रेमंड को माफी अवाम को मंजूर नहीं

अमेरिकी दूतावास कर्मी रेमंड डेविस की गोली से जब दो पाकिस्तानी नागरिक मारे गए थे तो कट्टरपंथियों ने यह कहते हुए चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया था कि यदि अमेरिका के दबाव में रेमंड की रिहाई हुई तो मुल्क में हुकूमत के विरुद्ध आग भड़क उठेगी, लेकिन रेमंड इस्लामी शरीयत के मुताबिक़ ब्लड मनी देकर रिहा हो गया. अब इस पर कट्टरपंथियों की बोलती बंद है. चूंकि पाकिस्तानी अमेरिकी नीतियों को पसंद नहीं करते, इसलिए संभव है कि देर-सबेर बवाल हो सकता है, लेकिन फिलहाल कट्टरपंथियों की नरमी रहस्य के घेरे में है. यह कहा जा सकता है कि इस रिहाई से कट्टरपंथियों, आतंकवादियों एवं तालिबानियों को पाकिस्तान सरकार और अमेरिका के विरुद्ध ईंट से ईंट बजाने का मौक़ा मिल गया है. रेमंड प्रकरण अमेरिका के  लिए भी अशांति का पैगाम लाया है. पाकिस्तानी चरमपंथी उस आफिया सिद्दीकी की रिहाई चाहेंगे, जिसे अमेरिकी अदालत ने 86 वर्ष की कैद की सज़ा सुना रखी है. इससे अलग पाकिस्तान में ईश निंदा क़ानून का अलग बवाल है. पाकिस्तान की स्थितियां निरंतर बिगड़ रही हैं, जिसमें सुधार की गुंजाइश कम ही दिख रही है.

ग़ौरतलब है कि अमेरिकी वाणिज्य दूतावास कर्मी रेमंड डेविस पर दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या का इल्ज़ाम है. रेमंड के विरुद्ध मुक़दमा दर्ज कर 27 जनवरी को उसे गिरफ़्तार किया गया था. यह ख़बर मिलते ही इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास से लेकर वाशिंगटन तक हलचल मच गई. नतीजा यह हुआ कि अमेरिका की ओर से कहा गया कि रेमंड की हिरासत ग़ैर क़ानूनी है, इसलिए उसे रिहा किया जाना चाहिए. अदालत में रेमंड ने जज के सामने अपना जुर्म यह कहते हुए कबूला कि उसने आत्मरक्षार्थ गोलियां चलाई थीं, जिसमें उक्त दोनों लोग मारे गए. उधर अमेरिका ने भी स्पष्ट किया कि यदि रेमंड रिहा नहीं होता है तो दोनों देशों के रिश्ते बिगड़ेंगे, जिसका नुक़सान पाकिस्तान को होगा. ज्ञातव्य है कि ख़राब आर्थिक स्थिति वाले पाकिस्तान को प्रति वर्ष अमेरिका एक अरब डॉलर से अधिक की मदद करता है. इसी वजह से पाकिस्तानी हुकूमत रेमंड के प्रति नरम रुख़ अख्तियार कर रही थी, लेकिन मामला अदालत में होने की वजह से वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती. रेमंड के प्रति सरकार की नरमी से सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के भीतर भी तू़फान खड़ा हुआ. सरकार कहती रही कि यदि अदालत रेमंड को रिहा करती है तो उसे मंजूर है. यानी पाकिस्तान सरकार को उसकी रिहाई पर ऐतराज नहीं था.

इस बीच जनता के रुख को भांपते हुए तत्कालीन विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने सरकार की मंशा के विरुद्ध यह कह दिया कि रेमंड के पास ऐसा कोई दस्तावेज़ नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो कि वह अमेरिकी राजनयिक है. पाकिस्तान की जनता की भावना रेमंड के ख़िला़फ है, इसलिए उसकी रिहाई नहीं होनी चाहिए. नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान सरकार की अमेरिकापरस्ती के कारण उन्हें रेमंड के विरुद्ध वक्तव्य देने का ख़ामियाज़ा अपनी कुर्सी गंवा कर चुकाना पड़ा. कुरैशी के कुर्सी छोड़ते ही सरकार पर चौतरफा दबाव भी बनने लगा. मामले में नया मोड़ तब आया, जब रेमंड की गोली से मरे एक नागरिक फ़हीम की विधवा शमायला ने बीती 14 फरवरी को आत्महत्या कर ली. मरने से पहले शमायला ने कहा था कि उसे डर है कि सरकार अमेरिका के दबाव में उसके पति के हत्यारे को रिहा न कर दे. शमायला के उस बयान और आत्महत्याने पाकिस्तान सरकार, अमेरिका और रेमंड के विरुद्ध आग भड़का दी. नतीजतन, चरमपंथी, जेहादी और तालिबानी एकजुट होकर रेमंड को फांसी देने की मांग करने लगे. जगह-जगह सरकार और अमेरिका के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ. तहरीक-ए-तालिबान और जमात-ए-इस्लामी ने रेमंड को फांसी देने या फिर उन्हें सौंपने की बात कही.

उधर देश के वकीलों ने भी चार याचिकाएं दायर कर दीं कि पाकिस्तान सरकार कहीं अमेरिकी दबाव में रेमंड को रिहा न कर दे. इस पर जज एजाज़ अहमद चौधरी ने रेमंड का नाम एग्ज़िट कंट्रोेल लिस्ट में डाल दिया, ताकि वह देश न छोड़ सके. हालांकि रेमंड की रिहाई के लिए अमेरिका ने कहा कि वह दूतावास कर्मी है, इसलिए उस पर मुक़दमा नहीं चल सकता. यह मसला इतना गंभीर हो गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को कहना पड़ा कि रेमंड की वजह से दोनों देशों के रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं, इसलिए वियना समझौते के तहत रेमंड को रिहा कर देना चाहिए. इस मसले पर दोनों देशों के बीच गर्मागर्मी चल ही रही थी कि पाकिस्तान के क़ानून मंत्री बाबर अवान ने रेमंड की रिहाई के बदले अमेरिका की जेल में बंद आ़िफया सिद्दीकी को सौंपने की मांग कर डाली. विदित हो कि अमेरिकी अदालत ने पाकिस्तानी वैज्ञानिक आ़िफया को 86 साल की कैद की सज़ा सुना रखी है. तीन बच्चों की मां आ़िफया ने जुलाई 2008 में अ़फग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों पर हमला किया था. अब इन दोनों मसलों पर पाकिस्तान के लोग सड़क पर उतर आए हैं. जहां रेमंड की रिहाई का विरोध हो रहा है, वहीं आ़िफया की रिहाई की मांग तेज होने लगी है.

बराक ओबामा की अफ-पाक नीतियों के सलाहकार रहे ब्रूस रिडल ने अपनी पुस्तक डेडली एंबरेस: पाकिस्तान, अमेरिका एंड फ्यूचर ऑफ ग्लोबल जेहाद में लिखा है कि पाकिस्तान में एक जनरल, जो 1980 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति एवं तानाशाह स्वर्गीय जनरल जिया-उल-हक का काफी नज़दीकी था, सरकार के ख़िला़फ विद्रोह का नेतृत्व कर सकता है. दरअसल, पाकिस्तान एवं अमेरिका दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है. पाकिस्तान को हर वर्ष अमेरिकी डॉलर चाहिए तो अमेरिका को आतंकवाद के विरुद्ध जंग में पाकिस्तान की मदद. ख़ैर, रेमंड की रिहाई के बाद जब बवाल शुरू हुआ तो उससे बचने के लिए पाकिस्तान सरकार ने ब्लड मनी का सहारा लिया. पंजाब के क़ानून मंत्री सनाउल्लाह ने कहा कि रेमंड को इस्लामी क़ानून के तहत ब्लड मनी के भुगतान के बाद छोड़ा गया है. मारे गए दोनों लोगों के परिवारीजनों को इस्लामी क़ानून के  मुताबिक़ बतौर ब्लड मनी बीस लाख अमेरिकी डॉलर दिए गए.

जमात-उद-दावा के प्रमुख मोहम्मद सईद ने कहा कि अमेरिका से मुक्ति पाने का यह मौक़ा हमें बड़े भाग्य से मिला. अमेरिका के प्रति लोगों में गुस्सा उस व़क्त दिखा, जब बीती 18 मार्च को जुम्मे की नमाज़ के बाद रेमंड की रिहाई के विरुद्ध पूरे देश में विरोध दिवस मना. जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख सईद मुनव्वर हसन ने डेविस को रिहा करने के मुद्दे पर पूरे देश में विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है. मुनव्वर ने कहा कि सरकार ने रेमंड को रिहा करके देश की इज़्ज़त से खिलवाड़ किया है. अमेरिकी सरकार ने आ़िफया को स़िर्फ बंदूक़ दिखाने के आरोप में 86 साल की सज़ा दे दी, लेकिन हत्यारे रेमंड को रिहा कर दिया गया. वकील इक़बाल जाफरी ने रेमंड की रिहाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उन्होंने कहा कि रेमंड को माफी और रिहाई क़ानून के विरुद्ध है. उधर रेमंड द्वारा मारे गए लोगों के परिवारीजनों ने अदालत के निर्णय के बाद चुपचाप देश छोड़ दिया है. माना जा रहा है कि उन्हें अमेरिका में ग्रीन कार्ड और आवास दिया गया है, जबकि अमेरिका का कहना है कि रेमंड की रिहाई के बदले कोई ब्लड मनी नहीं दिया गया. पाकिस्तान में लगातार पिछले तीन दशकों से जेहाद चल रहा है. अफ़ग़ानिस्तान के साथ सोवियत संघ के युद्ध के समय से लेकर कश्मीर में घुसपैठ और तालिबान के बढ़ते क़दमों तक मुल्क लगातार संघर्ष से सामना कर रहा है. पश्चिमी विश्लेषक मानते हैं कि पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र वहां की विदेश नीति पर हावी है.

 

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