वास्तविक बदलाव की ज़रूरत

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आख़िरकार बजट पेश हो गया और बजट भाषण भी बिना किसी परेशानी के पूरा हो गया. जेपीसी की मांग मान ली गई और पीएसी भी अपनी तऱफ से जांच करेगी. अंतत: सीवीसी को भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बेआबरू होकर अपने कूचे से निकलना पड़ा. राजा और कलमा़डी पर भी शिकंजा कस दिया गया, लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद भी सब कुछ ठीक हो जाने का एहसास नहीं हो रहा है. बजट में कुछ छोटे-छोटे प्रस्तावों को छोड़कर ऐसा कुछ भी नहीं था, जो हमारी उम्मीदों पर खरा उतर सके. आयकर सीमा को एक लाख साठ हज़ार रुपये से बढ़ाकर एक लाख अस्सी हज़ार रुपये करके यह संदेश देने की कोशिश की गई कि शहरी और ग्रामीण मध्य वर्ग को और ज्यादा अवसर देने की योजना यूपीए सरकार के एजेंडे में शामिल नहीं है. मध्य वर्ग महंगाई के बारे में शिकायत करता रहे. फिर भी सरकार का विश्वास है कि यूपीए-2 के दौरान मध्य वर्ग ने बहुत विकास किया है और वह महंगाई से निपटने में सक्षम है. महंगाई यूपीए के लिए कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान निकाला जाना ज़रूरी है. यह तो यूपीए सरकार के लिए एक उपलब्धि है, क्योंकि सरकार का मानना है कि मनरेगा की वजह से ग़रीबों की आमदनी बढ़ी है और अब वे पहले से ज्यादा खा रहे हैं तथा महंगाई की एक वजह यह भी है. हालांकि यह एक बहुत बड़ी ग़लती हो सकती है, एक बहुत ग़लत निर्णय भी.

कैबिनेट में एक और फेरबदल का वादा किया जा चुका है. कैबिनेट थकी-मांदी और बूढ़ी ऩजर आ रही है. कांग्रेस में प्रतिभाशाली और 40 के आसपास के युवक-युवतियों की अच्छी-खासी संख्या है और आप यह जानते हैं कि ये कौन हैं. गठबंधन के सहयोगियों में भी ऐसी प्रतिभाएं हैं.

पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं और जनता के फैसले के बारे में हमें 13 मई तक ही पता चल सकेगा. कांग्रेस केवल असम में सत्ता में है और बड़ी पार्टी भी है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में उसकी स्थिति कमज़ोर है. भारतीय मतदाता किसी भी सत्तासीन पार्टी को महंगाई के लिए मा़फ नहीं करते. मैं उम्मीद कर रहा हूं कि इस बार एआईएडीएमके जीतेगी. डीएमके-कांग्रेस गठबंधन ख़तरे में है. हालांकि इनमें से किसी भी गठबंधन में कोई भी सिद्धांत दांव पर नहीं लगा हुआ है, सिवाय धर्म निरपेक्षता के. और यह भी तमिलनाडु में कोई विभाजनकारी लकीर नहीं है, जैसा कि अम्मा और कैलगनार के बीच है. पश्चिम बंगाल में मेरे हिसाब से कांटे की टक्कर है. बहुत सारे लोग कह रहे हैं कि वहां 35 सालों तक सत्ता में रहने के बाद सीपीएम हारने जा रही है, लेकिन महंगाई और माओवादियों के साथ रिश्ते जैसे मुद्दे ममता बनर्जी को नुक़सान पहुंचा सकते हैं.

यह भी स्पष्ट नहीं है कि उनके पास पश्चिम बंगाल के लिए कोई वैकल्पिक राजनीतिक पैकेज है या नहीं. हर कोई जो यह कह रहा है कि ममता जीतेंगी, वह साथ में यह बात भी जोड़ रहा है कि पश्चिम बंगाल की स्थिति फिर भी ख़राब ही रहेगी. कांग्रेस को लेकर सबसे कठिन निर्णय यही हो सकता है कि तब क्या होगा, यदि इसे संतुलन बनाने लायक़ सीटें मिल जाएं. प्रणव मुखर्जी ने इशारा किया है कि उनके पास बैंकिंग और इंश्योरेंस से संबंधित कई विधेयक हैं, जो पास कराने हैं और उसके लिए उन्हें बाहर से भी समर्थन चाहिए होगा. इसका अर्थ है कि भाजपा-राजग का ही समर्थन नहीं, बल्कि लेफ्ट के भी समर्थन की ज़रूरत पड़ेगी. यहां एक बार फिर से इस बात के संकेत दिख रहे हैं कि दीदी का साथ छोड़कर वामपंथियों के साथ अपने पुराने संबंध जोड़ लिए जाएं. हालांकि प्रधानमंत्री इस संदर्भ में उस क़दम के आधार पर असहमत हो सकते हैं, जो पिछली संसद में न्यूक्लियर डील के समय वामपंथियों ने उठाया था, लेकिन कांग्रेस के भीतर ही कई ऐसे लोग हैं, जो अपने कामरेड दोस्तों को भूल नहीं पा रहे हैं.

बजट के माध्यम से सरकार भविष्य में उदारवादी सुधार करेगी या लोकवादी मुद्रा अपनाने जा रही है, यह संदेश स्पष्ट नहीं हुआ. इससे मुझे लगता है, कांग्रेस इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति में है कि वह भविष्य में किस दिशा की ओर आगे बढ़े. प्रधानमंत्री को उनके सहकर्मियों ने अकेला छोड़ दिया है. ख़ासकर उनकी प्रेस कांफ्रेंस के पहले और बाद में कोई भी उनकी मदद के लिए आगे आता नहीं दिख रहा है. अपनी मजबूरी को लेकर उन्होंने जो स्वीकारोक्ति की, वह उनकी पार्टी और गठबंधन के साथियों के लिए किसी प्रहार से कम नहीं था. इसरो मुद्दे पर जब राज्यसभा में प्रधानमंत्री और अरुण जेटली के बीच बहस हो रही थी, तब उनके वाक्यों में छुपे गुस्से को देखा जा सकता था. यहां मनमोहन सिंह का वह रूप था, जो अमूमन नहीं दिखता. उनके गुस्से का कुछ हिस्सा उस दिशा के लिए भी था, जहां उनके अपने लोग बैठे थे.

कैबिनेट में एक और फेरबदल का वादा किया जा चुका है. कैबिनेट थकी-मांदी और बूढ़ी ऩजर आ रही है. कांग्रेस में प्रतिभाशाली और 40 के आसपास के युवक-युवतियों की अच्छी-खासी संख्या है और आप यह जानते हैं कि ये कौन हैं. गठबंधन के सहयोगियों में भी ऐसी प्रतिभाएं हैं. अगर उन्हें कम अनुभव है, तो भी मौक़ा मिलना चाहिए, ताकि वे अपनी ग़लतियों से सीख सकें. क्या सचमुच कुछ वास्तविक बदलाव होंगे?

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