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सशर्त क्लियरेंस से नहीं थमेगा विनाश

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यह बात कितनी महत्वपूर्ण है और इसकी फिक्र किसे है कि पिछले सत्र के दौरान भारतीय संसद ने एक अलग ही इतिहास रचा. पिछले सत्र के दौरान लोकसभा ने महज़ 7 घंटे ही काम किया. यह सब कुछ ऐसे समय के बाद हुआ, जब पर्यावरण और कृषि से जुड़े कुछ अत्यंत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे. हालांकि ये निर्णय काफी सोच-विचार के बाद लिए गए मालूम पड़ रहे थे, लेकिन यह पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ही था, जिसने पिछले तीन महीने में कई प्रोजेक्ट्‌स को हरी झंडी दे दी थी. आज मेरा ध्यान कुछ ऐसे ही नाज़ुक प्रोजेक्ट्‌स पर है, जिन्हें पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की तऱफ से हरी झंडी मिल चुकी है. इनमें नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, कैप्टिव पोर्ट, पोस्को स्टील प्लांट और जैतापुर न्यूक्लियर प्लांट शामिल हैं.

सशर्त एन्वायरन्मेंटल क्लियरेंस देने की शुरुआत तबसे हुई थी, जब एन्वायरन्मेंटल इंपैक्ट असेसमेंट (ईआईए) के तहत प्रोजेक्ट्‌स और उनकी गतिविधियों की समीक्षा शुरू हुई थी. 1994 की एक अधिसूचना के तहत एन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट की शुरुआत की गई थी. इस प्रक्रिया में ईआईए तैयार करने की प्रक्रिया भी शामिल थी. ईआईए तैयार करते समय जन सुनवाई और एक्सपर्ट कमेटी से बातचीत की जाती है, ताकि इस सब के आधार पर किसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी जा सके या उसे ख़ारिज किया जा सके.

पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने इन प्रोजेक्ट्‌स को हरी झंडी दिए जाने के पीछे एक लंबी सफाई दी है और इसे मंत्रालय की वेबसाइट पर भी डाला गया है. अपनी सफाई में जयराम रमेश उन वजहों के बारे में बताते हैं कि भारी विरोध और पर्यावरण एवं आम आदमी पर इन प्रोजेक्ट्‌स का असर पड़ने के बावजूद आख़िर क्यों हरी झंडी दी गई. जब हम इस सफाई की वैधता पर चर्चा करे, उससे पहले एक महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान देना ज़रूरी है. उस बिंदु पर, जो इन सभी प्रोजेक्ट्‌स में कॉमन है. असल में इन सारे प्रोजेक्ट्‌स की वजह से पर्यावरण सुरक्षा को गहरा धक्का पहुंचना तय है.

सशर्त एन्वायरन्मेंटल क्लियरेंस देने की शुरुआत तबसे हुई थी, जब एन्वायरन्मेंटल इंपैक्ट असेसमेंट (ईआईए) के तहत प्रोजेक्ट्‌स और उनकी गतिविधियों की समीक्षा शुरू हुई थी. 1994 की एक अधिसूचना के तहत एन्वायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट की शुरुआत की गई थी. इस प्रक्रिया में ईआईए तैयार करने की प्रक्रिया भी शामिल थी. ईआईए तैयार करते समय जन सुनवाई और एक्सपर्ट कमेटी से बातचीत की जाती है, ताकि इस सब के आधार पर किसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी जा सके या उसे ख़ारिज किया जा सके.

विवादास्पद जैतापुर न्यूक्लियर पावर प्लांट, जिसमें फ्रांस की एक कंपनी न्यूक्लियर रिएक्टर स्थापित कर रही है, को मिली एन्वायरन्मेंटल क्लियरेंस को देखा जाना चाहिए. इसे 26 नवंबर, 2010 को मंत्रालय की ओर से हरी झंडी मिली, यानी फ्रेंच राष्ट्रपति सरकोज़ी की दिसंबर में होने वाली भारत यात्रा से ठीक पहले. 35 शर्तों के साथ क्लियरेंस दी गई, ताकि रत्नागिरी ज़िले के मदबन गांव में स्थापित हो रहे इस प्लांट की वजह से पर्यावरण को नुक़सान न पहुंचे. कहा गया कि यह निर्णय बहुत कठिन था, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक वजहों से प्लांट को हरी झंडी दे दी गई. हालांकि समुद्रीय जैव विविधता का मुद्दा भी उठाया गया था, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया. इसी तरह विवादास्पद नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को भी सशर्त क्लियरेंस दे दी गई. यहां भी कहा गया कि सिविल एविएशन मिनिस्ट्री और महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के बीच संतोषजनक समझौते के तहत यह हुआ.

सशर्त क्लियरेंस देने का ताजा मामला पोस्को के स्टील प्लांट से जुड़ा है, जो उड़ीसा के जगतसिंह पुरा में स्थापित किया जा रहा है. पिछले 5-6 सालों से इस प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध हो रहा है. ख़ुद पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की कमेटी ने इस प्रोजेक्ट को दी गई स्वीकृति वापस लेने की सलाह दी है. मंत्रालय ने 28 मुख्य और 32 अतिरिक्त शर्तों की एक सूची बनाई थी, जिसे कंपनी को मानना था. मंत्रालय ने यह माना है कि उक्त सारी शर्तों और उड़ीसा सरकार द्वारा वन अधिकार रक्षा की गारंटी से इस प्रोजेक्ट को पारिस्थितिकी और लोगों के जीवनयापन के लिहाज़ से हितकारी बनाया जा सकता है. मंत्रालय का कहना है कि सभी शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं, इसका ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया जाएगा. लेकिन व्यवहारिक तौर पर देखें तो इन सभी शर्तों की सूची का क्या मतलब है? मानकों के अनुसरण से लेकर पर्यावरण क़ानूनों द्वारा तय अनुबंध तक, इन शर्तों को तो उस जगह के हिसाब से होना चाहिए था, जहां किसी ख़ास प्रोजेक्ट को स्थापित किया जाना है. उदाहरण के लिए, एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को दी जाने वाली क्लियरेंस में यह बात शामिल होनी चाहिए कि प्रोजेक्ट के स्थापित होने और उसके काम करने के दौरान उससे निकलने वाले कचरे का निपटान कैसे किया जाना है. औद्योगिक इकाई को क्लियरेंस देने के मामले में ट्रीटमेंट प्लांट भी लगाने की शर्त होनी चाहिए.

वर्ष 2009 में कल्पवृक्ष ने कॉलिंग द ब्लफ: रिविलिंग द स्टेट ऑफ मॉनीटरिंग एंड कंप्लायंस ऑफ एन्वायरन्मेंटल क्लियरेंस कंडीशन नाम से एक अध्ययन किया. इसमें औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मिली कंडीशनल एन्वायरमेंटल क्लियरेंस का अनुपालन हो रहा है या नहीं और इसकी निरीक्षण प्रक्रिया का आकलन किया गया था. रिपोर्ट से पता चला कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 80 से 100 तक की संख्या में बांध, थर्मल पावर, सिंचाई प्रोजेक्ट्‌स, उद्योग, पोर्ट, रीयल स्टेट्‌स एवं अन्य प्रोजेक्ट्‌स को क्लियरेंस दी थी. मजेदार तथ्य यह है कि 7000 से ज्यादा प्रोजेक्ट्‌स की निगरानी की ज़िम्मेदारी मंत्रालय के महज़ 6 क्षेत्रीय कार्यालयों के चंद अधिकारियों-कर्मचारियों के पास है. ज़ाहिर है, इतने कर्मियों के भरोसे कितने प्रोजेक्ट्‌स की निगरानी की जा सकती है, इसका अंदाज़ा स्वयं लगाया जा सकता है. स्वयं मंत्रालय के पास यह आंकड़ा नहीं है कि कितने प्रोजेक्ट्‌स उसकी शर्तों का पालन कर रहे हैं. इसलिए इन बातों का क्या अर्थ रह जाता है, जब कोई यह कहता है कि फलां प्रोजेक्ट के साथ फलां-फलां शर्तें जोड़ दी गई हैं. इस बात की गारंटी कौन देगा कि किसी प्रोजेक्ट से लोगों का जीवनयापन प्रभावित नहीं होगा. अब तक एक भी ऐसा उदाहरण सामने नहीं आया है कि किसी शिक़ायत पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने किसी प्रोजेक्ट की क्लियरेंस वापस ली हो. यह समय हमारी सरकार और योजनाकारों के लिए इन मुद्दों पर ध्यान देने का है, न कि सशर्त क्लियरेंस की आड़ में छुपने का.

(लेखिका कल्पवृक्ष नामक एन्वायरन्मेंटल एक्शन ग्रुप की सदस्य हैं)

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