वाईब्रेंट गुजरात का मिथक

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इन दिनों यह मान्यता बहुत तेजी से फैल रही है (या फैलाई जा रही है) कि गुजरात अत्यंत द्रुत गति से प्रगति कर रहा है, वहां शांति एवं सौहार्द का राज है, अल्पसंख्यक ख़ुशहाल हैं और वह जल्दी ही देश का सबसे उन्नत राज्य बन जाएगा. शाइनिंग इंडिया की तर्ज़ पर एक नया शब्द गढ़ा गया है, वाईब्रेंट गुजरात. इस प्रचार में सत्य का नाम मात्र भी अंश नहीं है. दो हज़ार से अधिक मुसलमानों की हत्या, बलात्कार, लूटपाट एवं आगजनी की यादें मिट नहीं पा रही हैं, क्योंकि हिंसा पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिल सका है. उनके पुनर्वास पर भी सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है. सुविधाहीन राहत शिविर बहुत जल्दी बंद कर दिए गए. सरकार ने पुनर्वास के काम से अपना पल्ला झाड़ लिया है.

हाल के कुछ वर्षों में किसानों और कृषि श्रमिकों की बदहाली बढ़ी है. विधानसभा में दिए गए एक उत्तर में मोदी ने बताया कि जनवरी 2007 में समाप्त हुए एक वर्ष में राज्य में 148 किसानों ने आत्महत्या की. एक ओर गुजरात विद्युत का निर्यात कर रहा है तो दूसरी ओर गांवों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही है. 2007 में राज्य में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच 900 मेगावाट का अंतर था और इस अंतर को पाटने के लिए गांवों में बिजली कटौती की जा रही थी.

यद्यपि मुसलमानों के व्यापारी तबके के एक हिस्से को भाजपा एवं प्रभुत्वशाली सामाजिक वर्ग ने अपनी ओर कर लिया है, तथापि अधिकांश मुसलमान आज भी घोर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. वे समाज की मुख्यधारा से कटकर अपने में सिमट गए हैं. सभी बड़े शहरों में मुस्लिम बस्तियां बस गई हैं. अहमदाबाद का जुहापुरा इलाक़ा डर और असुरक्षा के उस भाव का जीता-जागता उदाहरण है, जिससे गुजरात के मुसलमान ग्रस्त हैं. मुसलमानों ने अपनी दुकानों-व्यापारिक प्रतिष्ठानों के नाम बदल लिए हैं, जिनसे लगता है कि संबंधित दुकान या फर्म किसी हिंदू की है. मुसलमानों को उम्मीद है कि इससे भविष्य में होने वाले दंगों में उनकी धार्मिक पहचान उजागर नहीं होगी और उनकी संपत्तियां सुरक्षित रहेंगी. उन्हें यह भी उम्मीद है कि इससे वे मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करने के विहिप के आह्वान का शिकार होने से बच जाएंगे. इस निराशाजनक परिदृश्य में आशा की एकमात्र किरण यह है कि कुछ मुस्लिम सामाजिक संगठन अपने समुदाय को शिक्षित करने के प्रयास में लगे हैं, जिससे मुस्लिम युवक ऐसे क्षेत्रों में रोज़गार प्राप्त कर सकें, जहां उनके साथ भेदभाव न हो.

अब्दुल सलेह शरीफ द्वारा रिलेटिव डेवलपमेंट ऑफ गुजरात एंड सोशियो-इकोनॉमिक डिफरेन्शियल्स (गुजरात के विकास में सामाजिक-आर्थिक वर्गीय अंतर) विषय पर किया गया विस्तृत अध्ययन गुजरात में मुसलमानों की खस्ताहाली को उजागर करता है. ग़रीबी, कुपोषण, शिक्षा एवं सुरक्षा जैसे मानकों की दृष्टि से दूसरे समुदायों की तुलना में मुसलमान बहुत पीछे हैं. गुजरात के मुसलमानों के लिए दो जून की रोटी जुटाना उतना ही कठिन है, जितना उड़ीसा एवं बिहार के पिछड़े हुए इलाक़ों के निवासियों के लिए. मुसलमान शिक्षा के मामले में भी पीछे हैं. हीरों के व्यापार एवं कपड़ा उद्योग में एक समय मुसलमानों का बोलबाला था, अब उन्हें पीछे धकेल दिया गया है. उच्च जातियों के हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों में ग़रीबों का प्रतिशत 8 गुना अधिक है. वे अन्य पिछड़े वर्गों से भी काफी पीछे हैं. केवल 12 प्रतिशत मुसलमानों के बैंक खाते हैं और मात्र 2.6 प्रतिशत मुसलमानों को बैंकों से क़र्ज़ मिला है. अध्ययन का निष्कर्ष है कि गुजरात में मुसलमानों के साथ घोर भेदभाव किया जा रहा है. यहां तक कि नरेगा में भी उनके साथ पक्षपात होता है. ग़ैर सरकारी संगठन प्रथम के अनुसार, शिक्षा के क्षेत्र में गुजरात बिहार से भी पीछे है. सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट प्रावधान के मामले में 18 बड़े राज्यों में गुजरात का स्थान 17वां है. विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक दूरियां बढ़ गई हैं और शहरों में उग आईं मुस्लिम बस्तियां इसका प्रमाण हैं. मुस्लिम बस्तियों में बैंक अपनी शाखाएं नहीं खोलते और टेलीफोन कंपनियां वहां कनेक्शन देने में आनाकानी करती हैं. इन इलाक़ों में नागरिक सुविधाओं का नितांत अभाव है. इन बस्तियों के बच्चों को स्कूल भी नसीब नहीं है.

इस सबके बीच गुजरात में अप्रवासी भारतीयों एवं उद्योगपतियों के सम्मेलन हो रहे हैं और निवेश आमंत्रित किया जा रहा है. ऐसा प्रदर्शित किया जा रहा है, मानों गुजरात में डॉलरों की बरसात हो रही हो. यह सही है कि गुजरात में निवेश हो रहा है और औद्योगीकरण भी, परंतु जितना बताया जा रहा है, उससे कम. 2005 की वाईब्रेंट गुजरात मीट के बाद घोषणा की गई थी कि 1.06 लाख करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं. बाद में मुख्यमंत्री ने बताया कि इनमें से 74 हज़ार करोड़ रुपये (63 प्रतिशत) का निवेश वास्तविक रूप से हुआ. सूचना के अधिकार के तहत हासिल की गई जानकारी के अनुसार, इनमें से केवल 25 हज़ार करोड़ रुपये (23.5 प्रतिशत) की औद्योगिक परियोजनाएं ज़मीन पर उतर सकीं. तीस्ता सीतलवाड़ के अनुसार, 2007 में गुजरात सरकार ने दावा किया कि उसने 363 एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनके अंतर्गत राज्य में कुल 4.61 लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा. इस हिसाब में जोड़ की ग़लती थी. सही आंकड़ा 4.51 लाख करोड़ रुपये था. सरकार के अनुसार, इसमें से 2.64 लाख करोड़ रुपये का निवेश वास्तविक रूप से हुआ, परंतु राज्य के उद्योग आयुक्त द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, मात्र 1.22 लाख करोड़ रुपये (27 प्रतिशत) की परियोजनाएं लागू हुईं. 2003, 2005 एवं 2007 में घोषित किए गए निवेशों में से केवल 20.28 प्रतिशत निवेश वास्तविक रूप से हुआ.

जो थोड़ा-बहुत निवेश गुजरात आकर्षित कर सका, वह भी इसलिए हुआ, क्योंकि गुजरात पहले से ही औद्योगीकृत राज्य था. अभी भी गुजरात महाराष्ट्र से पीछे है, परंतु महाराष्ट्र के औद्योगीकरण या वहां हो रहे निवेश के संबंध में मीडिया में कभी इतने जोर-शोर से प्रचार नहीं होता, जितना गुजरात के मामले में. दो दशक पहले गुजरात की आर्थिक वृद्धि दर 13 प्रतिशत थी. उस समय राष्ट्रीय औसत 7 प्रतिशत के क़रीब था. इस समय गुजरात की आर्थिक वृद्धि दर 11 प्रतिशत और पूरे देश की 10 प्रतिशत है. ये तथ्य असली कहानी को बयान करते हैं. गुजरात ने सरकारी खजाना उद्योगपतियों के लिए खोल दिया है. उन्हें तरह-तरह की छूटें दी जा रही हैं और अनुदान भी. सस्ती दरों पर ज़मीन एवं पानी और अत्यंत कम ब्याज दरों पर क़र्ज़ की सुविधा है. टाटा के अपनी नैनो परियोजना गुजरात ले जाने के पीछे यह भी एक कारण था. नैनो परियोजना को भारी अनुदान दिया गया है. जहां उद्योगपतियों को गुजरात में सार्वजनिक संसाधनों को लूटने की पूरी छूट मिली हुई है, वहीं रोज़गार के अवसरों के सृजन की ओर सरकार का ध्यान नहीं है. महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु में निवेश और रोज़गार सृजन के बीच अनुपात गुजरात की तुलना में कहीं बेहतर है. निवेश की राशि के मामले में खोखले दावे किए जा रहे हैं. अंधाधुंध औद्योगीकरण के कारण पर्यावरण को जो नुक़सान हो रहा है, उससे गुजरात सरकार को कोई मतलब नहीं है.

भारतीय राज्य हंगर इंडेक्स 2008 के अनुसार, भूख के मामले में गुजरात उड़ीसा से भी पीछे है. इसमें 17 बड़े राज्यों में गुजरात का स्थान 13वां है. वह केवल झारखंड, बिहार एवं मध्य प्रदेश से ऊपर है. गुजरात में ग़रीबी एवं बेरोज़गारी बढ़ रही है और कृषि क्षेत्र की भी हालत ख़राब है. कृषि उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है. 2005 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार, गुजरात के चालीस प्रतिशत किसानों ने कहा कि अगर उन्हें आमदनी का कोई दूसरा ज़रिया मिल जाए तो वे खेती-किसानी छोड़ना चाहेंगे. हाल के कुछ वर्षों में किसानों और कृषि श्रमिकों की बदहाली बढ़ी है. विधानसभा में दिए गए एक उत्तर में मोदी ने बताया कि जनवरी 2007 में समाप्त हुए एक वर्ष में राज्य में 148 किसानों ने आत्महत्या की. एक ओर गुजरात विद्युत का निर्यात कर रहा है तो दूसरी ओर गांवों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही है. 2007 में राज्य में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच 900 मेगावाट का अंतर था और इस अंतर को पाटने के लिए गांवों में बिजली कटौती की जा रही थी. किसी समुदाय में व्याप्त ग़रीबी को मापने का एक महत्वपूर्ण आधार है वहां एनीमिया से ग्रस्त लोगों का प्रतिशत. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट 2006 के अनुसार, 1999 में गुजरात में 46.3 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त थीं. 2004 में यह प्रतिशत बढ़कर 55.5 हो गया. इसी अवधि में बच्चों में एनीमिया का प्रतिशत 74.5 से बढ़कर 80.1 हो गया.

(लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्राध्यापक हैं)

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2 Responses to “वाईब्रेंट गुजरात का मिथक”

  • RSo says:

    मेरे ख्याल से राम पुनियानी एक कांग्रेश अगेंट है,,,,,,,,,,,,
    कितने पैसे खाए है……..पुनियानी ???????????
    इसे लोग ही एकता के लिए खतरा हैं……………………..
    छोटी सोच……..
    १०० में से ९९ ये कहे विकाश हो रहा है…….तो कुछ बात तो है ही……….
    हाथी चले मस्त चाल (मोदी जी ) कुत्ते भोंकते रहो……..

  • गुजरात का सच सामने लेन पर बधाई स्वीकार करें . दर असल आज मीडिया में बैठे कर सेवक झूठा प्रचार कर के समाज में भरम प्गेलाते रहते हैं . आप ने इनको बेन कaब कर सराहनीय कम किया है
    धन्यवाद

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