न्याय के साथ विकास और अपराध-भ्रष्टाचार मुक्त बिहार बनाने की बातें अच्छी लगती हैं तथा नीतीश कुमार ने अपना यह वादा पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश भी की, लेकिन क़ानून का राज अभी पूरी तरह क़ायम नहीं हुआ है. क़ानून का पालन कराने वाली एजेंसी ईमानदारी से काम नहीं कर रही है. पुलिस की कार्यशैली जस की तस है. अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) की स्थिति तो और भी दयनीय है. इसके अंतर्गत कार्यरत विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल), जिसकी रिपोर्ट किसी को गुनाहगार या बेगुनाह साबित करती है और जिसे अदालत फै़सला करते समय महत्व देती है, भ्रष्टाचार का अड्डा बनी हुई है. इसकी रिपोर्ट अब विश्वसनीय नहीं होती, यहां रिपोर्ट देने में पैसों का खुला खेल चलता है. इसकी ग़लत रिपोर्ट के कारण सैकड़ों बेक़सूर जेल की यातना भुगतने के लिए अभिशप्त हैं.
जीव विज्ञान प्रशाखा में सहायक निदेशक का पद रमाशंकर सिंह के झारखंड चले जाने से 8 जुलाई, 2006 से खा़ली है और वरीय वैज्ञानिकों के दोनों पद खा़ली हैं. इनमें से एक पद विनोद शंकर की उप निदेशक पद पर प्रोन्नति के फलस्वरूप एक जून, 1996 और दूसरा एक जनवरी, 1997 को खा़ली हुआ था. प्रयोगशाला सहायक के 5 स्वीकृत पदों के विरुद्ध मात्र 3 सहायक काम कर रहे हैं. सामान्य रसायन प्रशाखा में एक फ़रवरी, 2003 से सहायक निदेशक नहीं है.
दुर्भाग्यवश विधि विज्ञान प्रयोगशाला गृह (आरक्षी) विभाग के अधीन काम करती है, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास है. यह प्रयोगशाला वर्षों से सरकारी उपेक्षा की शिकार है और अधिकारियों-कर्मचारियों की कमी से जूझ रही है. इसकी हर प्रशाखा में निचले स्तर के कर्मचारियों और उच्चाधिकारियों का अभाव है. जांच रिपोर्ट देने का काम अप्रशिक्षित एवं अनाधिकृत कर्मचारी कर रहे हैं. एफएसएल में निदेशक और उप निदेशक के एक-एक पद सृजित हैं. डॉ. सैयद रियाजुल हसन की सेवानिवृत्ति के कारण निदेशक का पद एक अप्रैल, 1995 और दिनेश प्रसाद की सेवानिवृत्ति की वजह से उप निदेशक का पद एक फ़रवरी, 2001 से खा़ली है. सहायक निदेशक को प्रभार देकर निदेशक का काम लिया जा रहा है. विष विज्ञान प्रशाखा में सृजित वरीय वैज्ञानिकों के दोनों पद प्रमोद कुमार झा एवं सुब्रत गुप्ता के सहायक निदेशक पद पर प्रोन्नत होने के बाद 26 अप्रैल, 1996 से खा़ली हैं. सहायक निदेशक का स्वीकृत एकल पद एक जून, 2002 से रिक्त है. वरीय वैज्ञानिक सहायक तीन की जगह एक और प्रयोगशाला सहायक छह की जगह पांच कार्यरत हैं. विस्फोटक प्रशाखा में सहायक निदेशक का एक पद स्वीकृत है, जो पंचानन उपाध्याय के सेवानिवृत्त होने के बाद एक जून, 2001 से रिक्त है. प्रशाखा में दो प्रयोगशाला सहायकों की जगह एक सहायक कार्यरत है.
जीव विज्ञान प्रशाखा में सहायक निदेशक का पद रमाशंकर सिंह के झारखंड चले जाने से 8 जुलाई, 2006 से खाली है और वरीय वैज्ञानिकों के दोनों पद खा़ली हैं. इनमें से एक पद विनोद शंकर की उप निदेशक पद पर प्रोन्नति के फलस्वरूप एक जून, 1996 और दूसरा एक जनवरी, 1997 को खाली हुआ था. प्रयोगशाला सहायक के 5 स्वीकृत पदों के विरुद्ध मात्र 3 सहायक काम कर रहे हैं. सामान्य रसायन प्रशाखा में एक फरवरी, 2003 से सहायक निदेशक नहीं है. सीरम विज्ञान प्रशाखा में सहायक निदेशकों के दो पद अलख निरंजन प्रसाद की उप निदेशक पद पर प्रोन्नति के फलस्वरूप 16 फ़रवरी, 1995 और धनंजय मिश्र की सेवानिवृत्ति के कारण एक मार्च, 2001 से रिक्त हैं. आग्नेयास्त्र प्रशाखा में एक अगस्त, 2001 से सहायक निदेशक नहीं है. यह पद विनोद कुमार मिश्र के सेवानिवृत्त होने से रिक्त हुआ है. इस प्रशाखा में वरीय वैज्ञानिक के स्वीकृत 4 पदों के विरुद्ध मात्र एक डॉ. अनिल कुमार सिन्हा काम कर रहे हैं. उपकरण प्रशाखा में सहायक निदेशक का पद भी खाली हो गया है. भौतिकी प्रशाखा में एक जनवरी, 2003 से सहायक निदेशक नहीं है और प्रयोगशाला सहायक के दोनों पद खा़ली हैं.
अब बात करें एफएसएल द्वारा निर्गत रिपोट्र्स की. इसकी विष विज्ञान प्रशाखा में बिसरा की जांच की जाती है. नियमत: प्रशाखा में तैनात सहायक निदेशक एवं वरीय वैज्ञानिकों (प्रशिक्षित राजपत्रित पदाधिकारी) द्वारा गठित टीम को बिसरा की जांच करनी चाहिए और परिणाम की रिपोर्ट सहायक निदेशक के हस्ताक्षर और निदेशक/प्रभारी निदेशक के प्रति हस्ताक्षर से निर्गत होनी चाहिए, लेकिन इस प्रशाखा में सहायक निदेशक का पद जून 2002 और वरीय वैज्ञानिकों के दोनों पद क़रीब डेढ़ दशक से रिक्त हैं. ऐसी स्थिति में इस प्रशाखा में बिसरा की जांच नहीं हो सकती है. बावजूद इसके जांच हो रही है और जांच प्रतिवेदन भी निर्गत किए जा रहे हैं तथा तृतीय श्रेणी के कर्मचारी सुरेश पासवान के हस्ताक्षर से क़रीब 560 बिसरा जांच प्रतिवेदन निर्गत हो चुके हैं. गृह (आरक्षी) विभाग के अवर सचिव के पत्र संख्या-6/विप-04/2009 गृ.आ. 7160 पटना, 28-10-09 और पुलिस अधीक्षक सीआईडी के पत्र संख्या-705/स्था. 29-07-09 में सा़फ कहा गया है कि सीआरपीसी की धारा 293 के तहत बिसरा जांच प्रतिवेदन पर सुरेश पासवान, जो प्रौद्योगिकी पदाधिकारी अराजपत्रित हैं, हस्ताक्षर करने के लिए अधिकृत नहीं हैं. इन पत्रों में प्रभारी निदेशक के रूप में डॉ. श्याम बिहारी उपाध्याय का नाम है. सुरेश पासवान को विष विज्ञान प्रशाखा एवं नारकोटिक्स में काम करने का प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है. एफएसएल के ज्ञापांक 1323, 8-12-08 अंतर्गत तत्कालीन एवं वर्तमान प्रभारी निदेशक उमेश कुमार सिन्हा द्वारा सुरेश पासवान को जांच प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करने का आदेश प्रदान किया गया था. इस सबके पीछे नाजायज़ कमाई एक बड़ा कारण है. उदाहरण के तौर पर बिसरा जांच प्रतिवेदन 54/2008 को लिया जा सकता है. फतुहा थाना कांड संख्या- 257/07 से संबंधित और 3 जुलाई, 2008 को निर्गत इस रिपोर्ट पर बतौर प्रभारी निदेशक शिव लखन सिंह के प्रति हस्ताक्षर एवं टेक्निकल ऑफिसर के रूप में सुरेश पासवान के हस्ताक्षर हैं. गृह (आरक्षी) विभाग की अधिसूचना के अनुसार, फ़रवरी 2008 से डॉ. श्याम बिहारी उपाध्याय प्रभारी निदेशक हैं, लेकिन बतौर प्रभारी निदेशक जांच प्रतिवेदनों पर प्रति हस्ताक्षर शिव लखन सिंह ने किए हैं, जबकि वह उपकरण प्रशाखा के सहायक निदेशक के पद पर कार्यरत थे. प्रभारी निदेशक के रहते उनकी जगह शिव लखन सिंह द्वारा प्रभारी निदेशक के रूप में प्रति हस्ताक्षर करने का आख़िर क्या कारण था?
मेडिकल साइंस के मुताबिक़, मानव अंग बिसरा के रूप में का़फी दिनों तक ख़राब नहीं होता, लेकिन फतुहा थाना कांड संख्या 257/07 में बिसरा एफएसएल पहुंचते ही ख़राब हो गया. जानकारों के मुताबिक़, एफएसएल पटना द्वारा निर्गत रिपोट्र्स में सम डार्क ब्राउन फ्लूड इसलिए लिखा जाता है और आशंका व्यक्त की जाती है कि वह बिसरा का गला रूप हो सकता है, ताकि उसकी दोबारा जांच न कराई जा सके. रिपोर्ट में थाइमेट पाना लिखा गया है, जबकि जांच से पता नहीं लगाया जा सकता कि किस ब्रांड की दवा/ज़हर का इस्तेमाल किया गया है. मसलन थाइमेट का निर्माण वायर कंपनी करती है और इसी कंपोजिशन के कीटनाशक का निर्माण दूसरी कंपनी पारामार नाम से करती है. इसलिए किसी भी जांच से पता नहीं किया जा सकता कि किस व्यक्ति की मृत्यु थाइमेट या पारामार खाने या खिलाने से हुई है, लेकिन इस रिपोर्ट में स्पष्ट थाइमेट का उल्लेख किया गया है, जो बिना जांच के किसी प्रकार के प्रभाव में आकर लिखा गया लगता है. इसी मामले में नालंदा मेडिकल कॉलेज से जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चार अंगों की हिस्टोपैथोलॉजिकल रिपोर्ट में भी ऐसी कोई बात नहीं पाई गई. एक अन्य रिपोर्ट एफएसएल 1233/2007 में भी यही किया गया.
अपराध अनुसंधान विभाग के अपर पुलिस महानिदेशक यशवंत मल्होत्रा के ज्ञापांक 193 (ए), 16-09-08 में स्पष्ट अंकित है कि इस प्रयोगशाला में डीएनए की जांच मशीन से नहीं की जाती. कई सालों से यह मशीन ़खराब पड़ी है. वहीं सीआईडी के पुलिस अधीक्षक (सी) के पत्रांक 02, 07-01-09 के अनुसार एफएसएल पटना से 3 डीएनए जांच रिपोर्ट जारी की गई हैं. इनमें से एक रिपोर्ट एफएसएल-600, 04-09-08 को जारी की गई है, जिस पर रिपोर्टिंग ऑफिसर के रूप में टेक्नीशियन शिव कुमार और तत्कालीन प्रभारी डॉ. श्याम बिहारी उपाध्याय के हस्ताक्षर हैं. यहां नियुक्ति एवं प्रोन्नति का खेल भी निराला है. हाल में उप निदेशक के पद पर प्रोन्नत शिव लखन सिंह इसके उदाहरण हैं. उनकी नियुक्ति 1983 में आग्नेयास्त्र प्रशाखा में वरीय वैज्ञानिक के पद पर हुई थी. पुलिस मैनुअल के अनुसार उन्हें आग्नेयास्त्र प्रशाखा में ही प्रोन्नति दी जा सकती है, वह भी कम से कम 6 वर्षों का कार्यानुभव होने पर. जिस प्रशाखा में वरीय वैज्ञानिक का पद सृजित नहीं है, वहां सहायक निदेशक के पद पर बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा नियुक्ति का प्रावधान है. उपकरण प्रशाखा में चूंकि वरीय वैज्ञानिक का पद सृजित नहीं है, इसलिए वहां सहायक निदेशक के पद पर बीपीएससी के ज़रिए नियुक्ति की जानी चाहिए थी, परंतु बिना विज्ञापन निकाले और कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग से रोस्टर क्लीयरेंस लिए शिव लखन सिंह को आग्नेयास्त्र प्रशाखा से उपकरण प्रशाखा का सहायक निदेशक बना दिया गया. इनकी नियुक्ति से संबंधित गृह (आरक्षी) विभाग की संचिका-6/विविप्र में यह बात स्पष्ट रूप से अंकित है. शिव लखन सिंह द्वारा अपनी नियुक्ति के संबंध में भी परस्पर विरोधी सूचनाएं दी गईं, जो एक तरह से सूचना अधिकार क़ानून का मखौल उड़ाना है. ऐसे अधिकारी पर कार्रवाई न होना आश्चर्य की बात है.
मालूम हो कि शिव लखन सिंह को कभी भी गृह (आरक्षी) विभाग द्वारा प्रभारी निदेशक बनाने की अधिसूचना जारी नहीं की गई. प्रभारी निदेशक के स्थानांतरण के समय उन्हें इस पद का प्रभार रूटीन वर्क के लिए सौंपा गया था. प्रभार में रहने वाला व्यक्ति स़िर्फ रूटीन कार्य कर सकता है. उसे प्रभारी निदेशक के रूप में प्रति हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं है, लेकिन शिव लखन सिंह ऐसा करते रहे हैं. चकित करने वाली बात यह है कि लोकायुक्त कार्यालय में शिव लखन सिंह के ख़िला़फ चार परिवाद दायर रहने और निगरानी विभाग में शिकायत लंबित रहने के बावजूद ज्ञापन संख्या-6/सी-1-016/2007 गृ.आ. 6042, 23-07-10 द्वारा उन्हें प्रोन्नति देकर उप निदेशक बना दिया गया. उल्लेखनीय है कि लोकायुक्त के यहां 2007 में मेंहदिया (अरवल) के राम नरेश सिंह ने परिवाद संख्या 237/07, तत्कालीन विधायक सुनीला देवी ने परिवाद संख्या 35/09 और फतुहा निवासी अधिवक्ता रत्नेश कुमार पाठक ने परिवाद संख्या 227/09 दर्ज कराया था. लोकायुक्त कार्यालय ने इन तीनों मामलों को जांच के लिए गृह (आरक्षी) विभाग के प्रधान सचिव को भेजा था. विधान परिषद की आश्वासन समिति में जदयू के विधान पार्षद सुनील कुमार सिंह द्वारा ध्यानाकर्षण के माध्यम से शिव लखन सिंह एवं सुरेश पासवान पर लगे आरोपों की जांच चल रही है. 30-07-09 को सदन को आश्वस्त किया गया कि मामले की जांच नए पुलिस महानिदेशक आनंद शंकर से कराई जाएगी, लेकिन आश्वासन समिति ने जांच के लिए मामले को पुलिस महानिदेशक के बजाय स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव के पास भेज दिया. क्या जांच हुई, पता नहीं? अधिवक्ता रत्नेश कुमार पाठक द्वारा निगरानी में शिव लखन सिंह एवं सुरेश पासवान के विरुद्ध दर्ज परिवाद पर भी जांच चल रही है. हैरत वाली बात यह है कि गृह (आरक्षी) विभाग से शिव लखन सिंह की आग्नेयास्त्र प्रशाखा से उपकरण प्रशाखा में प्रोन्नति से संबंधित विवादित संचिका ग़ायब है.
सुनीला देवी और राम नरेश सिंह के परिवादों की जांच के लिए गृह (आरक्षी) विभाग में खोली गई संचिका-6/विविप्र-01-08-08 में प्रोन्नति से संबंधित संचिका-6/सी-1-21/07 के ग़ायब होने और इसके न मिलनेे तक कोई निर्णय न लिए जाने का उल्लेख है. जानकारों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि शिव लखन सिंह के अनुचित क्रियाकलापों, ग़लत/अवैध पदस्थापन को रद्द/निरस्त करने संबंधी विधान परिषद (आश्वासन समिति), लोकायुक्त एवं निगरानी अन्वेषण ब्यूरो में जांच लंबित होने के बावजूद उन्हें प्रोन्नति किस प्रकार दी गई, जबकि उन्हें लोकायुक्त कार्यालय के पत्र संख्या-4/लोक (स्वच्छता) गृ.आ. 02/2002 पार्ट 178 लोक, 15-01-10 और निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के पत्रांक-1732 जांशा, 11-12-09 द्वारा स्वच्छता प्रमाणपत्र प्रदान कर दिया गया. अधिवक्ता पाठक ने इस गोरखधंधे से राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को 15 नवंबर, 2010 और राज्यपाल को 29 नवंबर, 2010 को लिखित रूप से अवगत कराकर कार्रवाई की अपेक्षा की है, लेकिन इस दिशा में कुछ होता नहीं दिख रहा है.
अधिवक्ता पाठक के आवेदन का संज्ञान लेते हुए केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधि कार्य विभाग की अवर सचिव आशा सोटा ने बिहार सरकार के मुख्य सचिव को 14 दिसंबर, 2010 को आवश्यक कार्रवाई के लिए एक पत्र भी लिखा है.
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