क्या सरकार और माओवादियों के बीच चूहे-बिल्ली की तरह चल रहे खूनी संघर्ष में बाबुओं की हालत एक बंधक की तरह हो गई है? मलकानगिरी के जिलाधिकारी आर विनील कृष्णा एवं जूनियर इंजीनियर पी एम मांझी के अपहरण और बाद में उनकी रिहाई से यह सवाल उठ रहा है. खासकर, मुख्यमंत्री नवीन पटनायक द्वारा माओवादियों की 14 मांगों को मान लेने की खबर आने के बाद यह सवाल और भी मजबूत हुआ है. अन्य मांगों के अलावा इसमें माओवादियों के खिलाफ सुरक्षाबलों की कार्रवाई रोकने और जेल में बंद उनके साथियों की रिहाई की मांग भी शामिल थी. सूत्रों के मुताबिक, उड़ीसा के मुख्य सचिव बी के पटनायक एवं गृह सचिव यू एन बेहरा और माओवादियों की तरफ से नियुक्त मध्यस्थ के बीच काफी तनावपूर्ण समझौते के बाद ही कृष्णा की सुरक्षित रिहाई संभव हो सकी. माओवादियों की मांगों के आगे सरकार द्वारा झुकने के बाद बाबुओं की ओर से एक और सवाल आया है कि अगली बार माओवादियों के निशाने पर कौन? क्योंकि सरकार और प्रभावित राज्यों की अपेक्षा माओवादियों की मंशा तो बिल्कुल साफ है.
ताक़तवर राजनीति
पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने इस बात को खारिज कर दिया है कि स्कूली शिक्षा के महानिदेशक कृष्ण कुमार का तबादला उन्हें प्रताड़ित करने की कार्रवाई के तहत किया गया, जैसा कि उनके राजनीतिक आलोचक आरोप लगा रहे थे. लेकिन राज्य के बाबू इस तर्कसे सहमत नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि महज एक साल में ही कृष्ण कुमार का नौ बार तबादला किया गया. पंजाब के बाबुओं को यह बात भी अजीब लगती है कि राज्य स्तर के अधिकारियों की नियुक्तियों या तबादलों के मामले में किसी अन्य चीज के मुकाबले राजनीतिक कारण ज्यादा हावी रहते हैं. सूत्रों का कहना है कि अभी हाल में तहसील कल्याण अधिकारी मंजीत सिंह, अकाली नेता और पूर्व कृषि मंत्री गुरदेव सिंह बादल के बेटे को तथाकथित तौर पर तीन बार आरोपित किया गया, लेकिन हर बार उन्हें बहाल कर दिया गया. उन पर अपनी ड्यूटी से दो साल तक गायब रहने के अलावा बलात्कार का भी एक आरोप लगा था. जाहिर तौर पर बादल सरकार इस मामले में खामोश रहा.
|
|
|









