फुकुशिमा भारत के लिए चेतावनी है

विकिलीक्स खुलासों को भूल जाएं और इससे हुए खुलासे की जांच की मांग को भी भूल जाएं. मामला भारत-अमेरिका न्यूक्लियर समझौते के मुद्दे पर संसद में हुए अत्यंत महत्वपूर्ण मतदान का था. यह मामला हमेशा से एक कूटनीतिक सामरिक गठबंधन का रहा है. इस मौक़े को उस सवाल का जवाब बताया जा रहा था जो भारत की ऊर्जा संबंधी ज़रूरतों को लेकर हमेशा से उठते रहे हैं. तब से, जब से भारत सरकार ने भारतीय उद्योगों और उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति के लिए सिविलियन न्यूक्लियर रिएक्टर के इस्तेमाल व विस्तार पर सोचना शुरू किया था. हालांकि यह सब एक दिखावे की तरह ही था. मैं नाभिकीय ऊर्जा के बजाए न्यूक्लियर रक्षा समझौते को वरीयता देना चाहूंगा, क्योंकि हिरोशिमा और नागासाकी के बाद अब तक किसी ने भी इस हथियार का इस्तेमाल नहीं किया है, जबकि यूके, यूएस और यूक्रेन में सिविलियन न्यूक्लियर रिएक्टर से संबंधित दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और अब जापान में हुई हैं.

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से न्यूक्लियर इंडस्ट्री के दिग्गजों की आशाओं को और बल मिला है. थ्री माइल आईलैंड और चेर्नोबिल की घटना के बाद भी लोगों के पास नाभिकीय ऊर्जा की वकालत करने के लिए कुछ तर्क थे. ये तर्क लाभकारी और परिस्थितियों के हिसाब से मज़बूत थे. यह न्यूक्लियर इंडस्ट्री के लिए अचानक पुनर्जागरण का समय आ गया था. यूएस, चीन और भारत इसका फायदा उठाने के लिए बेक़रार थे. यह कहा गया कि  न्यूक्लियर पावर सुरक्षित होती है. पुरानी तकनीक खतरनाक हो सकती है, लेकिन अब नई और विकसित तकनीक है जो ज़्यादा सुरक्षित है. फ्रांस और जापान दो ऐसे राष्ट्र हैं जिन्होंने न्यूक्लियर रिएक्टर का ऊजार्र् उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया है और इसका फायदा भी उठाया है. ग्लोबल वार्मिंग का भय और न्यूक्लियर पावर से होने वाले लाभ के बीच की शादी मानो ऐसी ही थी जैसे यह शादी स्वर्ग (आसमान) में तय की गई थी.

जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि नाभिकीय ऊजार्र् का उत्पादन महंगा सौदा है. यूके सरकार ने अपने रिएक्टर के निजीकरण की कोशिश की थी, लेकिन किसी भी प्राइवेट कंपनी ने रिएक्टर को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. वजह, सरकार लाखों-करो़डों पाउंड की सब्सिडी देने की इच्छुक नहीं थी. इसके अलावा, नाभिकीय कचरे का मसला भी है. अमेरिका में नाभिकीय कचरे के निष्पादन के लिए उन जगहों को चुना गया, जहां अमेरिकी जनजाति रहती थी. इस मुद्दे पर अमेरिका में सालों तक राजनीतिक चुप्पी बनी रही. तथाकथित नाभिकीय पुनर्जागरण, जोे अभी चल रहा है, ने इस मामले पर अब तक उपेक्षापूर्ण रवैया ही अपनाया है, लेकिन यही मुद्दा आगे चलकर इसके लिए सिरदर्द बनने वाला है.

यह पूरी स्थिति फुकुशिमा से पहले की है. यहां पर छह रिएक्टर हैं और सभी आसपास ही हैं. इन्हें भूकंपरोधी तो बनाया गया था, लेकिन सुनामी झेलने की क्षमता इनमें नहीं थी. नतीजतन, जब दुर्घटना घटी और विकिरण हुआ तब इसकी आंच टोक्यो तक पहुंची. लोगों को अपने घर खाली करने प़डे. पानी भी दूषित हो गया. दुर्घटना के बाद बहाना यह बनाया गया कि ये रिएक्टर पुराने थे और पुरानी तकनीक से बनाए गए थे. इनकी मरम्मत की चेतावनी भी दी गई थी जिसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया था. यह कहा जा रहा है कि क्या हम भाग्यशाली नहीं हैं कि सुनामी और भूकंप के बाद भी विकिरण से एक भी मौत नहीं हुई.

मैं ऐसा नहीं मानता. भारत में जहां भी न्यूक्लियर रिएक्टर स्थापित होगा वह इलाक़ा सघन आबादी वाला ही होगा, क्योंकि यहां जिस जगह भी रोज़गार के साधन दिखते हैं वहां आबादी बसने लगती है, झुग्गी-झोप़िडयों की संख्या ब़ढ जाती है. इसलिए यह विचार कि रिएक्टर के तीस मील के भीतर इंसानी आबादी नहीं होगी, विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है. दूसरी अहम बात कि क्या रिएक्टर की इमारतें इतनी मज़बूत होंगी जितनी जापान की हैं. मुझे इस मुद्दे पर भी शक की गुंजाइश ही दिख रही है. ठेका पाने के लिए कंपनियां कितना भी पैसा खर्च कर सकती है, भले ही सुरक्षा नियमों को ताक़ पर क्यों न रख दिया जाए. मैं ऐसा कैसे बोल सकता हूं? क्या आपने सार्वजनिक रूप से चलाई जा रही कोयला खदानों में होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या पर ग़ौर नहीं किया है.

भले ही यह सब प़ढ कर कोई इसे भय फैलाने वाली बात कह सकता है, लेकिन क्या कम से कम हम इतना सुनिश्चित कर सकते हैं कि अभी तक भारत में जितने भी रिएक्टर के प्रस्ताव को हरी झंडी मिली है, उसमें सुरक्षात्मक इमारतों के अतिरिक्त परतें बनाई जा सकें. सबसे नज़दीकी शहर भी एक सुरक्षित दूरी पर हो, इसकी गारंटी दे सकें. फुकुशिमा से टोक्यो की जितनी दूरी थी, उससे भी ज़्यादा दूरी पर हो रिएक्टर की इमारत. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मैं जानता हूं कि भारत में न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने की जो ब़डी कोशिश हो रही है, वह रुकने वाली नहीं है. क्या हम मौत की उस संख्या को कम से कम करने का प्रयास कर सकते हैं जब पहली परमाणु दुर्घटना हमारे देश में होगी? मैं जानता हूं, इस चेतावनी का असर किसी पर नहीं होगा और न ही इसे कोई गंभीरता से लेगा. करो़डों रुपये जेब में जा चुके हैं और अब तो का़फी देर भी हो चुकी है.

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