इज्जत की जमींदारी

Share Article

शादी के ग्यारह साल बाद ससुराल जाने का मौक़ा मिला. लंबा अंतराल इस वजह से कि ससुराल के सब लोग बिहार के ऐतिहासिक शहर गया में बस गए थे. शादी भी वहीं से हुई और जब भी जाना हुआ गया ही गया. पत्नी के पैतृक गांव यानी अपनी असली ससुराल जाने का अवसर, जैसा कि ऊपर बता चुका हूं, शादी के ग्यारह साल बाद मिला. इतने लंबे अंतराल के बाद वहां पिछले साल दिवंगत हुए अपने श्वसुर की बरसी में गया था. हमें जाना था गया से तक़रीबन साठ-सत्तर किलोमीटर दूर औरंगाबाद ज़िले के रायपुर बंधवा गांव में. हम लोग गया से चलकर दो घंटे में वहां पहुंचे. बिहार की सड़कें पिछले सालों में बेहद अच्छी हो गई हैं और रास्ते में पड़ने वाले आज़ादी के पूर्व बने सारे पुलों के समांतर नए पुल बन रहे थे. जब मैं रास्ते में था तो सोच रहा था कि लगभग एक दशक पूर्व अपनी शादी में मुझे जमालपुर से गया के लगभग सौ-एक सौ दस किलोमीटर का सफर तय करने में ग्यारह घंटे लगे थे. तब बिहार में लालू राज था और सड़कें लगभग ग़ायब हो चुकी थीं. ख़ैर, यह अवातंर प्रसंग है. मैं बात कर रहा था अपने बंधवा सफर की. औरंगाबाद ज़िले के  बंधवा तक जाने का रास्ता पूरी तरह से नक्सल प्रभावित इलाक़े गोह एवं हसपुरा से होकर जाता था, लेकिन टाटा मैजिक से हमने दो घंटे का सफर बेख़ौ़फ होकर तय किया. रास्ते में सब कुछ सामान्य लग रहा था. रास्ते में मिलने वाले क़स्बानुमा बाज़ार में ख़ूब भीड़भाड़ और चहल-पहल थी, किसी भी तरह के डर का वातावरण नहीं दिख रहा था. कहीं कोई पुलिसवाला भी नहीं दिखा, अर्द्धसैनिक बल के जवान तो दूर की बात. हम लोग दोपहर बाद बंधवा पहुंचे. वहां का घर पुराने जमाने का बना था, मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारें और ख़ूब ऊंचाई पर छत.

गांव में घुसते ही एक बोर्ड दिखाई दिया-यह गांव राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत ऊर्जाकृत ग्राम है. लेकिन घर पहुंचते ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की पोल खुल गई. वहां तक बिजली के तार-खंभे तो हैं, लेकिन बिजली नहीं है. कई घरों में सोलर एनर्जी से काम चल रहा था. मेरे लिए बिना बिजली के रहने का यह नया अनुभव नहीं था, लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद बग़ैर बिजली के चार-पांच दिन गुजारे.

गांव में घुसते ही एक बोर्ड दिखाई दिया-यह गांव राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत ऊर्जाकृत ग्राम है. लेकिन घर पहुंचते ही राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की पोल खुल गई. वहां तक बिजली के तार-खंभे तो हैं, लेकिन बिजली नहीं है. कई घरों में सोलर एनर्जी से काम चल रहा था. मेरे लिए बिना बिजली के रहने का यह नया अनुभव नहीं था, लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद बग़ैर बिजली के चार-पांच दिन गुजारे. यह एक संयोग ही बना कि जब पहली बार भारत ने क्रिकेट का वर्ल्डकप जीता था, तब भी मैंने रेडियो पर ही भारत की जीत की दास्तां सुनी थी और इस बार भी क्रिकेट के महायुद्ध में जब भारत श्रीलंका को पराजित कर रहा था तो मैं रेडियो से ही चिपक कर बैठा था. लेकिन सबसे मजेदार बात यह थी कि एक ओर जहां मैं टीवी और बिजली से दूर था, वहीं मेरा मोबाइल मुझे बाहर की दुनिया से जोड़े हुए था और मुझे अपडेट रख रहा था. उन पांच दिनों में मैंने मोबाइल इंटरनेट का जमकर इस्तेमाल किया. फेसबुक और ट्‌वीटर से वर्ल्डकप फाइनल के दौरान लोगों के जोश और उत्साह का अंदाज़ मिल रहा था.

रायपुर बंधवा के अपने बंगले पर जब हम लोग शाम को बैठे तो लोगों के आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया. चूंकि मैं घर का दामाद था, इसलिए मुझे ख़ास तौर पर इज़्ज़त बख्शी जा रही थी. गांव में मेरे दिवंगत श्वसुर प्रोफेसर प्रियव्रत नारायण सिंह की काफी इज़्ज़त थी. गांव से बाहर रहने के बावजूद उनका दिल गांव में ही बसता था. हर साल दो-तीन बार गांव ज़रूर जाते थे. शाम को जब मैं और मेरी पत्नी के बड़े भाई राजेश जी गांव में घूमने निकले तो इस इज़्ज़त का एहसास और गहरा हो गया. रास्ते में हर छोटा-बड़ा आदमी राजेश जी को सलाम मालिक कह रहा था. जमींदारी तो 1953 में ही चली गई थी, लेकिन इज़्ज़त की जमींदारी अब भी क़ायम थी. कई लोग जो हमसे मिलने आ रहे थे, वे राजेश जी और उनके चाचा के सामने कुर्सी या बेंच पर बैठने के बजाय ज़मीन पर बैठ रहे थे. मुझे यह सामंती लग रहा था, लेकिन जब उनसे बात हुई तो पता चला कि यह उनके सम्मान देने का एक तरीक़ा है, उन पर कोई इसके लिए दबाव नहीं बनाता है. यह सदियों से चली आ रही एक परंपरा है, जिसे निभाया जा रहा है. यहां मेरे दिमाग़ में एक बात बार-बार उठ रही थी कि सुदूर गांव में हर कोई एक-दूसरे को विश करने के लिए सलाम का इस्तेमाल कर रहा था. बोलचाल में उर्दू के लफ्ज़ों का जमकर इस्तेमाल हो रहा था. उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहने वालों को उन इलाक़ों में जाकर देखना चाहिए कि जहां कोई मुस्लिम आबादी नहीं है, वहां भी बग़ैर किसी औपचारिक शिक्षा के, स़िर्फ परंपरा के सहारे लोग उर्दू का इस्तेमाल कर रहे थे. भाषा के बीच दरार पैदा करने वाले लोगों को एसी कमरों से बाहर निकल कर उन लोगों के बीच जाने की ज़रूरत है.

इन पांच दिनों तक वहां रहने के दौरान कई अनुभव हुए. एक दिन अचानक दोपहर में घर के बरामदे में बैठा था तो दर्जनों बच्चे थाली पीटते हुए सामने से गुजरे. पूछने पर पता चला कि ये बच्चे मिड डे मील स्कीम के तहत खाना खाने स्कूल जा रहे हैं. और दरियाफ्त की तो आगे पता चला कि बच्चों का नामांकन तो स्कूल में कर दिया गया है, लेकिन उनकी पढ़ाई और स्कूल में उनकी उपस्थिति ज़्यादातर रजिस्टर में ही दर्ज होती है. बच्चे स्कूल में पढ़ने के बजाय दोपहर का खाना खाने आते हैं. दस बजे के क़रीब स्कूल में खाना बनना शुरू हो जाता है और बारह-एक बजे तक बच्चों को खाना खिलाकर स्कूल के मास्टर लोग फारिग हो जाते हैं. उसी तरह आंगनवाड़ी केंद्र का काम भी चल रहा था. लेकिन गांव के ही लोगों ने बताया कि मिड डे मील में जमकर घपला होता है, रजिस्टर में फर्ज़ी छात्रों के नाम भी दर्ज होते हैं और ज़िले के आला शिक्षा अधिकारियों की मिलीभगत से यह फर्ज़ीवाड़ा धड़ल्ले से चलता है. बातों-बातों में पता चला कि वहां एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी है, जिसमें तैनात डॉक्टर घंटे-डेढ़ घंटे के लिए केंद्र में आते हैं. गांव के लोग इस बात से ही ख़ुश दिखे कि कम से कम घंटे भर के लिए तो डॉक्टर गांव में होता है. नीतीश राज के पहले तो स्वास्थ्य केंद्र का ताला ही महीनों में खुलता था. यह भी पता नहीं चलता था कि किसी डॉक्टर की तैनाती वहां है या नहीं. लेकिन बड़ा सवाल अब भी है कि क्या नीतीश कुमार शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में और सुधार कर पाएंगे, क्या केंद्र पर तैनात डॉक्टर पूरे समय तक मौजूद रहेंगे, क्या होटल में तब्दील हो रहे स्कूलों को वह विद्या का मंदिर बना पाएंगे? प्रदेश की जनता ने नीतीश कुमार को प्रचंड बहुमत के साथ जिताकर दोबारा सत्ता तो सौंप दी, लेकिन अब जनता की प्रचंड अपेक्षा भी है, जिस पर नीतीश कुमार को खरा उतरना होगा. अगर वह ऐसा कर पाते हैं तो इतिहास पुरुष हो जाएंगे और अगर इसमें कोई कमी रह जाती है तो इतिहास पुरुष बनने के बजाय इतिहास में खो जाने का ख़तरा भी उत्पन्न हो जाएगा.

बंधवा में चार-पांच दिन रहने के बाद हम लोग दोपहर बाद फिर से गया के लिए रवाना हो गए. देवकुंड और अमझरशरीफ से होते हुए हम लोग हसपुरा के रास्ते जा रहे थे. शाम घिरने लगी थी, लेकिन डर कहीं नहीं था, खुली गाड़ी में अंधेरे में सफर जारी था. मुझे याद है, जब शादी के बाद मैं अपनी ससुराल आया-जाया करता था तो शाम ढलने के बाद मेरे श्वसुर जी पास के बाज़ार में भी नहीं जाने देते थे. एक अजीब तरह का डर और अपराधियों का ख़ौ़फ लोगों के मन में इतने अंदर तक था कि हर कोई शाम ढलने के पहले घर लौट आता था, लेकिन स़िर्फ पांच साल में एक व्यक्ति ने पूरी फिजां ही बदल दी. अंत में मैं एक मजेदार वाकया सुनाता हूं, जो वहीं किसी ने मुझे सुनाया. हसपुरा से एक लड़का गोह जाने के लिए बस में चढ़ा और उसने किराए के तौर पर पंद्रह रुपये निकाल कर दिए. कंडक्टर ने कहा कि किराए के बीस रुपये बनते हैं. दोनों में बकझक होने लगी. रंगदार टाइप के उस लड़के ने कंडक्टर पर धौंस जमाते हुए कहा कि तुम मुझे जानते नहीं, मैं तो पंद्रह रुपये ही दूंगा. इस पर कंडक्टर ने जवाब दिया कि तुम भूल गए हो कि लालू यादव का राज ख़त्म हुए छह साल हो गए हैं और अगर तुम तत्काल किराए के बाक़ी पैसे नहीं दोगे तो बस से उतार दूंगा और अगर रंगदारी करोगे तो थाने में बंद करा दूंगा. तो समाज के आम आदमियों में क़ानून के प्रति जो यह विश्वास क़ायम हुआ है, वह बहुत कुछ कह जाता है.

(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *