी कोशिश तो यह होगी कि प्री-कोर्ट प्रोसिडिंग सिस्टम लाकर मामले को अदालत में जाने से पहले ही निपटा दिया जाए.

अदालतों को मुक़दमों के ढेर से निजात दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय मुक़दमा नीति बनाने का फैसला किया है. इस नीति का प्रमुख उद्देश्य लंबित मुक़दमों की औसत अवधि 15 साल से कम करके तीन साल करना है. यही नहीं, अदालती समय का ज़्यादा से ज़्यादा सदुपयोग करने के लिए सरकार ने सभी अदालतों में कोर्ट मैनेजर्स की नियुक्ति करने का भी अहम फैसला किया है. इससे न स़िर्फ अदालतों में लंबित मुक़दमों का अंबार कम होगा, बल्कि प्राथमिक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही मामले जज के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने से, दायर करने की तारीख़ के हिसाब से सुनवाई की प्राथमिकता तय होगी. इस समय अदालत का 60 से 65 फीसदी समय विभिन्न औपचारिकताएं पूरी करने में चला जाता है. कई वजहों से सूचीबद्ध मुक़दमों की सुनवाई स्थगित करनी पड़ती है. अदालतों का आधा समय सुनवाई स्थगित करने और अगली तारीख़ तय करने में चला जाता है. लिहाज़ा जजों के सामने मुक़दमा सूचीबद्ध होने से पहले सभी औपचारिकताएं पूरी करने का ज़िम्मा अब कोर्ट मैनेजरों का होगा. अदालतों द्वारा जारी नोटिस तामील हुए हैं या नहीं, बताई गई कमी को सुधारा गया है या नहीं, इस पर पहले से ग़ौर किया जाएगा, ताकि अदालत में मामला सूचीबद्ध होने पर जज सुनवाई कर सकें.

हमारे यहां न्यायिक सुधार कई सालों से लंबित हैं, फिर भी इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठाए जा रहे थे. केंद्र सरकार ने देर से सही, मगर राष्ट्रीय मुक़दमा नीति बनाने का जो फैसला किया है, उसकी तारी़फ की जानी चाहिए. इस नीति के सही क्रियान्वयन का असर अगले कुछ सालों में अदालतों के कामकाज पर पड़ सकता है. नीति के अमल में आने के बाद जहां मुकदमों की संख्या घटेगी, वहीं सुनवाई भी जल्दी हो सकेगी. इंसा़फ में देरी से अक्सर नाइंसा़फी होती है, ज़ाहिर है कि वह भी कम होगी.

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